9 मार्च 2026 सोमवार: सोमवार का दिन ही भगवान शिव को प्रसन्न करने के लिए सबसे खास क्यों

9 मार्च 2026, सोमवार को चैत्र कृष्ण षष्ठी तिथि (रात 11:27 तक) है। आज विशाखा नक्षत्र (शाम 4:11 तक) रहेगा और व्याघात योग सुबह 7:36 तक, फिर हर्षण योग होगा। चंद्रमा सुबह 9:29 तक तुला और फिर वृश्चिक राशि में रहेंगे। सूर्य कुंभ राशि में हैं। राहुकाल सुबह 08:00 से 09:28 बजे तक रहेगा।BY CHADRA SHEKHAR JOSHI Mob. 9412932030

सोमवार का दिन विशेष रूप से भगवान शिव की पूजा के लिए बेहद शुभ माना गया है। मान्यता है कि इस दिन सच्चे मन से भोलेनाथ की आराधना करने से भक्तों की मनोकामनाएं जल्दी पूरी होती हैं और जीवन की परेशानियां दूर होने लगती हैं। लेकिन क्या आपने कभी सोचा है कि आखिर सोमवार का दिन ही भगवान शिव को प्रसन्न करने के लिए सबसे खास क्यों माना जाता है? आइए जानते हैं इसके पीछे छिपे धार्मिक और पौराणिक रहस्य।

सोमवार शब्द “सोम” से बना है, जिसका अर्थ चंद्रमा होता है। पौराणिक कथाओं के अनुसार चंद्र देव ने अपने कष्टों से मुक्ति पाने के लिए भगवान शिव की कठोर तपस्या की थी। उनकी भक्ति से प्रसन्न होकर भगवान शिव ने उन्हें क्षय रोग से मुक्त कर दिया। तभी से चंद्रमा के स्वामी के रूप में भगवान शिव को “सोमेश्वर” कहा जाने लगा और सोमवार का दिन उनकी पूजा के लिए सबसे शुभ माना गया।

माता पार्वती ने भगवान शिव को पति के रूप में पाने के लिए कठोर तपस्या की थी। उन्होंने लगातार 16 सोमवार के व्रत रखकर शिव जी की आराधना की। उनकी अटूट भक्ति से प्रसन्न होकर भगवान शिव ने उन्हें वरदान देने का वचन दिया। तब माता पार्वती ने शिव जी को ही पति के रूप में मांगा और भगवान शिव ने उनकी इच्छा पूरी की। इसी कारण से 16 सोमवार का व्रत आज भी विशेष महत्व रखता है।

सोमवार के दिन भक्त सुबह जल्दी उठकर स्नान करते हैं और मंदिर जाकर शिवलिंग पर जल, दूध या बेलपत्र अर्पित करते हैं। इसके बाद भगवान शिव और माता पार्वती की पूजा-अर्चना की जाती है। इस व्रत में शाम या तीसरे पहर के बाद ही भोजन किया जाता है। व्रत के दौरान शिव कथा सुनना और शाम को आरती करना भी जरूरी माना जाता है।

कब है पापमोचनी एकादशी? हम इंसान हैं और जाने-अनजाने हमसे भूल हो ही जाती है। लेकिन हमारे शास्त्रों में एक ऐसा खास दिन बताया गया है, जो आपके दिल और आत्मा के इस बोझ को पूरी तरह उतार सकता है। वह पावन दिन है पापमोचनी एकादशी।  पाप यानी बुरा कर्म और मोचनी यानी मुक्त करने वाली। यह एकादशी केवल एक व्रत नहीं, बल्कि खुद को आध्यात्मिक रूप से रीसेट करने का एक ईश्वरीय अवसर है। चैत्र मास के कृष्ण पक्ष में आने वाली यह एकादशी साल की आखिरी एकादशी मानी जाती है। इसके ठीक बाद चैत्र नवरात्रि और हिंदू नववर्ष की शुरुआत होती है।

 10 मार्च को रांधा-पुआ और शीतला सप्तमी तथा 11 मार्च को शीतलाष्टमी और बसौड़ा पूजा मनाई जाएगी।

9 मार्च 2026, सोमवार: हिंदू पंचांग के अनुसार आज चैत्र मास के कृष्ण पक्ष की षष्ठी तिथि है। आज विशाखा नक्षत्र के बाद अनुराधा नक्षत्र प्रारंभ होगा। साथ ही व्याघात और हर्षण योग का संयोग बन रहा है। 

व्रत / दिवस विशेष – भद्रा रात्रि 11-28 से प्रारम्भ, श्री एकनाथ षष्ठी, श्री वनचंद्र जयंती, (विवाह मुहूर्त अनूराधा नक्षत्र में),

दूध पीकर या दही व गुड़ का सेवन कर, शुभ शगुन लेकर यात्रा प्रारम्भ करें। सूर्योदय कालीन सूर्य के दर्शन करके ही कार्य प्रारंभ करें। इससे राहुकाल का दुष्प्रभाव कम होगा। राहु काल वेला – (मध्यमान से) दिन 7.30 से 9.00 तक

 9 मार्च 2026, सोमवार: हिंदू पंचांग के अनुसार आज चैत्र मास के कृष्ण पक्ष की षष्ठी तिथि है। आज विशाखा नक्षत्र के बाद अनुराधा नक्षत्र प्रारंभ होगा। साथ ही व्याघात और हर्षण योग का संयोग बन रहा है। आज के दिन राहुकाल, दिशा शूल, चौघड़िया, तिथि, नक्षत्र और शुभ मुहूर्त जानना अत्यंत महत्वपूर्ण माना जाता है क्योंकि इन्हीं के आधार पर शुभ कार्यों, यात्रा और पूजा-पाठ का समय निर्धारित किया जाता है।

 10 मार्च को रांधा-पुआ और शीतला सप्तमी तथा 11 मार्च को शीतलाष्टमी और बसौड़ा पूजा मनाई जाएगी। होली के बाद सातवें और आठवें दिन देवी शीतला माता की पूजा की परंपरा है। इन्हें शीतला सप्तमी या शीतलाष्टमी कहा जाता है। शीतला माता का जिक्र स्कंद पुराण में मिलता है। पौराणिक मान्यता है कि इनकी पूजा और व्रत करने से चेचक के साथ ही अन्य तरह की बीमारियां और संक्रमण नहीं होता है। चैत्र मास में शीतला माता के लिए शीतला सप्तमी 10 मार्च और अष्टमी 11 मार्च का व्रत-उपवास किया जाता है। इस व्रत में ठंडा खाना खाने की परंपरा है। जो लोग ये व्रत करते हैं, वे एक दिन पहले बनाया हुआ खाना ही खाते हैं। 9 और 10 मार्च को रांधा पुआ होगा।

10 मार्च को रांधा पुआ

जहां पर शीतला अष्टमी मनाई जायेगी। वहां पर 10 मार्च को रांधा पुआ होगा। कहीं पर सप्तमी के दिन और कहीं पर अष्टमी के दिन ठंडा भोजन किया जाता है। दरअसल, ये समय शीत ऋतु के जाने का और ग्रीष्म ऋतु के आने का समय है। इस दौरान मौसमी बीमारियां होने की संभावनाएं बढ़ जाती हैं। शीतला सप्तमी और अष्टमी पर ठंडा खाना खाने से हमें मौसमी बीमारियों से लड़ने की शक्ति बढ़ती है। ऐसी मान्यता है।

दिलचस्प पौराणिक कथा: जब एक अप्सरा बनी पिशाचिनी

भविष्योत्तर पुराण में एक बेहद रोमांचक कहानी मिलती है। च्यवन ऋषि के पुत्र मेधावी ऋषि घोर तपस्या में लीन थे। उनकी शक्ति से डरकर देवराज इंद्र ने उनकी तपस्या भंग करने के लिए मंजुघोषा नाम की अप्सरा को भेजा। कामदेव की मदद से मंजुघोषा ने ऋषि को मोहित कर लिया।

मोहपाश में बंधे मेधावी ऋषि को समय का भान ही नहीं रहा। उन्हें लगा कि कुछ ही पल बीते हैं, जबकि असल में 57 साल बीत चुके थे। जब उन्हें अपनी भूल का अहसास हुआ, तो उन्होंने क्रोध में आकर मंजुघोषा को ‘पिशाचिनी’ बनने का श्राप दे दिया।

बाद में जब दोनों को अपनी गलती का पछतावा हुआ, तब च्यवन ऋषि ने उन्हें पापमोचनी एकादशी का व्रत करने की सलाह दी। इस व्रत के प्रभाव से मंजुघोषा पिशाच योनि से मुक्त होकर पुनः सुंदर अप्सरा बन गई और मेधावी ऋषि के भी सभी पाप धुल गए।

इस व्रत को करने के फायदे

मानसिक शांति: पुराने पापों के पछतावे से मुक्ति मिलती है।

नकारात्मकता का नाश: बुरी शक्तियों और नकारात्मक विचारों का प्रभाव खत्म होता है।

मोक्ष की प्राप्ति: भगवद गीता के अनुसार, जो अनन्य भाव से प्रभु की शरण में आता है, वह जीवन-मृत्यु के चक्र से मुक्त हो जाता है।

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