12 सितंबर 2026, शनिवार विक्रम संवत: 2083 मास: भाद्रपद पक्ष: शुक्ल पक्ष ऋतु: शरद ऋतु & तिथि: प्रतिपदा तिथि सुबह 7:46 तक, इसके बाद द्वितीया तिथि आरंभ। नक्षत्र: उत्तर फाल्गुनी नक्षत्र दोपहर 12:55 तक, इसके बाद हस्त नक्षत्र लग जाएगा। योग: शुभ योग दोपहर 3:09 तक, इसके बाद शुक्ल योग & सूर्योदय: सुबह 6:04 बजे सूर्यास्त: शाम 6:29 बजे & अभिजित मुहूर्त: दोपहर 11:52 से दोपहर 12:42 तक। ब्रह्म मुहूर्त: सुबह 4:52 से सुबह 5:39 बजे तक।
विजय मुहूर्त: दोपहर 2:38 से दोपहर 3:27 बजे तक। त्रिपुष्कर योग: सुबह 7:46 से दोपहर 12:55 तक
देहरादून में चार प्रसिद्ध सिद्धपीठ (चार सिद्ध) लक्ष्मण सिद्ध, कालू सिद्ध, मानक (माणक) सिद्ध और मांडू सिद्ध बिना अन्न ग्रहण किए एक ही दिन में इन चारों सिद्धपीठों के दर्शन करने से भक्तों की सभी मनोकामनाएं पूरी होती हैं मान्यता के अनुसार यह स्थान संत स्वामी लक्ष्मण सिद्ध की तपोस्थली और समाधि स्थल भी है। यह ऋषि दत्तात्रेय के चौरासी सिद्धों में से एक माना जाता है।

- by ; CHANDRA SHEKHAR JOSHI ;
- Award : Sanatan Dharma Journalist of The Year 2026 अवॉर्ड: सनातन धर्म जर्नलिस्ट ऑफ द ईयर , नई दिल्ली में सम्मानित
- Awardy : Aadi Guru shankaracharya Sanatani Sewa Puruskar आदि गुरु शंकराचार्य सनातनी सेवा पुरस्कार, पूर्व केंद्रीय शिक्षा मंत्री डॉक्टर रमेश पोखरियाल निशंक जी द्वारा सम्मानित &
- Founder President & Sadhak संस्थापक साधक अध्यक्ष :
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- महामाई पीतांबरा श्री बगलामुखी शक्ति पीठ देहरादून
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- #President Uttrakhand: Rastriya shashkat Hindu Maha Sangh ( राष्ट्रीय सशक्त हिन्दू महासंघ, )
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- Rashtriya Saint Suraksha Parishad (HQ Gujrat) राष्ट्रीय संत सुरक्षा महापरिषद
- मुख्यालय:
- Nanda Devi Enclave Banjara Wala Dehradun Uttarakhand Cont. us: Mob 9412932030 Mail himalayauk@gmail.com

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BY CHANDRA SHEKHAR JOSHI CHIEF EDITOR & PRESIDENT; BAGLA MUKHI PEETH DEHRADUN 9412932030
सप्तऋषि कौन हैं? सप्तऋषि वे सात मानस-पुत्र ऋषि माने जाते हैं, जिनके माध्यम से वेदों का ज्ञान प्राप्त और प्रसारित हुआ। सनातन परंपरा में इन्हें गोत्र व्यवस्था का प्रमुख आधार बताया है। इसका अर्थ है कि आज जीवित लगभग हर हिंदू परिवार अपनी वंश परंपरा को इनमें से किसी न किसी ऋषि के नाम से जोड़ता है। जब विवाह, श्राद्ध या किसी धार्मिक संकल्प के दौरान अपना गोत्र बताया जाता है, तो परंपरागत रूप से इसी ऋषि-कुल या वंश परंपरा की पहचान बताई जाती है।
12 सितंबर को भाद्रपद शुक्ल पक्ष की प्रतिपदा तिथि और शनिवार का दिन है। प्रतिपदा तिथि शनिवार को सुबह 7 बजकर 47 मिनट तक रहेगी, उसके बाद द्वितीया लग जायेगी। 12 सितंबर को दोपहर बाद 3 बजकर 10 मिनट तक शुभ योग रहेगा। अपने नाम की तरह ही यह बड़ा शुभ माना जाता है। इस योग में किये गये कामों से शुभ फलों की प्राप्ति होती है। साथ ही प्रसिद्धि की भी प्राप्ति होती है। साथ ही शनिवार को दोपहर 12 बजकर 56 मिनट तक उतराफाल्गुनी नक्षत्र रहेगा।
- भाद्रपद शुक्ल पक्ष की प्रतिपदा तिथि- 10 सितंबर 2026 को सुबह 7 बजकर 47 मिनट तक रहेगी, उसके बाद द्वितीया लग जायेगी। शुभ योग- 12 सितंबर 2026 को दोपहर बाद 3 बजकर 10 मिनट तक
- उतराफाल्गुनी नक्षत्र- 12 सितंबर 2026 को दोपहर 12 बजकर 56 मिनट तक
- सूर्योदय- सुबह 6:04 बजे सूर्यास्त- शाम 6:29 बजे

उतराफाल्गुनी नक्षत्र रहेगा। आकाशमंडल में स्थित 27 नक्षत्रों मे से उत्तरा फाल्गुनी बारहवां नक्षत्र है । इस नक्षत्र का प्रतीक चिन्ह विश्राम के लिए प्रयोग की जाने वाली चारपाई अथवा बेड के पिछले दो पायों को माना जाता है । साथ ही आपको बता दूं कि इस नक्षत्र का पहला चरण सिंह राशि में आता है, जबकि इसके बाकी तीन चरण कन्या राशि में आते हैं। लिहाजा सिंह और कन्या राशि के जातकों पर उत्तरा फाल्गुनी नक्षत्र का प्रभाव रहता है। उत्तरा फाल्गुनी नक्षत्र के स्वामी सूर्यदेव हैं।
ऋषि पंचमी का व्रत 15 सितंबर, मंगलवार
ऋषि पंचमी का व्रत 15 सितंबर, मंगलवार को रखा जाएगा। पंचमी तिथि 15 सितंबर को सुबह 7 बजकर 44 मिनट से शुरू होगी और 16 सितंबर को सुबह 8 बजकर 59 मिनट तक रहेगी। इस पर्व में पूजा के लिए मध्याह्न (दोपहर) में पंचमी तिथि का होना महत्वपूर्ण है। 15 सितंबर को पंचमी तिथि दोपहर के समय भी मौजूद रहेगी, इसलिए इसी दिन ऋषि पंचमी का व्रत और पूजन किया जाएगा।
ऋषि पंचमी पर सप्तऋषियों का स्मरण करते हुए यह मंत्र पढ़ा जाता है:
कश्यपोत्रिर्भरद्वाजो विश्वामित्रोथ गौतमः
जमदग्निर्वसिष्ठश्च सप्तैते ऋषयः स्मृताः
दहन्तु पापं सर्व गृह्णन्त्वर्ध्यं नमो नमः॥
कश्यप, अत्रि, भरद्वाज, विश्वामित्र, गौतम, जमदग्नि और वशिष्ठ- इन सातों को सप्तऋषि कहा जाता है। वे मेरे सभी पापों को जला दें या नष्ट कर दें और मेरे द्वारा अर्पित इस अर्घ्य को स्वीकार करें। उन्हें बार-बार प्रणाम है।
इस दिन सप्तऋषियों का पूजन करके उनके प्रति कृतज्ञता व्यक्त की जाती है। इस दिन दान और सात्विक भोजन करने की भी परंपरा है। हालांकि, ऋषि पंचमी को कुछ परंपराओं में महिलाओं और मासिक धर्म से जुड़ी प्राचीन शुद्धि-अशुद्धि की मान्यताओं से भी जोड़ा जाता है। लेकिन इसे केवल मासिक धर्म से जुड़े दोषों से मुक्ति का व्रत कहना पूरी परंपरा को सीमित कर देगा। इसका प्रमुख पहलू सप्तऋषियों की आराधना, उनके प्रति सम्मान और ऋषि परंपरा के प्रति कृतज्ञता व्यक्त करना है।
पितरों के श्राद्ध में केवल पुत्र या पुरुष वंशजों की भूमिका ही नहीं मानी गई है। श्राद्ध में बेटी और नातिन की होती है खास भूमिका
श्राद्ध पक्ष में पितरों के प्रति सम्मान और कृतज्ञता व्यक्त करने के लिए तर्पण, पिंडदान और भोजन कराने जैसी परंपराएं निभाई जाती हैं। इन कर्मों को अक्सर पुत्र और पुरुष वंशजों से जोड़कर देखा जाता है, लेकिन धार्मिक मान्यताओं में परिवार की बेटियों की भूमिका को भी खास माना गया है। गरुड़ पुराण से जुड़ी मान्यता में बेटी, नातिन, नाती और बहन को श्राद्ध कर्म में शामिल करने की बात कही गई है। यही वजह है कि कई परिवारों में श्राद्ध के दौरान इन रिश्तों को विशेष रूप से आमंत्रित किया जाता है।
पितरों का श्राद्ध तब तक पूरा नहीं माना जाता, जब घर की बेटी, नातिन, नाती या बहन को न बुलाया जाए।
बेटी-बहन को बुलाने की मान्यता
मान्यता है कि श्राद्ध के अवसर पर बेटी, बहन और नातिन को भोजन कराना शुभ माना जाता है। ऐसा माना जाता है कि इससे पितरों को संतुष्टि प्राप्त होती है। जिन परिवारों में बेटी या बहन का रिश्ता मौजूद नहीं होता, वहां दूर के रिश्ते की बहनों या बेटियों को भी निमंत्रित करने की परंपरा बताई गई है।
नातिन और भांजी की मौजूदगी
दी गई मान्यता में नातिन के साथ मृत व्यक्ति की भांजी और भांजी की बेटी को भी श्राद्ध भोज कराने का उल्लेख मिलता है। इस तरह श्राद्ध की परंपरा को केवल पुत्र या पुरुष वंशज तक सीमित नहीं माना गया है। बेटी, नातिन, बहन और अन्य करीबी रिश्तों को भी पितरों के सम्मान से जुड़े इस संस्कार में विशेष स्थान दिया गया है।

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