28 मार्च 2026, शनिवार को चैत्र शुक्ल पक्ष की दशमी तिथि सुबह 08:45 तक रहेगी, फिर एकादशी शुरू होगी। पुष्य नक्षत्र दोपहर 02:50 तक, तत्पश्चात आश्लेषा नक्षत्र रहेगा। इस दिन सुकर्मा योग और चंद्रमा कर्क राशि में रहेंगे। मुख्य रूप से, राहुकाल सुबह 09:41 से 11:13 तक और अभिजित मुहूर्त दोपहर 12:00 से 12:50 तक होगा। 28 मार्च को दशमी तिथि सुबह 8 बजकर 46 मिनट तक & ब्रह्म मुहूर्त: 04:53 AM से 05:29 AM तक & गोधूलि मुहूर्त: 06:35 PM से 06:59 PM तक & सूर्योदय-सुबह 6:16 AM & सूर्यास्त- शाम 6:37 PM & पुष्य (रात 01:40 AM, 29 मार्च तक) – इसे नक्षत्रों का राजा कहा जाता है। प्रदोष काल (शिव पूजा मुहूर्त): शाम 06:49 से रात 09:05 तक ; CHANDRA SHEKHAR JOSHI CHIEF EDITOR & PRESIDENT BAGLA MUKHI PEETH DEHRADUN 9412932030

अप्रैल के माह में सूर्य-मंगल के साथ 4 ग्रह अपनी राशि बदलेंगे। महीने की शुरुआत में मंगल का गोचर मीन राशि में होगा। इसके बाद बुध 11 अप्रैल को मीन राशि में प्रवेश करेंगे। वहीं सूर्य का गोचर 14 अप्रैल को अपनी उच्च राशि मेष में होगा। 19 अप्रैल को शुक्र ग्रह अपनी स्वराशि वृषभ में गोचर कर जाएंगे। ग्रहों की बदली चाल का कुछ राशियों पर सकारात्मक प्रभाव देखने को मिलेगा
बगलामुखी जयंती 2026 शुक्रवार, 24 अप्रैल को मनाई जाएगी; CHANDRA SHEKHAR JOSHI 9412932030

बगलामुखी जयंती 2026 शुक्रवार, 24 अप्रैल को मनाई जाएगी। महा योगी मच्छिंद्रनाथ ने योग विद्या द्वारा खुद भगवती बगलामुखी की सिद्धि kगोपनीय विधि और रहस्य को पाया था. बगुलामुखी स्वयं रोजाना मत्स्येंद्रनाथ के सामने प्रकट होती थी और योगीराज उन्हें स्वयं अपने हाथों से नैवेद्य अर्पण करते थे. चंद्र कैलेंडर के अनुसार वैशाख महीने की अष्टमी तिथि & छत्तीसगढ़ में डोंगरगढ़ की पहाड़ी पर मां बमलेश्वरी के नाम से इनकी पूजा की जाती है. इनकी स्तंभन शक्ति का ही प्रभाव है कि छत्तीसगढ़ में आज तक कभी भी कोई बड़ा भूकंप या अन्य प्राकृतिक आपदा नहीं आई. भारतीय तंत्र विज्ञान में बताया गया है बगुलामुखी महाशक्ति अद्भुत गुण तत्व अपने अंदर लिए हुए हैं. जिसमें मनुष्य जीवन की पूर्णता और प्रकृति के रहस्य छिपे हुए हैं. बगलामुखी महाविद्या संसार की सबसे श्रेष्ठ महाविद्या मानी जाती है. पुराने समय से ही जो भी महान पुरुष पैदा हुए हैं या जिन राजा महाराजाओं ने निष्कल तक राज्य किया है उनकी जीत और सफलता का कारण मां बगलामुखी की आराधना रही है. बगुला शक्ति का मूल सूत्र है “अथर्व प्राण सूत्र” यह प्राण सूत्र हर प्राणी में सोई अवस्था में विराजमान रहता है. जिसे बगलामुखी की साधना करने से जगाया जा सकता है. जब यह प्राण सूत्र जागता है तो साधक स्तंभन वशीकरण और कीलन की शक्ति प्राप्त होती है और वह अपने सामने के व्यक्ति को ही नहीं बल्कि दूर स्थान पर मौजूद व्यक्ति को भी आसानी से सम्मोहित कर सकता है. योगीनाथ मछिंद्रनाथ ने ताड़ के पत्तों पर बरगा को सिद्ध करके एक अद्वितीय ग्रंथ की रचना की थी. जो इस महाविद्या की सिद्धि के लिए बहुत ही महत्वपूर्ण है. माता बगलामुखी में 16 शक्तियां विराजमान है. मंगल, स्तम्भिनी, जृम्भिणि, मोहिनी, वश्या, बलाय, अचलाय, मंडरा, कल्पमासा, धात्री, कलना, कालकर्षिणि, भ्रामिका, मन्दगमना, भोगस्थ, भाविका
मत्स्येंद्रनाथ (मछंदरनाथ) योगी आदित्यनाथ के प्रत्यक्ष गुरु नहीं हैं, बल्कि वे नाथ संप्रदाय के आदि गुरु और संस्थापक माने जाते हैं। योगी आदित्यनाथ गोरखनाथ पीठ से जुड़े हैं, और मत्स्येंद्रनाथ जी को गोरखनाथ जी (गोरक्षनाथ) का गुरु माना जाता है, इस प्रकार वे नाथ परंपरा के मुख्य आधार हैं। मत्स्येंद्रनाथ नाथ पंथ के आदिनाथ (भगवान शिव) के बाद सबसे प्रमुख गुरु हैं। मत्स्येंद्रनाथ ने ही योग और तंत्र परंपरा में नाथ संप्रदाय की स्थापना की थी
चैत्र मास के शुक्ल पक्ष की दशमी तिथि है, जो सुबह 8:46 तक रहेगी और इसके बाद एकादशी तिथि प्रारंभ होगी। पुष्य नक्षत्र दोपहर 2:50 तक रहेगा, जिसे अत्यंत शुभ माना जाता है, इसके बाद अश्लेषा नक्षत्र शुरू होगा। रवियोग और सुकर्मा योग जैसे शुभ संयोग भी बन रहे हैं, जिससे पूजा-पाठ, यात्रा और नए कार्यों की शुरुआत के लिए यह दिन विशेष बन जाता है। हालांकि पूर्व दिशा में दिशा शूल होने के कारण यात्रा से बचना चाहिए और राहुकाल (सुबह 9:00 से 10:30 तक) में शुभ कार्य नहीं करने चाहिए। आज के दिन नवरात्रि व्रत का पूर्ण पारण (दशमी तिथि में) किया जाएगा। साथ ही, आज ‘धर्मराज दशमी’ का पर्व भी मनाया जाता है।

29 मार्च 2026 फलदा एकादशी : कामदा एकादशी सनातन धर्म में अत्यंत महत्वपूर्ण पर्व माना जाता है। यह व्रत हर साल वैशाख माह के शुक्ल पक्ष की एकादशी को मनाया जाता है। इस दिन भगवान विष्णु और मां लक्ष्मी की विशेष पूजा की जाती है। ऐसा माना जाता है कि कामदा एकादशी का व्रत फलदायी होता है और इसे करने से जन्म-जन्मांतर के पाप समाप्त होते हैं। इस साल यह व्रत 29 मार्च 2026 को पड़ रहा है। इसे फलदा एकादशी के नाम से भी जाना जाता है। विष्णु जी को पीले और माता लक्ष्मी को कमल या गुलाब के फूल अर्पित करें। लक्ष्मी जी के सामने घी का अखंड दीपक जलाएं और “ॐ श्रीं ह्रीं श्रीं कमले कमलालये प्रसीद प्रसीद श्रीं ह्रीं श्रीं ॐ महालक्ष्म्यै नमः” मंत्र का 108 बार जाप करें। मां लक्ष्मी को सफेद मिठाई या मखाने की खीर का भोग लगाएं। भोग में तुलसी दल जरूर डालें, क्योंकि इसके बिना विष्णु की पूजा अधूरी मानी जाती है। भोजन, वस्त्र और धन दान करें। वैशाख का महीना आध्यात्मिक उन्नति के लिए एक सुनहरा समय माना जाता है।

तिथि: दशमी सुबह 08:45 तक, फिर एकादशी (शुक्ल पक्ष)। नक्षत्र: पुष्य नक्षत्र दोपहर 02:50 तक, फिर आश्लेषा नक्षत्र सूर्योदय: प्रातः 06:16। सूर्यास्त: संध्या 06:36। राहुकाल: सुबह 09:41 से 11:13 तक। अभिजित मुहूर्त: दोपहर 12:00 से 12:50 तक 28 मार्च 2026, शनिवार को चैत्र शुक्ल पक्ष की दशमी तिथि है। इस दिन पुष्य नक्षत्र और सुकर्मा योग का संयोग होगा।
शुक्र ग्रह 26 मार्च को मंगल की राशि मेष में गोचर & मार्च 2026 के अंत में शुक्र का गोचर ज्योतिषीय दृष्टिकोण से बहुत महत्वपूर्ण माना जाता है। शुक्र को धन, वैभव, सौंदर्य, यश और प्रेम की देवी के रूप में जाना जाता है, और राशि चक्र में इसके बदलाव सीधे तौर पर मनुष्यों के जीवन को प्रभावित करते हैं। इस बार, चूंकि शुक्र अपनी मित्र राशि मेष में प्रवेश कर चुके हैं। शुक्र ग्रह मेष राशि में 19 अप्रैल तक रहेंगे।
28 मार्च को चैत्र शुक्ल पक्ष की दशमी तिथि और शनिवार का दिन है। 28 मार्च को दशमी तिथि सुबह 8 बजकर 46 मिनट तक रहेगी। 28 मार्च को रात 8 बजकर 6 मिनट तक सुकर्मा योग रहेगा। साथ ही दोपहर 2 बजकर 51 मिनट तक पुष्य नक्षत्र रहेगा। इसके अलावा 28 मार्च को रात 8 बजकर 17 मिनट से अगले दिन सुबह 7 बजकर 47 मिनट तक पृथ्वी लोक की भद्रा रहेगी।
ज्योतिष के अनुसार, नौ ग्रहों की चाल का राशिचक्र की सभी राशियों पर बहुत फर्क पड़ता है। कई बार इससे कुछ राशियों के जीवन में सकारात्मक बदलाव आते हैं, तो कुछ राशियों को इसका भारी खामियाजा भुगतना पड़ता है। ग्रहों के राजा की चाल में ऐसा ही एक बदलाव होने जा रहा है। 31 मार्च, मंगलवार की रात सूर्य रेवती नक्षत्र में प्रवेश करेंगे और 14 अप्रैल तक यहीं पर विराजमान रहेंगे। रेवती नक्षत्र बुध के प्रभाव में माना जाता है। ज्योतिषियों के अनुसार, इस दौरान आत्मविश्वास, नेतृत्व क्षमता और काम करने की शक्ति बढ़ सकती है, जिससे इन 3 राशियों जीवन में नए अवसर और बदलाव देखने को मिल सकते हैं।
अप्रैल 2026 का महीना हिंदूओं के लिए बहुत महत्वपूर्ण रहने वाला है। अप्रैल में चैत्र मास का समापन और वैशाख मास की शुरुआत होती है। अप्रैल माह में हनुमान जयंती, सीता नवमी, बैशाखी, अक्षय तृतीया जैसे कई प्रमुख और महत्वपूर्ण त्योहार मनाए जाएंगे। इसके अलावा मोहिनी एकादशी समेत कई प्रमुख व्रत भी अप्रैल महीने में ही किया जाएगा।

कामदा एकादशी का व्रत 29 मार्च ; हिंदू कैलेंडर की एकादशी तिथि भगवान विष्णु को समर्पित है। चैत्र माह के शुक्ल पक्ष में आने वाली एकादशी को कामदा एकादशी के नाम से जाना जाता है। इस बार कामदा एकादशी का व्रत 29 मार्च को रखा जाएगा। इस दिन भगवान विष्णु और मां लक्ष्मी की पूजा के दौरान संतान गोपाल स्तोत्र का पाठ जरूर करना चाहिए। ऐसा कहा जाता है इस स्तोत्र का पाठ करने से संतान से जुड़ी समस्या दूर होती है। कहा जाता है कि अगर किसी शादीशुदा जोड़े को लंबे समय से संतान का सुख नहीं मिला है तो उस पाट से उन पर प्रभु की कृपा से बरसती है।
संतान गोपाल स्तोत्र (Santan Gopal Stotra)
श्रीशं कमलपत्राक्षं देवकीनन्दनं हरिम् ।
सुतसम्प्राप्तये कृष्णं नमामि मधुसूदनम् ॥1॥
नमाम्यहं वासुदेवं सुतसम्प्राप्तये हरिम् ।
यशोदांकगतं बालं गोपालं नन्दनन्दनम् ॥
अस्माकं पुत्रलाभाय गोविन्दं मुनिवन्दितम् ।
नमाम्यहं वासुदेवं देवकीनन्दनं सदा ॥
गोपालं डिम्भकं वन्दे कमलापतिमच्युतम् ।
पुत्रसम्प्राप्तये कृष्णं नमामि यदुपुंगवम् ॥
पुत्रकामेष्टिफलदं कंजाक्षं कमलापतिम्
देवकीनन्दनं वन्दे सुतसम्प्राप्तये मम ॥
पद्मापते पद्मनेत्र पद्मनाभ जनार्दन ।
देहि में तनयं श्रीश वासुदेव जगत्पते ॥
यशोदांकगतं बालं गोविन्दं मुनिवन्दितम् ।
अस्माकं पुत्रलाभाय नमामि श्रीशमच्युतम् ॥
श्रीपते देवदेवेश दीनार्तिहरणाच्युत ।
गोविन्द मे सुतं देहि नमामि त्वां जनार्दन ॥
भक्तकामद गोविन्द भक्तं रक्ष शुभप्रद ।
देहि मे तनयं कृष्ण रुक्मिणीवल्लभ प्रभो ॥
रुक्मिणीनाथ सर्वेश देहि मे तनयं सदा ।
भक्तमन्दार पद्माक्ष त्वामहं शरणं गत: ॥
देवकीसुत गोविन्द वासुदेव जगत्पते ।
देहि मे तनयं कृष्ण त्वामहं शरणं गत: ॥
वासुदेव जगद्वन्द्य श्रीपते पुरुषोत्तम ।
देहि मे तनयं कृष्ण त्वामहं शरणं गत: ॥
कंजाक्ष कमलानाथ परकारुरुणिकोत्तम ।
देहि मे तनयं कृष्ण त्वामहं शरणं गत: ॥
लक्ष्मीपते पद्मनाभ मुकुन्द मुनिवन्दित ।
देहि मे तनयं कृष्ण त्वामहं शरणं गत: ॥
कार्यकारणरूपाय वासुदेवाय ते सदा ।
नमामि पुत्रलाभार्थं सुखदाय बुधाय ते ॥
राजीवनेत्र श्रीराम रावणारे हरे कवे ।
तुभ्यं नमामि देवेश तनयं देहि मे हरे ॥
अस्माकं पुत्रलाभाय भजामि त्वां जगत्पते ।
देहि मे तनयं कृष्ण वासुदेव रमापते ॥
श्रीमानिनीमानचोर गोपीवस्त्रापहारक ।
देहि मे तनयं कृष्ण वासुदेव जगत्पते ॥
अस्माकं पुत्रसम्प्राप्तिं कुरुष्व यदुनन्दन ।
रमापते वासुदेव मुकुन्द मुनिवन्दित ॥
वासुदेव सुतं देहि तनयं देहि माधव ।
पुत्रं मे देहि श्रीकृष्ण वत्सं देहि महाप्रभो ॥
डिम्भकं देहि श्रीकृष्ण आत्मजं देहि राघव ।
भक्तमन्दार मे देहि तनयं नन्दनन्दन ॥
नन्दनं देहि मे कृष्ण वासुदेव जगत्पते ।
कमलानाथ गोविन्द मुकुन्द मुनिवन्दित ॥
अन्यथा शरणं नास्ति त्वमेव शरणं मम ।
सुतं देहि श्रियं देहि श्रियं पुत्रं प्रदेहि मे ॥
यशोदास्तन्यपानज्ञं पिबन्तं यदुनन्दनम् ।
वन्देsहं पुत्रलाभार्थं कपिलाक्षं हरिं सदा ॥
नन्दनन्दन देवेश नन्दनं देहि मे प्रभो ।
रमापते वासुदेव श्रियं पुत्रं जगत्पते ॥
पुत्रं श्रियं श्रियं पुत्रं पुत्रं मे देहि माधव ।
अस्माकं दीनवाक्यस्य अवधारय श्रीपते ॥
गोपालडिम्भ गोविन्द वासुदेव रमापते ।
अस्माकं डिम्भकं देहि श्रियं देहि जगत्पते ॥
मद्वांछितफलं देहि देवकीनन्दनाच्युत ।
मम पुत्रार्थितं धन्यं कुरुष्व यदुनन्दन ॥
याचेsहं त्वां श्रियं पुत्रं देहि मे पुत्रसम्पदम् ।
भक्तचिन्तामणे राम कल्पवृक्ष महाप्रभो ॥
आत्मजं नन्दनं पुत्रं कुमारं डिम्भकं सुतम् ।
अर्भकं तनयं देहि सदा मे रघुनन्दन ॥
वन्दे सन्तानगोपालं माधवं भक्तकामदम् ।
अस्माकं पुत्रसम्प्राप्त्यै सदा गोविन्दच्युतम् ॥
ऊँकारयुक्तं गोपालं श्रीयुक्तं यदुनन्दनम् ।
कलींयुक्तं देवकीपुत्रं नमामि यदुनायकम् ॥
वासुदेव मुकुन्देश गोविन्द माधवाच्युत ।
देहि मे तनयं कृष्ण रमानाथ महाप्रभो ॥
राजीवनेत्र गोविन्द कपिलाक्ष हरे प्रभो ।
समस्तकाम्यवरद देहि मे तनयं सदा ॥
अब्जपद्मनिभं पद्मवृन्दरूप जगत्पते ।
देहि मे वरसत्पुत्रं रमानायक माधव ॥
नन्दपाल धरापाल गोविन्द यदुनन्दन ।
देहि मे तनयं कृष्ण रुक्मिणीवल्लभ प्रभो ॥
दासमन्दार गोविन्द मुकुन्द माधवाच्युत ।
गोपाल पुण्डरीकाक्ष देहि मे तनयं श्रियम् ॥
यदुनायक पद्मेश नन्दगोपवधूसुत ।
देहि मे तनयं कृष्ण श्रीधर प्राणनायक ॥
अस्माकं वांछितं देहि देहि पुत्रं रमापते ।
भगवन् कृष्ण सर्वेश वासुदेव जगत्पते ॥
रमाहृदयसम्भार सत्यभामामन:प्रिय ।
देहि मे तनयं कृष्ण रुक्मिणीवल्लभ प्रभो ॥
चन्द्रसूर्याक्ष गोविन्द पुण्डरीकाक्ष माधव ।
अस्माकं भाग्यसत्पुत्रं देहि देव जगत्पते ॥
कारुण्यरूप पद्माक्ष पद्मनाभसमर्चित ।
देहि मे तनयं कृष्ण देवकीनन्दनन्दन ॥
देवकीसुत श्रीनाथ वासुदेव जगत्पते ।
समस्तकामफलद देहि मे तनयं सदा ॥
भक्तमन्दार गम्भीर शंकराच्युत माधव ।
देहि मे तनयं गोपबालवत्सल श्रीपते ॥
श्रीपते वासुदेवेश देवकीप्रियनन्दन ।
भक्तमन्दार मे देहि तनयं जगतां प्रभो ॥
जगन्नाथ रमानाथ भूमिनाथ दयानिधे ।
वासुदेवेश सर्वेश देहि मे तनयं प्रभो ॥
श्रीनाथ कमलपत्राक्ष वासुदेव जगत्पते ।
देहि मे तनयं कृष्ण त्वामहं शरणं गत: ॥
दासमन्दार गोविन्द भक्तचिन्तामणे प्रभो ।
देहि मे तनयं कृष्ण त्वामहं शरणं गत: ॥
गोविन्द पुण्डरीकाक्ष रमानाथ महाप्रभो ।
देहि मे तनयं कृष्ण त्वामहं शरणं गत: ॥
श्रीनाथ कमलपत्राक्ष गोविन्द मधुसूदन ।
मत्पुत्रफलसिद्धयर्थं भजामि त्वां जनार्दन ॥
स्तन्यं पिबन्तं जननीमुखाम्बुजं
विलोक्य मन्दस्मितमुज्ज्वलांगम् ।
स्पृशन्तमन्यस्तनमंगुलीभि-
र्वन्दे यशोदांकगतं मुकुन्दम् ॥
याचेsहं पुत्रसन्तानं भवन्तं पद्मलोचन ।
देहि मे तनयं कृष्ण त्वामहं शरणं गत: ॥
अस्माकं पुत्रसम्पत्तेश्चिन्तयामि जगत्पते ।
शीघ्रं मे देहि दातव्यं भवता मुनिवन्दित ॥
वासुदेव जगन्नाथ श्रीपते पुरुषोत्तम ।
कुरु मां पुत्रदत्तं च कृष्ण देवेन्द्रपूजित ॥
कुरु मां पुत्रदत्तं च यशोदाप्रियनन्दन ।
मह्यं च पुत्रसंतानं दातव्यं भवता हरे ॥
वासुदेव जगन्नाथ गोविन्द देवकीसुत ।
देहि मे तनयं राम कौसल्याप्रियनन्दन ॥
पद्मपत्राक्ष गोविन्द विष्णो वामन माधव ।
देहि मे तनयं सीताप्राणनायक राघव ॥
कंजाक्ष कृष्ण देवेन्द्रमण्डित मुनिवन्दित ।
लक्ष्मणाग्रज श्रीराम देहि मे तनयं सदा ॥
देहि मे तनयं राम दशरथप्रियनन्दन ।
सीतानायक कंजाक्ष मुचुकुन्दवरप्रद ॥
विभीषणस्य या लंका प्रदत्ता भवता पुरा ।
अस्माकं तत्प्रकारेण तनयं देहि माधव ॥
भवदीयपदाम्भोजे चिन्तयामि निरन्तरम् ।
देहि मे तनयं सीताप्राणवल्लभ राघव ॥
राम मत्काम्यवरद पुत्रोत्पत्तिफलप्रद ।
देहि मे तनयं श्रीश कमलासनवन्दित ॥
राम राघव सीतेश लक्ष्मणानुज देहि मे ।
भाग्यवत्पुत्रसंतानं दशरथात्मज श्रीपते ॥
देवकीगर्भसंजात यशोदाप्रियनन्दन ।
देहि मे तनयं राम कृष्ण गोपाल माधव ॥
कृष्ण माधव गोविन्द वामनाच्युत शंकर ।
देहि मे तनयं श्रीश गोपबालकनायक ॥
गोपबालमहाधन्य गोविन्दाच्युत माधव ।
देहि मे तनयं कृष्ण वासुदेव जगत्पते ॥
दिशतु दिशतु पुत्रं देवकीनन्दनोsयं
दिशतु दिशतु शीघ्रं भाग्यवत्पुत्रलाभम् ।
दिशति दिशतु श्रीशो राघवो रामचन्द्रो
दिशतु दिशतु पुत्रं वंशविस्तारहेतो: ॥
दीयतां वासुदेवेन तनयो मत्प्रिय: सुत: ।
कुमारो नन्दन: सीतानायकेन सदा मम ॥
राम राघव गोविन्द देवकीसुत माधव ।
देहि मे तनयं श्रीश गोपबालकनायक ॥
वंशविस्तारकं पुत्रं देहि मे मधुसूदन ।
सुतं देहि सुतं देहि त्वामहं शरणं गत: ॥
ममाभीष्टसुतं देहि कंसारे माधवाच्युत ।
सुतं देहि सुतं देहि त्वामहं शरणं गत: ॥
चन्द्रार्ककल्पपर्यन्तं तनयं देहि माधव ।
सुतं देहि सुतं देहि त्वामहं शरणं गत: ॥
विद्यावन्तं बुद्धिमन्तं श्रीमन्तं तनयं सदा ।
देहि मे तनयं कृष्ण देवकीनन्दन प्रभो ॥
नमामि त्वां पद्मनेत्र सुतलाभाय कामदम् ।
मुकुन्दं पुण्डरीकाक्षं गोविन्दं मधुसूदनम् ॥
भगवन कृष्ण गोविन्द सर्वकामफलप्रद ।
देहि मे तनयं स्वामिंस्त्वामहं शरणं गत: ॥
स्वामिंस्त्वं भगवन् राम कृष्ण माधव कामद ।
देहि मे तनयं नित्यं त्वामहं शरणं गत: ॥
तनयं देहि गोविन्द कंजाक्ष कमलापते ।
सुतं देहि सुतं देहि त्वामहं शरणं गत: ॥
पद्मापते पद्मनेत्र प्रद्युम्नजनक प्रभो ।
सुतं देहि सुतं देहि त्वामहं शरणं गत: ॥
शंखचक्रगदाखड्गशांर्गपाणे रमापते ।
देहि मे तनयं कृष्ण त्वामहं शरणं गत: ॥
नारायण रमानाथ राजीवपत्रलोचन ।
सुतं मे देहि देवेश पद्मपद्मानुवन्दित ॥
राम राघव गोविन्द देवकीवरनन्दन ।
रुक्मिणीनाथ सर्वेश नारदादिसुरार्चित ॥
देवकीसुत गोविन्द वासुदेव जगत्पते ।
देहि मे तनयं श्रीश गोपबालकनायक ॥
मुनिवन्दित गोविन्द रुक्मिणीवल्लभ प्रभो ।
देहि मे तनयं कृष्ण त्वामहं शरणं गत: ॥
गोपिकार्जितपंकेजमरन्दासक्तमानस ।
देहि मे तनयं कृष्ण त्वामहं शरणं गत: ॥
रमाहृदयपंकेजलोल माधव कामद ।
ममाभीष्टसुतं देहि त्वामहं शरणं गत: ॥
वासुदेव रमानाथ दासानां मंगलप्रद ।
देहि मे तनयं कृष्ण त्वामहं शरणं गत: ॥
कल्याणप्रद गोविन्द मुरारे मुनिवन्दित ।
देहि मे तनयं कृष्ण त्वामहं शरणं गत: ॥
पुत्रप्रद मुकुन्देश रुक्मिणीवल्लभ प्रभो ।
देहि मे तनयं कृष्ण त्वामहं शरणं गत: ॥
पुण्डरीकाक्ष गोविन्द वासुदेव जगत्पते ।
देहि मे तनयं कृष्ण त्वामहं शरणं गत: ॥
दयानिधे वासुदेव मुकुन्द मुनिवन्दित ।
देहि मे तनयं कृष्ण त्वामहं शरणं गत: ॥
पुत्रसम्पत्प्रदातारं गोविन्दं देवपूजितम् ।
वन्दामहे सदा कृष्णं पुत्रलाभप्रदायिनम् ॥
कारुण्यनिधये गोपीवल्लभाय मुरारये ।
नमस्ते पुत्रलाभार्थं देहि मे तनयं विभो ॥
नमस्तस्मै रमेशाय रुक्मिणीवल्लभाय ते ।
देहि मे तनयं श्रीश गोपबालकनायक ॥
नमस्ते वासुदेवाय नित्यश्रीकामुकाय च ।
देवशयनीय च सर्पेन्द्रशायिने रंगशायिने ॥
रंगशायिन् रमानाथ मंगलप्रद माधव ।
देहि मे तनयं श्रीश गोपबालकनायक ॥
दासस्य मे सुतं देहि दीनमन्दार राघव ।
सुतं देहि सुतं देहि पुत्रं देहि रमापते ॥
यशोदातनयाभीष्टदेवशयनीनरत: सदा ।
देहि मे तनयं कृष्ण त्वामहं शरणं गत: ॥
मदिष्टदेव गोविन्द वासुदेव जनार्दन ।
देहि मे तनयं कृष्ण त्वामहं शरणं गत: ॥
नीतिमान् धनवान् पुत्रो विद्यावांश्च प्रजायते ।
भगवंस्त्वत्कृपायाश्च वासुदेवेन्द्रपूजित ॥
य: पठेत् पुत्रशतकं सोsपि सत्पुत्रवान् भवेत् ।
श्रीवासुदेवकथितं स्तोत्ररत्नं सुखाय च ॥
जपकाले पठेन्नित्यं पुत्रलाभं धनं श्रियम् ।
ऐश्वर्यं राजसम्मानं सद्यो याति न संशय: ॥
ब्रह्मा जी ने बगुलामुखी का उपदेश सनक चंदन और सनातन को दिया था. सनत कुमार जी ने बगुलामुखी का उपदेश देवर्षि नारद को दिया और देवर्षि नारद ने सांख्यायन सनक परमहंस ऋषि को दिया.
2- सांख्यायन ने बगलामुखी विद्या को 36 भागों में बांटा और बगुला तंत्र की रचना की. भगवान परशुराम ने इस विद्या को द्रोणाचार्य जी को प्रदान किया.
3- भगवान परशुराम ने बगुलामुखी विद्या के द्वारा देवराज इंद्र के वज्र को भी निष्प्रभावी कर दिया था. भगवान श्री कृष्ण के परामर्श से धर्मराज युधिष्ठिर ने कौरवों पर जीत पाने के लिए बगलामुखी देवी की तपस्या की थी.
4- अश्वत्थामा द्वारा पांडवों पर इस्तेमाल किए गए ब्रह्मास्त्र की 99% शक्ति को भगवान श्री कृष्ण ने मां बगलामुखी के बल पर बेअसर कर दिया था और समुद्र में गिरा दिया था, और उसकी 1% शक्ति को उत्तरा के गर्भ में प्रत्यारोपित करके परीक्षित को फिर से जीवित किया था.
5- भगवान श्री कृष्ण ने राजा नल को भी श्री बगलामुखी की तपस्या करने के लिए प्रेरित किया था. तंत्र साधना और सिद्धियों के द्वारा रावण ने सोने की लंका का निर्माण किया.
6- विश्वामित्र जैसे महान तंत्र आचार्य ने बगुलामुखी शक्ति के द्वारा दूसरे लोक का निर्माण भी कर दिया था और ब्रह्मा की सृष्टि को चुनौती दी थी. तो फिर आम जीवन की आवश्यकताओं को पूरा करने के लिए बगुलामुखी शक्ति का इस्तेमाल क्यों नहीं किया जा सकता है.
7- बगलामुखी साधना को पूरी तरह से जानने से पहले यह जानना जरूरी है कि 10 महाविद्या क्या है. 10 महाविद्याओं में सबसे पहली काली, दूसरी तारा, तीसरी षोडशी, चौथी भुनेश्वरी, पांचवी छिन्नमस्ता, छठी त्रिपुर भैरवी, सातवीं धूमावती, आठवीं बगलामुखी, नौवीं मातंगी और दसवीं कमला है.
माँ बगलामुखी की कथा
जब दक्ष प्रजापति ने अपने यज्ञ में सभी देवताओं और मंत्रियों को निमंत्रण दिया. परंतु नाराजगी के कारण उन्होंने सती को आमंत्रित नहीं किया. सती ने शिव से पिता के यज्ञ में जाने की आज्ञा मांगी. शिव ने बिना बुलाए वहां जाना अनुचित बताकर सती को जाने से रोका, पर सती ने शिव की बात ना मानकर उनसे कहा मैं अपने पिता के यज्ञ में आपके हिस्सेदारी निश्चित करने हेतु अवश्य जाऊंगी और अगर आपको पूर्ण रूप से सम्मान ना दिला सकी तो यज्ञ नष्ट कर दूंगी. ऐसा कहकर माता सती के नेत्र लाल हो गए. क्रोध की अग्नि में जलने की वजह से सती का रंग काला हो गया और उनका भयानक रूप देखकर शिव सती से डर कर भागने लगे. शिव नहीं चाहते थे कि बिना किसी वजह के सती अपना देह त्याग करें. भागते भागते शिव को देवी ने पूर्व में काली कोण में तारा दक्षिण में षोडशी नृत्य कोण में भुवनेश्वरी पश्चिमी कोण में बगुलामुखी ऊपरी दिशा में मातंगी और कमला रूप में प्रकट होकर शिव का रास्ता रोकने लगी. सती के यह 10 रूप काली, तारा, षोडशी, छिन्नमस्ता, भुवनेश्वरी, त्रिपुर भैरवी, धूमावती, बगलामुखी, माता जी और कमला नाम से प्रसिद्ध हुए. अष्टमी महाविद्या बगलामुखी मानी जाती हैं.

विष्णु पुराण में बताया गया है की एक बार सतयुग में पूरी सृष्टि का नाश कर देने की क्षमता रखने वाला भयंकर तूफान आया. तब सभी प्राणियों की रक्षा करने के लिए भगवान श्री विष्णु ने सौराष्ट्र देश में हरिद्रा सरोवर के समीप तपस्या करना आरंभ किया. जिससे मंगलवार चतुर्दशी की अर्धरात्रि के समय माता बगलामुखी का प्राकट्य हुआ. माता ने स्तंभन क्रिया के द्वारा पूरे विश्व को स्तंभित कर दिया. जिससे संसार की रक्षा हुई. कालांतर में इनका नाम बगुलामुखी पड़ा. बगलामुखी स्तंभन मिलन और सम्मोहन की महादेवी मानी जाते हैं.