25 मार्च, बुधवार, चैत्र माह सप्तमी, 01 बजकर 50 मिनट के बाद अष्टमी, सर्वार्थसिद्धि योग और राजयोग का विशेष संयोग & 26 मार्च 2026 का दुर्लभ संयोग: अष्टमी-नवमी एक साथ & कलश विसर्जन दशमी तिथि & अष्टमी,बुधवार और नवरात्रि, अद्भुत संयोग,,

 25 मार्च चैत्र माह के शुक्ल पक्ष की सप्तमी तिथि & 25 मार्च 2026, बुधवार को चैत्र नवरात्रि शुक्ल पक्ष की सप्तमी तिथि है। इस तिथि पर मां दुर्गा के कालरात्रि की पूजा-आराधना की जाती है। सप्तमी तिथि दोपहर 01 बजकर 50 मिनट तक रहेगी फिर इसके बाद अष्टमी तिथि लग जाएगी। मृगशिरा नक्षत्र सायं 5:33 बजे तक रहेगा और फिर आर्द्रा नक्षत्र प्रारंभ होगा। सर्वार्थसिद्धि योग और राजयोग का विशेष संयोग बन रहा है, जो किसी भी शुभ कार्य के लिए अत्यंत उत्तम माना जाता है। शुक्र का अश्विनी नक्षत्र मेष राशि में प्रवेश रात्रि 5-09 पर, ब्रह्म मुहूर्त – 04:45 AM से 05:33 AM गोधूलि मुहूर्त – 06:34 PM से 06:57 PM BY CHANDRA SHEKHAR JOSHI CHIEF EDITOR 9412932030

गणेश पुराण के अनुसार : अष्टमी, और बुधवार और ऊपर से नवरात्रि,,, अहा,,, अद्भुत संयोग,,
नई कटोरी में हरी मूंग, गुड की डली, 5 बेलपत्र , दक्षिणा रख कर रोगग्रस्त व्यक्ति का नाम , पता, गोत्र उच्चारण कर स्वयं के स्वस्थ्य दीर्घायु की कामना कर 21 बार वार करके मंदिर में श्रीगणेश जी के सीधे हाथ की तरफ जमीन पर रखवाना है , वो गणेश मंत्र बोलेंगे, और रोगी स्वयं रखेगा

BY CHANDRA SHEKHAR JOSHI CHIEF EDITOR 9412932030

 साल 2026 में तिथियों के फेरबदल के कारण एक बहुत ही दुर्लभ संयोग बन रहा है 26 मार्च 2026 का दुर्लभ संयोग: अष्टमी-नवमी एक साथ & अष्टमी तिथि का प्रारंभ 25 मार्च को दोपहर 1:50 बजे से हो जाएगा, लेकिन उदय तिथि के अनुसार 26 मार्च को ही अष्टमी मनाई जाएगी। सुबह 11:49 तक अष्टमी रहेगी, इसलिए कन्या पूजन के लिए सुबह का समय सबसे श्रेष्ठ है।

नवमी तिथि 26 मार्च की सुबह 11:48 से शुरू होगी और 27 मार्च की सुबह 10:06 तक रहेगी। उदय तिथि का महत्व होने के कारण महानवमी का पर्व और कन्या पूजन 27 मार्च को करना शास्त्रसम्मत होगा। 26 मार्च 2026 का दिन आध्यात्मिक दृष्टि से बहुत खास है। इस दिन सूर्योदय के समय अष्टमी है और दोपहर में नवमी लग रही है। इस कारण दुर्गा अष्टमी, संधि पूजा, अन्नपूर्णा अष्टमी और राम जन्मोत्सव (राम नवमी) का प्रभाव एक ही दिन देखने को मिलेगा।

 27 मार्च को सुबह 10:06 बजे नवमी तिथि समाप्त होने के बाद ही अन्न ग्रहण करें।

 2 से 10 वर्ष की कन्याओं को माँ का स्वरूप मानकर आमंत्रित करें। उनके पैर धोकर, उन्हें कुमकुम का तिलक लगाएं और हलवा, पूरी व चने का भोग खिलाएं। सामर्थ्य अनुसार दक्षिणा या उपहार देकर उनके चरण स्पर्श करें।

कलश विसर्जन दशमी तिथि विसर्जन से पहले माँ से अनजाने में हुई भूल के लिए क्षमा प्रार्थना अवश्य करें। कलश का पवित्र जल पूरे घर में छिड़कें, इससे नकारात्मक ऊर्जा दूर होती है। देवी भागवत पुराण के अनुसार, जो भक्त अष्टमी और नवमी दोनों दिन माँ की विशेष अर्चना करते हैं, उन्हें “परम पद” की प्राप्ति होती है।  नवरात्रि में मंत्र जाप और दुर्गा सप्तशती का पाठ करना आध्यात्मिक शक्ति को बढ़ाता है।

काशीपुर  यहां स्थित मां बाल सुंदरी देवी मंदिर , जिसे चैती मंदिर भी कहा जाता है,

मां बाल सुंदरी बुक्सा समुदाय की आराध्य हैं। गदरपुर और रामनगर जैसे इलाकों से यह समुदाय आज भी यहां विशेष चिरागी पूजा के लिए आता है। आस्था का वो केंद्र है, जिसका संबंध सीधे सतयुग से लेकर मुगल काल तक जुड़ा है।  भगवान विष्णु ने शिव जी के मोह को भंग करने के लिए माता सती के शरीर के अंग काटे थे, तब यहां मां की बाईं भुजा गिरी थी। इसी कारण इसे 52 शक्तिपीठों में से एक माना जाता है। दिलचस्प बात यह है कि यहाँ माँ की कोई पारंपरिक मूर्ति नहीं है, बल्कि एक प्राकृतिक शिला (चट्टान) पर उनकी भुजा की आकृति उभरी हुई है, जिसकी भक्त सदियों से पूजा कर रहे हैं। इतिहास गवाह है कि मुगल शासक औरंगजेब मंदिरों को नुकसान पहुंचाने के लिए जाना जाता था, लेकिन इस दरबारे-खास में उसे भी झुकना पड़ा। कहा जाता है कि जब उसकी बहन जहांआरा गंभीर रूप से बीमार पड़ी और दुनिया के तमाम हकीम हार गए, तब मां बाल सुंदरी ने एक छोटी कन्या के रूप में जहांआरा को दर्शन दिए। मां ने आदेश दिया कि यदि मंदिर का जीर्णोद्धार कराया जाए, तो वह स्वस्थ हो जाएगी। औरंगजेब ने तुरंत मंदिर का निर्माण कराया, जिसकी गवाही आज भी मंदिर के ऊपर बने तीन गुंबद देते हैं जो मस्जिद जैसी वास्तुकला की याद दिलाते हैं। मंदिर परिसर में एक प्राचीन कदम का पेड़ है जो बाहर से हरा-भरा दिखता है, लेकिन अंदर से पूरी तरह खोखला है। इसके पीछे एक रोचक किस्सा है: सालों पहले एक महात्मा की चुनौती पर यहां के पांडा (पुजारी) ने अपनी शक्ति से इस पेड़ को सुखा दिया था और फिर जल छिड़क कर इसे दोबारा जीवित कर दिया। तब से यह पेड़ अपनी अनूठी स्थिति में खड़ा है।

पुराने समय में यहाँ घोड़ों का ‘नखासा बाजार’ सजता था। मशहूर डाकू सुल्ताना और फूलन देवी भी यहां गुप्त रूप से बेहतरीन नस्ल के घोड़े खरीदने आते थे। चैती मैदान परिसर में ही मोतेश्वर महादेव का मंदिर है। महाभारत कालीन इस शिवलिंग की मोटाई इतनी अधिक है कि इनका नाम ही मोतेश्वर पड़ गया। स्कंद पुराण के अनुसार, यह भगवान शिव का 12वां उप-ज्योतिर्लिंग है। मान्यता है कि हरिद्वार से पैदल कांवड़ लाकर यहां जल चढ़ाने वाले को सीधे मोक्ष की प्राप्ति होती है।

साल 2018 से इस ऐतिहासिक मेले का जिम्मा स्थानीय प्रशासन संभाल रहा है,

चैत्र नवरात्रि के दौरान जागृत पीठ में महामाई पीतांबरा श्री बगलामुखी की दिव्य ऊर्जा और भी ज्यादा शक्तिशाली हो जाती है, जिससे हर प्रार्थना और भी ज्यादा प्रभावशाली हो जाती है और हर भावना गहराई से सुनाई देती है.

बनारस में यह देवी अपनी पीठ में न केवल बोली गई प्रार्थनाओं को सुनती हैं, बल्कि अनकहे भावों को भी समझ जाती हैं. लोग दर्द, उलझन और आशा की उम्मीद को लेकर उनके पास आते हैं

शक्तिशाली पीठों की रचना हुई,
हर पीठ में एक अनूठी शक्ति समाहित है, जो भक्तों को अलग-अलग आशीर्वाद प्रदान करती है. इन सभी पवित्र स्थानों में एक खास और गहरा आध्यात्मिक महत्व है, जिसे केवल सच्चे मन से ही जान सकते हैं.

ये वो पवित्र स्थान है, जहां देवी की ऊर्जा विद्यमान रहती है और भक्तों को आशीर्वाद देती है. यह दिव्य शक्ति हर प्रार्थना को, यहां तक कि अनकही प्रार्थनाओं को भी सुनती हो? यह भी ध्यान रखिए कि
एक छिपी हुई शक्ति जो आपको अदृश्य रूप से घेरे रहती है, लेकिन इस एनर्जी को महसूस करने के लिए बहुत ज्यादा ऊर्जा की आवश्यकता होती हैं, आत्मा की गहराई में उतरना जरूरी है.

वाराणसी में सती का एक पवित्र अंश गिरा, जिससे मां विशालाक्षी का जन्म हुआ. वह केवल देवी ही नहीं हैं, बल्कि करुणा, शक्ति और मौन रक्षका भी हैं. भक्तों का मानना है कि, वह न केवल बोली गई प्रार्थनाओं को सुनती हैं, बल्कि अनकहे भावों को भी समझ जाती हैं.
इसी प्रकार महामाई पीतांबरा श्री बगलामुखी के दरबार में बिल्कुल भी न बोलें. बस उनकी उपस्थिति का अनुभव करें. अपने विचारों को शांत होने दें और उन्हें अपने अंदर स्थिर होने दें.

माँ बगलामुखी मंदिर में दर्शन करना अत्यधिक फलदायी माना जाता है, खासकर नवरात्रि के दौरान:

नवरात्रि में मां बगलामुखी की साधना अत्यंत फलदायी और ओजस्वी मानी जाती है, नवरात्रि के दौरान माता बगलामुखी की पूजा में उन्हें पीले वस्त्र, और पीले भोग अर्पित किए जाते हैं, और वे अपने भक्तों को सुरक्षा प्रदान करने के लिए अभय मुद्रा में होती हैं।
नवरात्रि में माता बगलामुखी (पीताम्बरा देवी) के दर्शन और साधना, हर तरह की बाधाओं को दूर करने और शक्ति प्राप्त करने के लिए अत्यंत प्रभावशाली मानी जाती है।

नवरात्रि के दौरान माता बगलामुखी की पूजा, कीर्तन आरती से कठिन से कठिन समस्याओं का समाधान होता है।
यदि आपकी कोई इच्छा पूरी नहीं हो रही है, बार-बार बाधा आ रही है, तो नवरात्रि में पीले वस्त्र पहनकर माँ पीताम्बरा के दर्शन भेट चढ़ाने व पूजा , कीर्तन आरती करने से सफलता मिलती है।

यह साधारण संयोग नहीं है:सात जन्मों के पाप नष्ट हो जाते हैं. बुध अष्टमी का उपाय करने से धन-धान्य और ऐश्वर्य की प्राप्ति होती है: चन्द्रशेखर जोशी बगलामुखी पीठ बंजारा वाला देहरादून

पंचांग की गणना के अनुसार, अष्टमी तिथि 25 मार्च को दोपहर में 1 बजकर 51 मिनट पर आरंभ होकर अगले दिन 26 मार्च को सुबह में 11 बजकर 49 मिनट पर समाप्त हो रही है।
अद्भुत उपाय :
गणेश पुराण के अनुसार : अष्टमी, और बुधवार और ऊपर से नवरात्रि,,, अहा,,, अद्भुत संयोग,,
नई कटोरी में हरी मूंग, गुड की डली, 5 बेलपत्र , दक्षिणा रख कर रोगग्रस्त व्यक्ति का नाम , पता, गोत्र उच्चारण कर स्वयं के स्वस्थ्य दीर्घायु की कामना कर 21 बार वार करके मंदिर में श्रीगणेश जी के सीधे हाथ की तरफ जमीन पर रखवाना है , वो गणेश मंत्र बोलेंगे, और रोगी स्वयं रखेगा

बुद्ध अष्टमी के दिन भगवान् गणेश को मोदक का प्रसाद चढ़ाये. बुद्ध अष्टमी के दिन भगवान् गणेश को सिंदुर अर्पित करें. मंदिर में जाकर गणेश जी को दूर्वा चढ़ाएं. अगर आप भगवान गणेश को दूर्वा की 11 या 21 गांठ चढ़ाते है तो इससे आपको बहुत जल्द फल प्राप्त होगा.

हमारे शास्त्रों में अष्टमी तिथि को बहुत ही महत्वपूर्ण बताया गया है.
जिन लोगों की कुंडली में बुध कमजोर होता है उनके लिए बुध अष्टमी का व्रत बहुत ही फलदाई होता है.

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