27 मार्च 2026 इस दिन सर्वार्थ सिद्धि योग, अतिखण्ड और रवि योग बन रहा है. & चैत्र नवरात्रि की महानवमी 27 मार्च 2026 को सुबह 10.06 मिनट तक ही है. ऐसे में माता की पूजा, कन्या पूजन और हवन तिथि समापन से पहले करना श्रेष्ठ होगा. मां सिद्धिदात्री की हलवा, पूड़ी और चना का भोग लगाया जाता है. या देवी सर्वभूतेषु माँ सिद्धिदात्री रूपेण संस्थिता। नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नमः। भगवान राम को ‘पीला’ रंग अत्यंत प्रिय है. राम नवमी से पहले एक सुनहरी किनारी वाला पीला ध्वज घर लाएं और उसे घर की छत के उत्तर-पूर्वी कोने में लगाएं. इससे ज्ञान, धन, और सम्मान में वृद्धि होती है. राम नवमी के दिन रामा तुलसी का पौधा जरूर लगाएं. सुबह-शाम तुलसी के पास घी का दीपक जलाने से घर का वास्तु दोष दूर होता है. आर्थिक उन्नति होती है.

कन्या पूजन के लिए शुभ मुहूर्त 27 मार्च को 10 बजकर 9 मिनट तक रहेगा। इसकी वजह ये है कि नवमी तिथि इसी समय तक रहेगी।
28 मार्च को दशमी तिथि सुबह 8 बजकर 48 मिनट तक रहेगी इसलिए इस समय तक आपको कलश विसर्जन विसर्जन कर लेना चाहिए क्योंकि इसके बाद एकादशी तिथि लग जाएगी।
27 मार्च 2026 को राम नवमी और चैत्र नवरात्रि की नवमी मां सिद्धिदात्री की पूजा होगी. मां सिद्धिदात्री की कृपा से साधक वो सिद्धियां प्राप्त कर सकता है जो हनुमान जी के पास हैं जैसे अणिमा, महिमा, गरिमा, लघिमा, प्राप्ति, प्राकाम्य, ईशित्व और वशित्व जैसी 8 सिद्धियां.
शुक्रवार को चैत्र शुक्ल पक्ष की नवमी तिथि और शुक्रवार का दिन है। नवमी तिथि आज सुबह 10 बजकर 8 मिनट तक रहेगी। आज चैत्र नवरात्र का नौवां दिन है। आज दोपहर बाद 3 बजकर 25 मिनट तक सर्वार्थसिद्धि योग रहेगा। साथ ही आज दोपहर बाद 3 बजकर 24 मिनट तक पुनर्वसु नक्षत्र रहेगा।

ये दिन माता की 9वीं शक्ति मां सिद्धिदात्री को समर्पित है. पुराणों के अनुसार मां सिद्धिदात्री की उपासना करने से व्यक्ति के जीवन की सभी बाधाएं दूर होती हैं और उसे ज्ञान, विवेक तथा मोक्ष की प्राप्ति होती है. भगवान शिव ने भी इन्हीं की कृपा से सिद्धियां प्राप्त की थीं.
- वाहन: कमल पुष्प पर विराजमान (कभी-कभी सिंह पर भी वर्णन मिलता है)
- भुजाएं: चार भुजाएं. चक्र, गदा, शंख, कमल पुष्प हाथों में धारण किए हैं.
- वर्ण (रंग): अत्यंत तेजस्वी और दिव्य आभा से युक्त
- मुखमुद्रा: शांत, प्रसन्न और करुणामयी
- विशेषता: आठों सिद्धियां और नौ निधियां प्रदान करने वाली देवी
- स्वभाव: भक्तों को सिद्धि, ज्ञान और मोक्ष देने वाली
- आठ सिद्धियां – मां सिद्धिदात्री आठ प्रकार की सिद्धियां प्रदान करती हैं, अणिमा
- महिमा, गरिमा, लघिमा, प्राप्ति, प्राकाम्य, ईशित्व, वशित्व
कन्या पूजन और हवन के लिए 27 मार्च को सुबह 6.17 से लेकर सुबह 10.54 तक शुभ मुहूर्त है. इस दिन का रंग बैंगनी है. माँ को लाल या गुलाबी रंग के फूल और वस्त्र अर्पित करें. देवी को सुहाग की सामग्री चढ़ाएं. धूप-दीप, नैवेद्य अर्पित करने के बाद माता की कथा सुनें फिर आरती करें. 9 कन्याओं को भोजन कराएं

राम नवमी और चैत्र नवरात्रि की नवमी मां सिद्धिदात्री की पूजा होगी. मां सिद्धिदात्री की कृपा से साधक वो सिद्धियां प्राप्त कर सकता है जो हनुमान जी के पास हैं जैसे अणिमा, महिमा, गरिमा, लघिमा, प्राप्ति, प्राकाम्य, ईशित्व और वशित्व जैसी 8 सिद्धियां. अतिखण्ड, सर्वार्थ सिद्धि और रवि योग सूर्योदय सुबह 7.15 सूर्यास्त सुबह 5.38
चैत्र नवरात्रि के आखिरी दिन भक्त की सच्चे मन से की गई पूजा से उसकी सभी इच्छाएं पूर्ण होती हैं और जीवन में सुख-समृद्धि आती है. वहीं राम नवमी पर अयोध्या में रामलला का दोपहर 12 बजे सूर्य तिलक होगा. राम नवमी के दिन घर में शंख लाना बहुत शुभ होता है. शंख माता लक्ष्मी को प्रिय है. राम जी की आरती के समय उसी शंख को बजाएं, इसकी ध्वनि से घर में मौजूद नकारात्मक ऊर्जा का नाश होता है. साथ ही दुर्भाग्य दूर रहता श्रीराम यंत्र को श्रीराम की दिव्य ऊर्जा का प्रतीक माना जाता है. राम दरबार की रोजाना पूजन करने से परिवार में खुशियां बनी रहती है
पंचांग के अनुसार, शुक्ल पक्ष की नवमी तिथि सुबह 10:07 बजे तक रहेगी। इसके बाद दशमी तिथि प्रारंभ हो जाएगी। नक्षत्र की स्थिति भी महत्वपूर्ण है, जिसमें पुनर्वसु नक्षत्र दोपहर 3:24 बजे तक रहेगा और उसके बाद पुष्य नक्षत्र शुरू हो जाएगा। ज्योतिष के अनुसार, पुष्य नक्षत्र को बेहद शुभ माना जाता है। इसलिए इस समय किए गए कार्यों के सफल होने की संभावना ज्यादा रहती है।
राम नवमी पूजा मुहूर्त – दोपहर 12.27 हवन मुहूर्त – सुबह 6.17 – सुबह 10.54
मां सिद्धिदात्री की आरती
जय सिद्धिदात्री तू सिद्धि की दातातू भक्तों की रक्षक तू दासों की माता,
तेरा नाम लेते ही मिलती है सिद्धि
तेरे नाम से मन की होती है शुद्धि!!
कठिन काम सिद्ध कराती हो तुम
जब भी हाथ सेवक के सर धरती हो तुम,
तेरी पूजा में तो न कोई विधि है
तू जगदम्बे दाती तू सर्वसिद्धि है!!
रविवार को तेरा सुमरिन करे जो
तेरी मूर्ति को ही मन में धरे जो,
तुम सब काज उसके कराती हो पूरे
कभी काम उसके रहे न अधूरे!!
तुम्हारी दया और तुम्हारी यह माया
रखे जिसके सर पर मैया अपनी छाया,
सर्व सिद्धि दाती वो है भाग्यशाली
जो है तेरे दर का ही अम्बे सवाली!!
हिमाचल है पर्वत जहां वास तेरा
महा नंदा मंदिर में है वास तेरा,
मुझे आसरा है तुम्हारा ही माता
वंदना है सवाली तू जिसकी दाता!!
मान्यता है कि जो व्यक्ति इस कथा को सच्चे मन से सुनता या पढ़ता है, उसके जीवन में सुख-शांति, समृद्धि और सकारात्मक ऊर्जा का संचार होता है तथा भगवान श्रीराम की कृपा सदैव बनी रहती है।
राम नवमी का पावन पर्व हिंदू धर्म में अत्यंत श्रद्धा और आस्था के साथ मनाया जाता है। यह दिन भगवान श्रीराम के जन्मोत्सव के रूप में समर्पित है, जिन्हें मर्यादा, सत्य और धर्म का प्रतीक माना जाता है। राम नवमी का त्योहार हर सनातनी के लिए विशेष महत्व रखता है, क्योंकि इस दिन प्रभु श्री राम का जन्म हुआ था। इस दिन भक्त व्रत रखते हैं, पूजा-अर्चना करते हैं और श्रीराम की जन्म कथा का पाठ करते हैं। मान्यता है कि इस कथा को श्रद्धा भाव से सुनने या पढ़ने से जीवन की अनेक बाधाएं दूर होती हैं और घर में सुख-शांति तथा समृद्धि का वास होता है। यही कारण है कि राम नवमी के अवसर पर इस पवित्र कथा का विशेष महत्व बताया गया है।
राम नवमी की कथा (Ram Navami Ki Katha)

YR CONTRIBUTION; REGARDS
प्राचीन काल में अयोध्या नगरी पर राजा दशरथ का शासन था। वे एक महान, न्यायप्रिय और धर्मनिष्ठ राजा थे, लेकिन उनके जीवन में एक गहरा दुख था, उनके कोई संतान नहीं थी। यह चिंता उन्हें दिन-रात सताती रहती थी। अंततः उन्होंने अपने गुरु महर्षि वशिष्ठ से इस समस्या का समाधान पूछा।
गुरु वशिष्ठ ने उन्हें पुत्र प्राप्ति के लिए एक पुत्रेष्टि यज्ञ करने की सलाह दी। राजा दशरथ ने पूरी श्रद्धा और विधि-विधान के साथ इस यज्ञ का आयोजन कराया। इस पवित्र अनुष्ठान में अनेक विद्वान ऋषि-मुनि शामिल हुए और पूरे वैदिक मंत्रों के साथ यज्ञ संपन्न किया गया।
यज्ञ के पूर्ण होने पर अग्निदेव प्रकट हुए और उन्होंने राजा दशरथ को एक दिव्य खीर (प्रसाद) प्रदान की। राजा दशरथ उस प्रसाद को अपने महल में लेकर आए और अत्यंत श्रद्धा से अपनी तीनों रानियों कौशल्या, कैकयी और सुमित्रा में बांट दिया।
कुछ समय बाद तीनों रानियों ने गर्भ धारण किया और पूरे महल में खुशी का माहौल छा गया। फिर वह शुभ दिन आया, जब चैत्र मास के शुक्ल पक्ष की नवमी तिथि को माता कौशल्या ने एक दिव्य और तेजस्वी बालक को जन्म दिया। उस बालक का रूप इतना अद्भुत था कि उसे देखते ही सभी मोहित हो जाते थे। वह बालक स्वयं भगवान विष्णु के अवतार श्रीराम थे, जिन्होंने धरती पर धर्म की स्थापना के लिए जन्म लिया था।
इसके पश्चात रानी कैकयी ने भरत को और माता सुमित्रा ने लक्ष्मण और शत्रुघ्न को जन्म दिया। चारों राजकुमारों के जन्म से अयोध्या नगरी में हर्ष और उत्सव का माहौल बन गया। हर ओर आनंद की लहर दौड़ गई और देवताओं ने भी आकाश से पुष्प वर्षा कर इस शुभ अवसर का स्वागत किया।
कुछ समय बाद महर्षि वशिष्ठ ने चारों बालकों का नामकरण किया- राम, भरत, लक्ष्मण और शत्रुघ्न। चारों भाई बचपन से ही अत्यंत गुणवान, विनम्र और एक-दूसरे के प्रति प्रेम से भरे हुए थे।
श्रीराम बचपन से ही अद्भुत प्रतिभा के धनी थे। उन्होंने अल्प समय में ही वेद-शास्त्रों का ज्ञान प्राप्त कर लिया और अस्त्र -शस्त्र चलाने में भी निपुण हो गए। वे सदैव अपने माता-पिता और गुरुजनों की सेवा में लगे रहते थे। उनके आदर्श आचरण और सरल स्वभाव के कारण वे अयोध्या वासियों के प्रिय बन गए।
जैसे-जैसे वे बड़े हुए, उनका व्यक्तित्व और भी निखरता गया। वे न केवल एक आदर्श पुत्र थे, बल्कि एक आदर्श भाई और श्रेष्ठ मानव भी थे। उनके तीनों भाई भी उनके पदचिन्हों पर चलते थे और चारों भाइयों के बीच गहरा प्रेम और एकता देखने को मिलती थी।
आगे चलकर, जब समय आया, तो श्रीराम ने अपने पिता की आज्ञा का पालन करते हुए 14 वर्ष का वनवास स्वीकार किया। इस दौरान उन्होंने हर परिस्थिति में धैर्य और धर्म का पालन किया। वनवास के समय जब रावण ने माता सीता का हरण किया, तब श्रीराम ने अपने पराक्रम से रावण का वध किया और अधर्म का अंत कर धर्म की पुनः स्थापना की।
भगवान श्रीराम ने अपने पूरे जीवन में यह सिद्ध किया कि सत्य, त्याग, कर्तव्य और मर्यादा ही जीवन के सबसे बड़े आदर्श हैं।