19 जुलाई 2026 (रविवार) को आषाढ़ शुक्ल पक्ष की षष्ठी तिथि है。इस दिन स्कंद षष्ठी का व्रत रखा जाएगा और उत्तरा फाल्गुनी नक्षत्र शाम 06:12 बजे तक रहेगा, जिसके बाद हस्त नक्षत्र शुरू होगा。 19 जुलाई को शुक्ल पक्ष की त्रयोदशी और चतुर्दशी तिथियां मनाई जाएंगी। गुप्त नवरात्रि मुख्य रूप से गुप्त साधना, तांत्रिक क्रियाओं और दस महाविद्याओं की पूजा के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण 19 जुलाई को आषाढ़ शुक्ल पक्ष की पंचमी तिथि (तड़के 02:59 तक) है, जिसके बाद षष्ठी तिथि प्रारंभ हो जाएगी。 गुप्त नवरात्रि का यह समय मां छिन्नमस्ता और मां धूम्रा वाराही की साधना^ आज उत्तराफाल्गुनी और हस्त नक्षत्र के साथ रविवार का सुंदर संयोग बन रहा है। आज के दिन सूर्य देव को तांबे के लोटे से जल में लाल चंदन और कुमकुम मिलाकर अर्घ्य देना मान-सम्मान, यश और अच्छी सेहत प्रदान करता है। मां दुर्गा की 10 महाविद्याओं की साधना विशेष फलदायी & देवी दुर्गा के गुप्त या रहस्यमय रूपों का आह्वान

BY CHANDRA SHEKHAR JOSHI CHIEF EDITOR & PRESIDENT BAGLA MUKHI PEETH DEHRADUN Mob9412932030

गुप्त नवरात्रि, 10 महाविद्या, दस महाविद्या, मां दुर्गा, काली माता, तारा माता, त्रिपुर सुंदरी, भुवनेश्वरी, छिन्नमस्ता, भैरवी, धूमावती, बगलामुखी, मातंगी, कमला & आषाढ़ गुप्त नवरात्रि में अपार आध्यात्मिक शक्ति और रहस्यमय ऊर्जा समाहित है, इस अवधि के दौरान ऊर्जाएँ आंतरिक परिवर्तन, आध्यात्मिक जागृति और दिव्य मिलन के लिए अनुकूल & देवी दुर्गा के गुप्त या रहस्यमय रूपों का आह्वान किया जाता है, जिनमें दस महाविद्याएं और सप्तमातृकाएं शामिल हैं,

आषाढ़ नवरात्रि हिंदू धर्म में मनाई जाने वाली चार गुप्त नवरात्रियों में से एक है। यह पर्व देवी दुर्गा की उपासना, साधना और तंत्र-मंत्र सिद्धि के लिए विशेष महत्व रखता है। आषाढ़ शुक्ल प्रतिपदा से शुरू होकर नौ दिनों तक भक्त मां दुर्गा के विभिन्न स्वरूपों की पूजा, व्रत और जप करते हैं। माना जाता है कि इस दौरान की गई साधना से आध्यात्मिक शक्ति, मनोकामना पूर्ति और देवी की विशेष कृपा प्राप्त होती है।
आषाढ़ नवरात्रि को गुप्त नवरात्रि कहा जाता है, क्योंकि इस दौरान की जाने वाली साधनाएं गुप्त रूप से की जाती हैं। यह नवरात्रि विशेष रूप से तंत्र साधना, सिद्धि प्राप्ति और आध्यात्मिक उन्नति के लिए महत्वपूर्ण मानी जाती है। इस दौरान मां दुर्गा के नौ रूपों की पूजा की जाती है, जिससे जीवन में शक्ति, साहस और सफलता प्राप्त होती है।

सूर्योदय- सुबह 5: 33 बजे सूर्यास्त- शाम 7: 18 बजे आषाढ़ शुक्ल पंचमी तिथि 03:42 बजे (19 जुलाई) तक रहेगी, जिसके बाद षष्ठी तिथि शुरू होगी। 19 जुलाई को आषाढ़ माह के शुक्ल पक्ष की षष्ठी तिथि है। इस तिथि पर उत्तर फाल्गुनी नक्षत्र और परिघा योग का विशेष संयोग बनेगा। इस तिथि पर चंद्रमा का गोचर कन्या राशि में है, जिसके स्वामी बुधदेव होते हैं।

19 जुलाई को आषाढ़ शुक्ल पक्ष की षष्ठी तिथि और रविवार का दिन है। षष्ठी तिथि रविवार को देर रात 3 बजकर 30 मिनट तक रहेगी। 19 जुलाई को शाम 7 बजकर 23 मिनट तक परिघ योग रहेगा। साथ ही रविवार को शाम 6 बजकर 12 मिनट तक उत्तरा फाल्गुनी नक्षत्र रहेगा। इसके अलावा 19 जुलाई को स्कंद षष्ठी का व्रत किया जायेगा।
त्रयोदशी तिथि शाम 7:41 बजे तक प्रभावी रहेगी, जिसके बाद चतुर्थी तिथि का प्रभाव शुरू हो जाएगा। वहीं, मूल नक्षत्र 20 जुलाई को सुबह 2:55 बजे तक प्रभावी रहने का अनुमान है, जिसके बाद पूर्वाषाढ़ा नक्षत्र का प्रभाव शुरू हो जाएगा। चंद्रमा धनु राशि में और सूर्य कर्क राशि में दिखाई देने की संभावना है।
- आषाढ़ शुक्ल पक्ष की षष्ठी तिथि- 19 जुलाई 2026 को देर रात 3 बजकर 30 मिनट तक
- परिघ योग- 19 जुलाई 2026 को शाम 7 बजकर 23 मिनट तक
- उत्तरा फाल्गुनी नक्षत्र- 19 जुलाई 2026 को शाम 6 बजकर 12 मिनट तक
- 16 जुलाई 2026 विशेष- स्कंद षष्ठी व्रत
- ब्रह्म मुहूर्त- 04:44 ए एम से 05:27 ए एम
- अभिजित मुहूर्त- 12:18 पी एम से 01:11 पी एम
- विजय मुहूर्त- 02:56 पी एम से 03:49 पी एम
- गोधूलि मुहूर्त- 07:18 पी एम से 07:39 पी एम
- अमृत काल- 10:56 ए एम से 12:33 पी एम
- सर्वार्थ सिद्धि योग – पूरे दिन
- रवि योग- 06:11 ए एम से 06:12 पी एम
स्कंद षष्ठी को कुमार षष्ठी और संतान षष्ठी के नाम से भी जाना जाता है। स्कंद षष्ठी के अवसर पर मंदिरों में शिव-पार्वती की विशेष रूप से पूजा अर्चना की जाती है। ऐसा कहा जाता है कि यह व्रत विधिपूर्वक करने से सुयोग्य संतान की प्राप्ति होती है और यदि पहले से संतान है और संतान को किसी प्रकार की समस्या है तो यह व्रत संतान को समस्याओं से बचाने में सहायता करता है। साथ ही कहते हैं कि स्कंद माता कुमार कार्तिकेय के पूजन से जितनी प्रसन्न होती हैं, उतनी वे स्वयं के पूजन से भी नहीं होती हैं। मयूर पर आसीन देव सेनापति कुमार कार्तिकेय की आराधना दक्षिण भारत में सबसे ज्यादा होती है।
आध्यात्मिक उन्नति और आंतरिक जागृति ; आषाढ़ गुप्त नवरात्रि मुख्य रूप से अघोरा परंपराओं का पालन करने वालों द्वारा मनाई जाती है , जहाँ आध्यात्मिक उत्थान, सिद्धियाँ और देवी माँ का आशीर्वाद प्राप्त करने के लिए गुप्त अनुष्ठान और साधनाएँ की जाती हैं। ऐसा माना जाता है कि इस अवधि के दौरान ऊर्जाएँ आंतरिक परिवर्तन, आध्यात्मिक जागृति और दिव्य मिलन के लिए अनुकूल होती हैं।
गुप्त नवरात्रि का धार्मिक महत्व
1. देवी शक्ति की विशेष आराधना: गुप्त नवरात्रि को मां दुर्गा और आदिशक्ति की उपासना के लिए अत्यंत शुभ माना जाता है। इन नौ दिनों में देवी के विभिन्न स्वरूपों की पूजा कर भक्त मानसिक और आत्मिक शक्ति प्राप्त करता है।
2. एकांत साधना का महत्व: इस नवरात्रि को गुप्त इसलिए कहा जाता है क्योंकि इसमें पूजा और साधना बिना दिखावे के, शांत और निजी रूप से की जाती है। ऐसी साधना को अधिक प्रभावशाली और फलदायी माना गया है।
3. मंत्र जाप और ध्यान का प्रभाव: धार्मिक मान्यताओं के अनुसार इन दिनों मंत्र जप, ध्यान और तपस्या करने से विशेष लाभ मिलता है। इस समय की गई साधना साधक के जीवन में सकारात्मक बदलाव लाती है।
4. मन और आत्मा की शुद्धि: व्रत और संयम के पालन से मन, शरीर और आत्मा की शुद्धि होती है। व्यक्ति नकारात्मक सोच से दूर होकर शांति और संतुलन की ओर बढ़ता है।
5. बाधाओं से मुक्ति और सुरक्षा: मान्यता है कि माघ गुप्त नवरात्रि में की गई सच्ची उपासना से जीवन की परेशानियां कम होती हैं और मां दुर्गा अपने भक्तों को हर प्रकार की नकारात्मक शक्तियों से संरक्षण देती हैं।
by ; CHANDRA SHEKHAR JOSHI ;
Award : Sanatan Dharma Journalist of The Year 2026 अवॉर्ड: सनातन धर्म जर्नलिस्ट ऑफ द ईयर , नई दिल्ली में सम्मानित
Awardy : Aadi Guru shankaracharya Sanatani Sewa Puruskar आदि गुरु शंकराचार्य सनातनी सेवा पुरस्कार, पूर्व केंद्रीय शिक्षा मंत्री डॉक्टर रमेश पोखरियाल निशंक जी द्वारा सम्मानित &
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महामाई पीतांबरा श्री बगलामुखी शक्ति पीठ देहरादून
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