15 मई 2026, शुक्रवार को वैशाख कृष्ण पक्ष की त्रयोदशी (सुबह 08:34 तक, फिर चतुर्दशी) तिथि है, जो मासिक शिवरात्रि का शुभ संयोग बना रही है। इस दिन अश्विनी नक्षत्र (रात 08:15 तक) और आयुष्मान योग है। राहुकाल सुबह 10:57 से दोपहर 12:36 तक रहेगा, इसलिए इस दौरान शुभ कार्य न करें। सूर्योदय: 05:25 AM सूर्यास्त: 07:10 PM अभिजीत मुहूर्त: 11:50 AM – 12:44 PM (लगभग) लाभ चौघड़िया: सुबह 07:23 – 09:03 अमृत चौघड़िया: सुबह 09:03 – 10:43 शुभ चौघड़िया: दोपहर 12:23 – 02:03 BY CHANDRA SHEKHAR JOSHI CHIEF EDITOR & PRESIDENT BAGLA MUKHI PEETH DEHRADUN 9412932030

15 मई को वृषभ संक्रांति और मासिक शिवरात्रि का योग है, जो भगवान शिव की पूजा के लिए उत्तम है। 15 मई 2026 शुक्रवार का आज का पंचांग & 15 मई 2026, शुक्रवार का आज का पंचांग धार्मिक, ज्योतिषीय और शुभ मुहूर्त की दृष्टि से अत्यंत विशेष माना जा रहा है। आज ज्येष्ठ संक्रांति, मास शिवरात्रि, सर्वार्थसिद्धि योग और कई महत्वपूर्ण शुभ संयोग
व्रत / दिवस विशेष – चतुर्दशी तिथि क्षय, ज्येष्ठ संक्रांति, , संक्रांति पुण्यकाल दिन 12-46 तक, भद्रा दिन 8-32 से रात्रि 6-52 तक, मास शिवरात्रि, सावित्री चतुर्दशी (बंगाल), वट सावित्री व्रत दूसरा दिन, मुनि शांतिनाथ जयंती, मेला डूंगरी जातर मनाली में प्रारंभ (हि.प्र.), अंतर्राष्टरीय परिवार दिवस, गंडमूल रात्रि 8-15 तक,
वट सावित्री व्रत और सोमवती अमावस्या (Somvati Amavasya) का खास संयोग बन रहा है। वट सावित्री व्रत (Vat Savitri Vrat) 16 मई को है। ज्येष्ठ मास में पड़ने वाले सारे व्रतों में वट सावित्री व्रत को बहुत प्रभावी माना जाता है। जिसमें सौभाग्यवती महिलाएं अपने पति की लंबी उम्र और सभी प्रकार की सुख-समृद्धि की कामना करती हैं।
ऐसी मान्यता है कि जितनी उम्र बरगद के पेड़ की होती है, सुहागिनें भी बरगद के पेड़ की उम्र के बराबर अपने पति की उम्र मांगती हैं। हिंदू धर्म में बरगद का वृक्ष पूजनीय माना जाता है। शास्त्रों के अनुसार, इस वृक्ष में सभी देवी-देवताओं का वास होता है। इस वृक्ष की पूजा करने से अखंड सौभाग्य की प्राप्ति होती है।
इस दिन महिलाएं व्रत रखकर वट वृक्ष के पास जाकर धूप, दीप नैवेद्य आदि से पूजा करती हैं। साथ ही रोली और अक्षत चढ़ाकर वट वृक्ष पर कलावा बांधती हैं और हाथ जोड़कर वट वृक्ष की परिक्रमा करती हैं। जिससे उनके पति के जीवन में आने वाली बाधाएं दूर होती हैं और लंबी उम्र की प्राप्ति होती है। वहीं सोमवती अमावस्या पर स्नान, दान, पितरों की पूजा और धन प्राप्ति के खास उपाय भी किए जाते हैं।

अमावस्या तिथि के दिन महिलाएं बांस की टोकरी में सप्त धान्य के ऊपर ब्रह्मा और वट सावित्री और दूसरी टोकरी में सत्यवान एवं सावित्री की प्रतिमा स्थापित करके वट के समीप जाकर पूजन करती हैं। साथ ही इस दिन यम का भी पूजन करती हैं और वट की परिक्रमा करते समय 108 बार वट वृक्ष में कलावा लपेटा जाता है। मंत्र का जाप करते हुए सावित्री को अर्घ्य दिया जाता है। वहीं सौभाग्य पिटारी और पूजा सामग्री किसी योग्य साधक को दी जाती है। इस व्रत में सत्यवान और सावित्री की कथा का श्रवण किया जाता है।
पंचांग के मुताबिक वट सावित्री व्रत ज्येष्ठ मास की अमावस्या तिथि पर रखा जाता है। ज्येष्ठ माह की अमावस्या तिथि की शुरुआत 16 मई को प्रातः 05:11 मिनट से शुरू होगी और इसका समापन 17 मई को देर रात 01:30 मिनट पर होगी। ऐसे में 16 मई 2026 को वट सावित्री व्रत का व्रत रखा जाएगा।
शास्त्रों के अनुसार, यह व्रत विशेष रूप से विवाहित महिलाओं के लिए होता है। इस दिन महिलाएं पति की लंबी उम्र, सफलता, सेहत और अखंड सौभाग्य की कामना करते हुए निर्जला उपवास रखती हैं। इसके प्रभाव से रिश्तों में प्रेम-विश्वास और खुशियां वास करती हैं।
पंचांग के अनुसार 16 मई को शनि जयंती के साथ शनिश्चरी अमावस्या का भी योग बन रहा है, जिससे यह दिन दोगुना फलदायी हो गया है। शनि अमावस्या पर व्रत और शनि देव की पूजा का विशेष महत्व होता है, इसलिए इस बार का संयोग भक्तों के लिए अत्यंत शुभ माना जा रहा है। इसके अलावा इस दिन सौभाग्य योग और शोभन योग भी बन रहे हैं।

सौभाग्य योग 15 मई दोपहर 2:21 बजे से 16 मई सुबह 10:26 बजे तक रहेगा, जिसके बाद शोभन योग शुरू होगा और यह 17 मई सुबह 6:15 बजे तक प्रभावी रहेगा। इन दोनों योगों को शुभ कार्यों और पूजा-पाठ के लिए अत्यंत लाभकारी माना जाता है।
शनि जयंती के दिन भरणी नक्षत्र प्रातःकाल से लेकर शाम 5:30 बजे तक रहेगा, इसके बाद कृत्तिका नक्षत्र का प्रभाव शुरू होगा। भरणी नक्षत्र के स्वामी शुक्र और देवता यमराज माने जाते हैं, जबकि कृत्तिका नक्षत्र के स्वामी सूर्य और देवता अग्नि हैं। इन सभी संयोगों के कारण इस वर्ष शनि जयंती का महत्व और भी अधिक बढ़ गया है।
- विक्रम संवत् – 2083
- संवत्सर नाम – रौद्र
- शक संवत् – 1948
- हिजरी सन् – 1447
- मु. मास – 27 जिल्काद
- अयन – उत्तरायण
- ऋतु – ग्रीष्म ऋतु
- मास – प्रथम ज्येष्ठ (शुद्ध)
- पक्ष – कृष्ण