31 अगस्त – गणेश चतुर्थी पर पांच राजयोग और 300 सालों बाद ग्रहों का दुर्लभ संयोग-वाममुखी गणपति मूर्ति बहुत शुभ- गणपति विसर्जन क्यों ?

  31 अगस्त 2022 इस बार गणेश चतुर्थी पर 300 साल बाद ग्रहों की शुभ स्थिति बन रही और लंबोदर योग भी है। #31 अगस्त 2022 गणपति जी तीन बेहद शुभ योग में पधार रहे हैं. गणेश चतुर्थी रवि, ब्रह्म और शुक्ल योग का संयोग बन रहा है. साथ ही इस दिन बुधवार होने से गणपति का जन्मोत्सव बेहद खास होगा. इस साल गणेश स्थापना मुहूर्त सुबह 11.05 से दोपहर 1.38 तक है.  गणपति की पूजा में तुलसी वर्जित है. गणपति की स्थापना के मंत्र  अस्य प्राण प्रतिषठन्तु अस्य प्राणा: क्षरंतु च। श्री गणपते त्वम सुप्रतिष्ठ वरदे भवेताम।।   इस साल अनंत चतुर्दशी 9 सितंबर 2022, शुक्रवार को है.मान्यता के अनुसार इस दिन विधि विधान से पूजन कर बप्पा का विसर्जन किया जाता है.  Execlusive Report by Chandra Shekhar Joshi Editor in Chief; www.himalayauk.org (Leading Newsportal & Print Media) Publish at Dehradun & Haridwar Mob. 9412932030 Mail; himalayauk@gmail.com

31 अगस्त को गणेश चतुर्थी पर गणेशजी की स्थापना और पूजा के लिए दिनभर में कुल 6 शुभ मुहूर्त रहेंगे। सुबह 11.20 बजे से दोपहर 01.20 बजे तक का समय सबसे अच्छा रहेगा, क्योंकि इस वक्त मध्याह्न काल रहेगा, जिसमें गणेश जी का जन्म हुआ था। पूरे गणेशोत्सव में हर दिन गणपति के सिर्फ तीन मंत्र का जाप करने से भी पुण्य मिलता है।  गणपति के पसंदीदा फूल: जाती, मल्लिका, कनेर, कमल, चम्पा, मौलश्री (बकुल), गेंदा, गुलाब गणपति के पसंदीदा पत्ते: शमी, दूर्वा, धतूरा, कनेर, केला, बेर, मदार और बिल्व पत्र पूजा में नीले और काले रंग के कपड़े न पहनें। स्थापना के बाद मूर्ति को इधर-उधर न रखें, यानी हिलाएं नहीं।

सिद्धि विनायक रूप की मूर्ति घर में स्थापित करनी चाहिए। विघ्नेश्वर गणेश ऑफिस और दुकानों के लिए और महागणपति की स्थापना कारखानों के लिए शुभ है। 

पौराणिक मान्यताओं के अनुसार भाद्रपद में आने वाले गणेश चतुर्थी को गणपति के जन्मोत्सव के रूप में मनाया जाता है. 10 दिन तक चलने वाला ये उत्सव गणेश चतुर्थी पर गौरी पुत्र गणेश के आगमन से शुरू होता है, जिसका समापन अनंत चतुर्दर्शी को किया जाता है.

विनायक चतुर्थी पर क्यों नहीं करते चंद्र दर्शन ?

31 August 2022: आज भाद्रपद शुक्ल पक्ष की चतुर्थी तिथि और बुधवार का दिन है। चतुर्थी तिथि आज दोपहर बाद 3 बजकर 22 मिनट तक रहेगी। उसके बाद पंचमी तिथि लग जायेगी। आज से दस दिवसीय गणेश उत्सव की शुरुआत हो गयी है और आज कलंक चतुर्थी है। 31 अगस्त 2022 बुधवार ( Wednesday) का दिन है। भाद्रपद मास (Bhadra Month) की शुक्ल पक्ष चतुर्थी 03:22 PM तक उसके बाद पञ्चमी है। सूर्य कर्क राशि पर योग योग-शुक्ल ,करण-विष्टि और बव भाद्र मास है, आज का दिन बहुत ही शुभ फलदायक है। भाद्रपद शुक्ल पक्ष चतुर्थी तिथि शुरू – 30 अगस्त 2022, दोपहर 3.33 मिनट से भाद्रपद शुक्ल पक्ष चतुर्थी तिथि खत्म – 31 अगस्त 2022, दोपहर 3.22 मिनट तक  गणेश जी स्थापना मुहूर्त – 11.05 AM – 1.38 PM (31 अगस्त 2022, बुधवार) विजय मुहूर्त – दोपहर 2.34 – 3.25 (31 अगस्त 2022) अमृत काल मुहूर्त – शाम 5.42 – 7.20 (31 अगस्त 2022) गोधूलि मुहूर्त – शाम 6.36 – 7.00 (31 अगस्त 2022) रवि योग – 31 अगस्त 2022, 06.06 AM – 1 सितंबर 2022, 12.12 AM शुक्ल योग – 31 अगस्त 2022, 12.05 AM – 10:48 PM ब्रह्म योग – 31 अगस्त 2022, 10.48 PM – 1 सितंबर 2022, 09.12 PM

ज्योतिष शास्त्र में पंचांग का बहुत महत्व है । पंचांग ज्योतिष के पांच अंगों का मेल है। जिसमें तिथि,वार, करण,योग और नक्षत्र का जिक्र होता है।

31 अगस्त को गणेश चतुर्थी का त्यौहार – गणेश चतुर्थी, जिसे विनायक चतुर्थी भी कहा जाता है, हिंदू धर्म में, समृद्धि और ज्ञान के देवता, हाथी के सिर वाले देवता गणेश के जन्म का 10 दिवसीय उत्सव हैयह हिंदू कैलेंडर के छठे महीने भाद्रपद   के चौथे दिन (चतुर्थी) से शुरू होता है।गणेश चतुर्थी, जिसे विनायक चतुर्थी के नाम से भी जाना जाता है, मनाने के लिए, भक्त भगवान गणेश की मूर्तियों को पूजा करने, अच्छा खाना खाने, दोस्तों और  परिवार के साथ आनंद लेने और अंत में मूर्तियों को विसर्जित करने के लिए लाते हैं। इसके अतिरिक्त, भक्त मंदिर में प्रार्थना करते हैं और मोदक जैसी मिठाइयाँवितरित करते हैं क्योंकि यह भगवान गणेश का पसंदीदा व्यंजन है।साल में हर महीने दो चतुर्थी तिथि आती है. कृष्ण पक्ष में आने वाली चतुर्थी को संकष्टी चतुर्थी कहा जाता है, वहीं शुक्ल पक्ष विनायक चतुर्थी आती है. भाद्रपद के शुक्ल पक्ष में आने वाली गणेश चतुर्थी (विनायक चतुर्थी) बहुत महत्वपूर्ण मानी जाती है.

भगवान गणेश की मूर्ति का मुख पूर्व या पश्चिम दिशा में होना चाहिए।गणेश चतुर्थी से एक दिन पहले गणेश विग्रह स्थापित करना सही नहीं है।

पूजा के समय इन मंत्रों का जाप करें. वक्रतुण्ड महाकाय सूर्यकोटि समप्रभ।  निर्विघ्नं कुरु मे देव सर्वकार्येषु सर्वदा॥

पौराणिक कथा के अनुसार भादो की गणेश चतुर्थी पर महर्षि वेदव्यास जी ने महाभारत की रचना के लिए गणेश जी का आह्वान किया था और उनसे महाभारत को लिपिबद्ध करने की प्रार्थना की. मान्यता के अनुसार इसी दिन व्यास जी ने श्लोक बोलना और गणपति जी ने महाभारत को लिपिबद्ध करना शुरू किया था. 10 दिन तक बिना रूके गणपति ने लेखन कार्य किया. इस दौरान गणेश जी पर धूल मिट्‌टी की परत जम गई. 10 दिन बाद यानी की अनंत चतुर्दशी पर बप्पा ने सरस्वती नदी में कर खुद को स्वच्छ किया. तब से ही हर साल 10 दिन तक गणेश उत्सव मनाया जाता है.

सनातन धर्म में सभी देवी-देवताओं में भगवान गजानन को प्रथम पूजनीय माना गया है. गणेश चतुर्थी पर रिद्धी सिद्धि के दाता गणपति की पूजा करने से जीवन में सुख-समृद्धि आती है. जो गणेश चतुर्थी पर बप्पा की स्थापना करता है और 10 दिन तक विधि विधान से पूजा, सेवा करता है उसके सारे कष्ट गणपति जी हर लेते हैं. गणेश चतुर्थी व्रत के प्रभाव से संतान सुख प्राप्त होता है. साथ ही बुद्धि और ऐश्वर्य की प्राप्ति होती है.

विनायक चतुर्थी पर क्यों नहीं करते चंद्र दर्शन ?

पौराणिक कथा के अनुसार जब भगवान गणपति को हाथी का मुख लगाया जा रहा था तब चंद्रदेव मंद-मंद मुस्कुरा रहे थे. चंद्रदेव अपने सौंदर्य पर बहुत घमंड करते थे. चंद्रमा के उपहास से गणेश जी ने क्रोधित हो गए. उन्होंने चंद्रमा को श्राप दे दिया कि आज से तुम काले हो जाओगे. तब चंद्र देव को अपनी गलती का एहसास हुआ और उन्होंने गणेश जी से क्षमा याचना की. गणपति ने कहा कि अब आप पूरे मास में केवल एक बार अपनी पूर्ण कलाओं से युक्त होंगे. गणेश जी ने चंद्रमा को श्राप दिया था कि जो कोई व्यक्ति भाद्रपद के शुक्ल पक्ष की चतुर्थी के दिन तुम्हारे दर्शन करेगा, उस पर झूठा आरोप  यानी झूठा कलंक लगेगा, इसलिए इस दिन चंद्र दर्शन निषेध है.

31 अगस्त 2022 को गणेश जन्मोत्सव मनाया जाएगा. मान्यता है कि भाद्रपद की शुक्ल पक्ष की चतुर्थी को गणपति जी का जन्म हुआ था. हर साल गणेश उत्सव की शुरुआत गणेश चतुर्थी से होती है जिसका समापना 10 दिन बाद अनंत चतुर्दशी पर होता है. इस बार गणेश विसर्जन (अनंत चतुर्दशी ) 9 सितंबर 2022  को होगा.

गणेश चतुर्थी 2022 घर लाएं गणपति की ऐसी मूर्ति   

गणेश जी की मूर्ति लेते वक्त उनकी सूंड पर विशेष ध्यान दें. मान्यता है कि गणेश जी की बाईं ओर वाली सूंड की प्रतिमा बहुत शुभ होती है. बाईं ओर सूंड वाली मूर्ति को वाममुखी गणपति कहा जाता है. इन्हें घर में विराजित करने से वो जल्द प्रसन्न होते हैं. वहीं दाईं ओर सूंड वाले गणपति को हठी माना गया है. इनकी उपासना कठिन होती है.

गणेश चतुर्थी पर सफेद और सिंदूरी रंग की गणेश प्रतिमा स्थापित करना अच्छा माना गया है. सिंदूरी गणेश घर में लाने से समृद्धि में बढ़ोत्तरी होती है. घर में नकारात्मक ऊर्जा का विनाश होता है. वहीं सफेद रंग की मूर्ति शांति का प्रतीक होती है.

गणेश चतुर्थी पर हमेशा घर में बैठी मुद्रा में गणेश प्रतिमा स्थापित करें. शास्त्रों के अनुसार बैठे गणपति धन का प्रतिनिधित्व करते है. मान्यता है कि इससे घर में बरकत बनी रहती है. धन का आगमन होता है. कार्य स्थल पर खड़े गणेश जी की मूर्ति लगा सकते हैं. मान्यता है इससे काम में तेजी आती है. ध्यान रहे कि खड़े गणेश जी के दोनों पैर जमीन को स्पर्श करते हुए होना चाहिए. साथ ही इनका मुंह दक्षिण दिशा में न हो.

गणेश जी की मूर्ति का चुनाव करते वक्त ध्यान रखे कि उसमें चूहा जरूर हो. मूषक यानी चूहा गणपति का वाहन है. मान्यता है बिना मूषक की गणेश मूर्ति की पूजा करने से दोष लगता है.

 घर में हथेली भर के गणेशजी स्थापित करने चाहिए। इससे सुख-शांति और समृद्धि बढ़ती है। वास्तु दोष भी नहीं होता। मूर्ति की साइज पूछने पर बताते हैं कि ऐसी मूर्ति 12 अंगुल यानी तकरीबन 7 से 9 इंच तक की हो तो बहुत ही अच्छा है। इससे ऊंची घर में नहीं होनी चाहिए। लेकिन मंदिरों और पंडालों में मूर्ति की उंचाई से जुड़ा कोई नियम नहीं है।

पार्वती ने मिट्टी से ही बनाए थे गणेश — मिट्टी के गणेश को ही सबसे अच्छा मानते हैं। इसके लिए कहते हैं कि मिट्टी में स्वाभाविक पवित्रता होती है। इससे बनी मूर्ति में भूमि, जल, वायु, अग्नि और आकाश के अंश मौजूद होते हैं। यानी ये पंचतत्वों से बनी होती है। गणेश जी के जन्म की कथा में भी ये ही बताया है कि देवी पार्वती ने पुत्र की इच्छा से मिट्टी का ही पुतला बनाया था, फिर शिवजी ने उसमें प्राण डाले। वो ही गणेश बने।

गणपति विसर्जन क्यों

गणपति विसर्जन क्यों होता है ? कालिदास की एक छोटी सी उक्ति है — “आदानं हिविसर्गाय” । विसर्जन के लिये ही आदान होता है । हिन्दूधर्म में आदान पुरुषार्थ की सिद्धि है , और इसी तरह विसर्जन आत्म-मुक्ति । गीता में भगवान् कृष्ण के उपदेशों का सार कालिदास की इस उक्ति में समा जाता है । जन्म है आदान , मृत्यु है विसर्जन। यह सनातन चक्र है, जो अनवरत चलता है।विश्व का स्वभाव संचय में नहीं , विसर्जन में है । जो निरंतर विसर्जित होता है, वही चैतन्य है। जो एक जगह इकट्ठा हो जाता है, वह जड़ बन जाता है । हिन्दू धर्म “तेन त्यक्तेन भुञ्जीथा मा गृध: कस्य स्विद्धनम्”त्यागपूर्वक उपभोग करो ,लालच मत करो , आखिर धन किसका है ? इस उपनिषद् वाक्य की आधारशिला पर खड़ा है।गणेश जी सुख-समृद्धि,लाभ-शुभ के देवता है।पार्थिव गणेश की स्थापना का अर्थ ही है , कि हमने पार्थिव सत्ता को स्वीकार किया। किन्तु यह सत्ता अंतिम नहीं। इसके भी आगे कुछ और है, उसके भी आगे कुछ और। जब तक हम एक सत्ता का विसर्जन नहीं करते, उससे मुक्त नहीं होते , तब तक आगे का सत्य दिखाई नहीं देता ।


गणपति विसर्जन में छुपे हुए अर्थ ।परम्परा और संस्कृति से जुड़े हुए कई प्रश्न ऐसे होते हैं ,जिनका कोई भी उत्तर पूर्ण नहीं होता। अब यही प्रश्न लीजिए , गणपति विसर्जन क्यों होता है ? कई उत्तर हो सकते हैं पौराणिक दृष्टि से भी और आध्यात्मिक दृष्टि से भी । गणेश चतुर्थी के दिन जो लोग बड़े उत्साह और उमंग से,श्रद्धा और भक्ति के साथ गणपति की प्रतिमा स्थापित करते हैं , वे दसवें दिन उसे नदी-तालाब में ले जा कर विसर्जित कर देते हैं। यह विसर्जन करते हुए क्या दुःख नहीं होता ? नहीं। बिलकुल भी नहीं ।जितनी शुभेच्छा के साथ गणेश जी की स्थापना की जाती है , उतने ही आनंद के साथ उनका विसर्जन किया जाता है।

कालिदास की एक छोटी सी उक्ति है — “आदानं हिविसर्गाय” । विसर्जन के लिये ही आदान होता है । हिन्दूधर्म में आदान पुरुषार्थ की सिद्धि है , और इसी तरह विसर्जन आत्म-मुक्ति । गीता में भगवान् कृष्ण के उपदेशों का सार कालिदास की इस उक्ति में समा जाता है । जन्म है आदान , मृत्यु है विसर्जन। यह सनातन चक्र है, जो अनवरत चलता है।विश्व का स्वभाव संचय में नहीं , विसर्जन में है । जो निरंतर विसर्जित होता है, वही चैतन्य है। जो एक जगह इकट्ठा हो जाता है, वह जड़ बन जाता है । हिन्दू धर्म “तेन त्यक्तेन भुञ्जीथा मा गृध: कस्य स्विद्धनम्”त्यागपूर्वक उपभोग करो ,लालच मत करो , आखिर धन किसका है ? इस उपनिषद् वाक्य की आधारशिला पर खड़ा है।गणेश जी सुख-समृद्धि,लाभ-शुभ के देवता है।पार्थिव गणेश की स्थापना का अर्थ ही है , कि हमने पार्थिव सत्ता को स्वीकार किया। किन्तु यह सत्ता अंतिम नहीं। इसके भी आगे कुछ और है, उसके भी आगे कुछ और। जब तक हम एक सत्ता का विसर्जन नहीं करते, उससे मुक्त नहीं होते , तब तक आगे का सत्य दिखाई नहीं देता ।गणेश जी स्थूल रूप से अन्नमय चेतना के देवता हैं ।

गणेश जी की प्रतिमा अन्नमय चेतना का सुंदरतम प्रतीक है । जब हम उसमें प्राण प्रतिष्ठा करते हैं , तब अन्नमय में से प्राणमय में संक्रमण होता है । निरंतर ध्यान , चिंतन ,मनन के द्वारा प्राणमय चेतना मनोमय में चली जाती है । मनोमय चेतना एक सूक्ष्म भागवत चेतना है। योगी के भीतर एक अवस्था ऐसी आती है , जब भागवत चेतना जीवात्मा का रूप ग्रहण करती है, जिसे विज्ञानमय कहते हैं।तब कहीं जाकर वह इन सब चेतनाओं की अंतरात्मा आनंदमय में प्रवेश करता है । आनंदमय में प्रवेश करते ही अन्नमय , प्राणमय ,मनोमय , और विज्ञानमय के बंधन एक के बाद एक कटते चले जाते हैं , और योगी आनंद के आलोक में विचरने लगता है ।

गणेश जी की स्थापना स्थूल यानी अन्नमय की स्थापना है ,किन्तु उनका विसर्जन सभी कोशों का विसर्जन करआनंदमय हो जाने का उत्सव है।गणेशोत्सव के दस दिनों का क्रम अन्नमय से आनंद-मय तक की यात्रा का प्रतीक है ।यह यात्रा बाहर से अंदर की ओर ,स्थूल से सूक्ष्म की ओर ,अथ से अनंत की ओर है।अनंतचतुर्दशी के दिन विसर्जन का यही अर्थ है कि हम स्थूल को छोड़ कर सूक्ष्म और अनंत में प्रवेश करें ।पार्वती गणेश जी की माता है , और शिव हैं पिता । पार्वती मातृशक्ति है , भुवन को जन्म देने वाली ।

वे मिट्टी से एक स्थूल प्रतिमा रचती हैं और उसमें प्राण फूँक देती हैं । शिव विसर्ग के देवता हैं।वे प्रतिमा को विसर्जित करते हैं, और शक्ति के आह्वान पर लम्बो- दर गजवदन विनायक का आनंदमय रूपान्तर प्रगट होता है । इस तरह श्री गणेश जी भौतिक जगत का आध्यात्मिक रूपान्तर करने वाले गण के देवता भी माने जाते हैं ।वे अपनी प्रतिमा का भञ्जन करते हैं, और नूतन प्रतिमा का सृजन करते हैं । इसीलिये वे पुनर्नवा है। इस प्रकार वे सभ्यता के देवता बन जाते हैं ।उनके प्रथमपूज्य होने का यह भी एक कारण है।हमारे यहाँ सगुण और निर्गुण का द्वन्द्व तो हमेशा से चलता रहा है।परंतु लोकचेतना अजीब है। वह अपने हिसाब से काम करती है।देवताओं की मूर्ति बनाकर सगुण उपासना करना भी उसे आता है और मूर्ति का विसर्जन कर निर्गुण भक्ति की धारा में शामिल होना भी उसे उतना ही सुहाता है। यदि हम भक्ति पर विचार करें, तो देखेंगे कि सगुण- निर्गुण दो अलग-अलग मार्ग नहीं, अपितु सगुण से निर्गुण तक की भागवत यात्रा ही तो भक्ति है । मूर्ति एक माध्यम है। आत्मा जब परमात्मा से मिलती है, तब प्रतिमा बीच में से हट जाती है।

गणेश प्रतिमा का विसर्जन एक पार्थिव माध्यम का विसर्जन है। यह विसर्जन एक शुद्ध आध्यात्मिक श्री गणेश है । परंतु इसके स्थूल अर्थ का विसर्जन जब तक नहीं होता ,तब तक हिन्दू धर्म के अनंतनारायण पर्दे के पीछे ही रहेंगे।

Deposit yr Contribution; Himalaya Gaurav Uttakhand A/c 30023706551 ifs Code; SBIN0003137

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