30 अक्टूबर 2026, शुक्रवार सूर्योदय: सुबह 06:31 AM सूर्यास्त: शाम 05:38 PM & 30 अक्टूबर 2026 का पंचांग: शुक्रवार के दिन कार्तिक कृष्ण पक्ष की पंचमी तिथि & 30 अक्टूबर 2026 को कार्तिक कृष्ण पक्ष की पंचमी तिथि और शुक्रवार का दिन है। कल पंचमी तिथि शाम 7 बजकर 26 मिनट तक रहेगी। कल रात 8 बजकर 42 मिनट तक शिव योग रहेगा। साथ ही कल 30 अक्टूबर को सुबह 9 बजकर 5 मिनट तक मृगशिरा नक्षत्र रहेगा, उसके बाद आर्द्रा नक्षत्र लग जायेगा।

आज भगवान शिव और माता पार्वती की आराधना की जाती है। आज का दिन मां लक्ष्मी और भगवान स्कंद को भी समर्पित है। घर से निकलने से पहले घर के बड़ों का आशीर्वाद लें, तत्पश्चात यात्रा के लिए प्रस्थान करें। भगवान भोलेनाथ की कृपा से आपका जीवन सुख, समृद्धि और अच्छी सेहत से परिपूर्ण हो! कल्याण हो!
By Chandra Shekhar Joshi Chief Editor & Founder Sadhak Bagla Mukhi Peeth Dehradun Mob. 9412932030
सलाह लें Bagla Mukhi Peeth Founder Sadhak :चंद्रमा दिखाई नहीं देता है, तो सलाह लें
सुबह सरगी खाने के बाद शुरू होने वाला यह व्रत रात में चंद्रमा दर्शन के बाद ही खोला जाता है। ऐसे में व्रत रखने वाली महिलाओं के लिए चंद्रोदय का समय और व्रत खोलने की सही विधि जानना जरूरी है। इस व्रत का पारण चांद को अर्घ्य देने के बाद ही किया जाता है।ऐसे में जब चांद निकल आए तो उसकी विधि विधान से पूजा करें। इसके बाद अपना व्रत खोल लें। चंद्रमा के दर्शन और अर्घ्य देने के बाद व्रत खोलने की परंपरा है। इसके लिए महिलाएं ये चरण अपना सकती हैं:
शिव योग और मृगशिरा नक्षत्र रहेगा। इसके बाद आर्द्रा नक्षत्र लग जाएगा। शिव योग में किए गए कार्य, विशेषकर मंत्र प्रयोग में सफलता मिलती है। बात करें मृगशिरा नक्षत्र की तो, इसका अर्थ है हिरण का सिर। इस नक्षत्र के प्रभाव से जातक सुंदर, व्यवहार कुशल, सामाजिक और रचनात्मक होता है। हालांकि, ये लोग थोड़े शर्मीले और संकोची स्वभाव के होते हैं, जिसके कारण इन्हें दूसरे से घुलने-मिलने में समय लगता है। इस नक्षत्र के स्वामी मंगल हैं। इस नक्षत्र का संबंध खैर के पेड़ से बताया है, जिससे कत्था बनता है। इस नक्षत्र में जन्मे लोगों को खैर के पेड़ की उपासना करनी चाहिए और इसे कोई नुकसान न पहुंचाएं। ऐसा करने से शुभ फलों की प्राप्ति होगी।

- वार: शुक्रवार
- मास: कार्तिक (कृष्ण पक्ष)
- तिथि: पंचमी (शाम 07:24 PM तक, उपरांत षष्ठी)
- नक्षत्र: मृगशिरा (सुबह 09:04 AM तक, उपरांत आर्द्रा)
- योग: शिव (रात 08:41 PM तक, उपरांत सिद्ध)
- करण: कौलव (सुबह 08:45 AM तक, उपरांत तैतिल)
- सुबह 04:48 AM से 05:40 AM
- अभिजित मुहूर्त: सुबह 11:42 AM से दोपहर 12:27 PM
- विजय मुहूर्त: दोपहर 01:56 PM से 02:40 PM राहुकाल: सुबह 10:41 AM से दोपहर 12:05 PM
- ब्रह्म मुहूर्त- 04:48 ए एम से 05:40 ए एम
- प्रातः सन्ध्या- 05:14 ए एम से 06:31 ए एम
- अभिजित मुहूर्त- 11:42 ए एम से 12:27 पी एम
- विजय मुहूर्त- 01:56 पी एम से 02:40 पी एम
- गोधूलि मुहूर्त- 05:38 पी एम से 06:03 पी एम
- सायाह्न सन्ध्या- 05:38 पी एम से 06:55 पी एम
- अमृत काल- 09:58 पी एम से 11:27 पी एम
करवा चौथ व्रत कथा (Karwa Chauth Vrat Katha In Hindi)
करवा चौथ की पावन कथा अनुसार, बहुत समय पहले की बात है। इन्द्रप्रस्थपुर नाम के एक शहर में वेदशर्मा नाम का एक ब्राह्मण रहा करता था। जिसका विवाह लीलावती नाम की स्त्री से हुआ था। उनके सात पुत्र और एक वीरावती नाम की गुणवान पुत्री थी। वीरावती अपने माता-पिता के साथ-साथ भाइयों की भी लाडली थी। बड़े होने पर उस कन्या की शादी एक उचित ब्राह्मण युवक से करा दी गई। शादी के बाद वीरावती जब अपने माता-पिता के यहां आई तब उसने अपनी भाभियों के साथ करवा चौथ का व्रत रखा। इस व्रत के दौरान वीरावती भूख से व्याकुल हो उठी। उसका मुरझाया चेहरा देख उसके भाई काफी परेशान हो गए।
भाईयों ने बहन को चांद निकलने से पहले ही कुछ खाने के लिए कहा लेकिन बहन ने इसके लिए साफ मना कर दिया। बहन ने कहा कि वह चन्द्रमा के दर्शन किये बिना भोजन ग्रहण नहीं करेगी चाहे उसके प्राण ही क्यों ना निकल जायें। फिर सभी भाईयों ने मिलकर एक योजना बनाई जिससे उनकी बहन भोजन ग्रहण कर ले। उनमें से एक भाई घर से कुछ दूरी पर स्थित एक वट के वृक्ष पर हाथ में छलनी और दीपक लेकर चढ़ गया। फिर अन्य भाईयों ने उससे कहा कि देखो चन्द्रोदय हो गया है।
भूख से व्याकुल वीरावती ने तुरंत ही दीपक को चन्द्रमा समझ अर्घ अर्पण कर अपना व्रत को तोड़ा। इसके बाद वीरावती ने जब भोजन करना प्रारम्भ किया तो उसे अशुभ संकेत मिलने लगे। पहला कौर लेते ही उसे उसमें बाल मिला, दूसरें में उसे छींक आई और तीसरे कौर में उसे अपने ससुराल से बुलावा आ गया। जब वो ससुराल पहुंची तो उसने देखा कि उसके पति की मृत्यु हो गई है। ये देख वीरावती जोर-जोर से रोने लगी। उसका विलाप सुनकर देवी इन्द्राणी उसके पास आई और सान्त्वना देने लगीं।
वीरावती ने देवी इन्द्राणी से पूछा कि करवा चौथ के दिन ही उसके साथ ऐसा क्यों हुआ। वीरावती का दुःख देखकर देवी इन्द्राणी ने उससे कहा कि उसने चन्द्रमा को अर्घ दिये बिना ही अपना व्रत तोड़ा था जिसके कारण उसके पति की मृत्यु हो गई। वीरावती को अपनी भूल का अहसास हुआ और वे अपने पति को जीवित करने की देवी इन्द्राणी से विनती करने लगी। देवी इन्द्राणी ने वीरावती को करवा चौथ के व्रत के साथ-साथ पूरे साल में आने वाली हर माह की चौथ को व्रत करने की सलाह दी। साथ ही देवी ने उसे आश्वासित किया कि ऐसा करने से उसका पति जीवित लौट आएगा। इसके बाद वीरावती ने हर चौथ का विधि विधान से व्रत रखा जिससे वीरावती को उसका पति पुनः प्राप्त हो गया।