३० मई को हिन्दी का पहला समाचार पत्र “उदंत मार्तंड” चन्द्रशेखर जोशी
भारत के लघु और मध्यम समाचार पत्रो का महासंघ- इंडियन फेडरेशन आफ स्माल एण्ड मीडियम न्यूूज पेपर्स, नई दिल्ली, जो प्रैस काउंसिल आफ इंडिया से लम्बे समय तक अधिसूचित रहा राष्ट्रीय स्तर पर गठित संगठन है। आई0एफ0एस0एम0एन0 फैडरेशन 1985 से अस्तित्व में हैं जिसके कार्यक्रमो में समय-समय पर तत्कालीन प्रधानमंत्री श्रद्वेय राजीव गाॅधी जी, श्रीमान प्रणव मुखर्जी जी व अनेक राज्यों के मुख्य मंत्रिगण, पी0सी0आई0 चैयरमैन, तथा तत्कालीन लोकसभा अध्यक्ष उपस्थित होकर हिस्सा लेते रहे है। भारतीय प्रेस परिषद भी फैडरेशन के कार्यो की समय समय पर प्रशंसा करता रहा हैं। फैडरेशन ने पीआईबी व डीएवीपी में भी भागीदारी की है।
उत्तराखण्ड में फैडरेशन नीतिगत पत्रकारिता के प्रति कटिबद्ध होकर सूबे में लघु व मध्यम समाचार पत्रों के सबसे बड़े संगठन के रूप में कार्यरत है, चन्द्रशेखर जोशी सम्पादक राज्य स्तरीय मान्यता प्राप्त फैडरेशन के उत्तराखण्ड अध्यक्ष पद पर है,
३० मई हिन्दी पत्रकारिता दिवस आई०एफ०एस०एम०एन० उत्तराखण्ड प्रत्येक वर्ष मनाया जाता हैः चन्द्रशेखर जोशी
३० मई हिन्दी पत्रकारिता दिवसः से पूर्व मैं पत्रकारिता पर कहना चाहूंगा कि गोस्वामी तुलसीदास ने कहा है- कीरति भनति भूलि भलि सोई, सुरसरि सम सबकर हित होई। उपरोक्त कथन पत्रकारिता की मूल भावना को स्पष्ट करता है । विद्वानों ने पत्रकारिता को शीघ्रता में लिखा गया इतिहास भी कहा है। इन्द्र विद्या वचस्पति ने पत्रकारिता को ‘पांचवां वेद“ माना। उन्होंने कहा है कि पत्रकारिता पांचवां वेद है, जिसके द्वारा हम ज्ञान-विज्ञान संबंधी बातों को जानकर अपना बंद मस्तिष्क खोलते हैं। पत्रकारिता जन भावना की अभिव्यक्ति, सद्वावों की अनुभूति और नैतिकता की पीठिका है । यह हमारे आदर्श वाक्य है। पत्रकारिता जनता और सरकार के बीच, समस्या और समाधान के बीच, व्यक्ति और समाज के बीच, गांव और शहर की बीच, देश और दुनिया के बीच, उपभोक्ता और बाजार के बीच सेतु का काम करती है। यदि यह अपनी भूमिका सही मायने में निभाए तो हमारे देश की तस्वीर वास्तव में बदल सकती है।

३० मई हिन्दी पत्रकारिता दिवसः “३० मई १८२६, मंगलवार का दिन था. उस दिन कलकत्ता की आमड तल्ला गली की एक हवेली से हिन्दी का एक नया इतिहास लिखा जा रहा था। दोपहर में कलकत्ता के कुछ लोगों के हाथ में पुस्तक के आकार में छपा हुआ हिन्दी का एक समाचार पत्र आया. ये हिन्दी का पहला समाचार पत्र था। ३० मई १८२६ में “ उदंत मार्तंड” नाम से हिंदी के प्रथम समाचार पत्र का प्रकाशन प्रारंभ हुआ। यह साप्ताहिक पत्र १८२७ तक चला और पैसे की कमी के कारण बंद हो गया। “ये बात सन १८२० के दशक की है। उस दौर में कलकत्ता में अंग्रेजी, फारसी और बांग्ला के कुछ अखबार निकलने लगे थे लेकिन हिन्दी का कोई भी समाचार पत्र नहीं था। ऐसे में श्री युगल किशोर शुक्ल ने अपने रचनात्मक साहस से हिन्दी पत्रकारिता की नींव रखी। ३० मई १८२६ के दिन उदंत मार्तण्ड का पहला अंक कलकत्ता के लोगों के हाथ में पहुंचा।
“उदंत मार्तंड“ के संपादक पंडित जुगलकिशोर थे। यह साप्ताहिक पत्र था। पत्र की भाषा पछाँही हिंदी रहती थी, जिसे पत्र के संपादकों ने “मध्यदेशीय भाषा“ कहा है। यह पत्र १८२७ में बंद हो गया। उन दिनों सरकारी सहायता के बिना किसी भी पत्र का चलना असंभव था। कंपनी सरकार ने मिशनरियों के पत्र को डाक आदि की सुविधा दे रखी थी, परंतु चेष्टा करने पर भी “उदंत मार्तंड“ को यह सुविधा प्राप्त नहीं हो सकी। युगल जी ने विदेशी सत्ता से लगभग डेढ साल तक संघर्ष किया. वे उस संघर्ष से तो कभी नहीं घबराए लेकिन सक्षम हिन्दी भाषी समाज की उपेक्षा ने उन्हें जरूर परेशान किया. लंबे संघर्ष और आर्थिक परेशानी के बाद दिसंबर १८२७ में उन्हें उदंत को बंद करना पडा.इसके अंतिम अंक में उन्होंने लिखा
आज दिवस लौं उग चुक्यौ मार्तण्ड उदन्त अस्ताचल को जात है दिनकर दिन अब अन्त ।
भले ही उदंत उस समय बंद हो गया मगर उसके माध्यम से युगल जी ने पत्रकारिता के प्रति समर्पण, संकल्प और निष्ठा की एक ऐसी इबारत लिखी जो पत्रकारिता के लिए मिसाल बनकर सामने आती है। १८३० में राममोहन राय ने बडा हिंदी साप्ताहिक ”बंगदूत” का प्रकाशन शुरू किया। वैसे यह बहुभाषीय पत्र था, जो अंग्रेजी, बंगला, हिंदी और फारसी में निकलता था। यह कोलकाता से निकलता था जो अहिंदी क्षेत्र था। इस से पता चलता है कि राममोहन राय हिंदी को कितना महत्व देते थे।
१८३३ में भारत में २० समाचार-पत्र थे, १८५० में २८ हो गए, और १९५३ में ३५ हो गये। इस तरह अखबारों की संख्या तो बढी, पर नाममात्र को ही बढी। बहुत से पत्र जल्द ही बंद हो गये। उन की जगह नये निकले। प्रायः समाचार पत्र कई महीनों से ले कर दो-तीन साल तक जीवित रहे। १८२६ ई. से १८७३ ई. तक को हम हिंदी पत्रकारिता का पहला चरण कह सकते हैं।
१८४६ में राजा शिव प्रसाद ने हिंदी पत्र “बनारस अखबार” का प्रकाशन शुरू किया। राजा शिव प्रसाद शुद्ध हिंदी का प्रचार करते थे और अपने पत्र के पृष्ठों पर उन लोगों की कडी आलोचना की जो बोल-चाल की हिंदुस्तानी के पक्ष में थे। लेकिन उसी समय के हिंदी लेखक भारतेंदु हरिशचंद्र ने ऐसी रचनाएं रचीं जिन की भाषा समृद्ध भी थी और सरल भी। इस तरह उन्होंने आधुनिक हिंदी की नींव रखी है और हिंदी के भविष्य के बारे में हो रहे विवाद को समाप्त कर दिया। १८६८ में भरतेंदु हरिशचंद्र ने साहित्यिक पत्रिका ‘कविवच सुधा‘ निकालना प्रारंभ किया। १८५४ में हिंदी का पहला दैनिक ”समाचार सुधा वर्षण“ निकला।

हिन्दी पत्रकारिता की कहानी भारतीय राष्ट्रीयता की कहानी है। हिन्दी पत्रकारिता के आदि उन्नायक जातीय चेतना, युगबोध और अपने महत् दायित्व के प्रति पूर्ण सचेत थे। कदाचित् इसलिए विदेशी सरकार की दमन-नीति का उन्हें शिकार होना पडा था, उसके नृशंस व्यवहार की यातना झेलनी पडी थी। उन्नीसवीं शताब्दी में हिन्दी गद्य-निर्माण की चेष्ठा और हिन्दी-प्रचार आन्दोलन अत्यन्त प्रतिकूल परिस्थितियों में भयंकर कठिनाइयों का सामना करते हुए भी कितना तेज और पुष्ट था इसका साक्ष्य ‘भारतमित्र‘ (सन् १८७८ ई, में) ”सार सुधानिधि“ (सन् १८७९ ई.) और ”उचितवक्ता“ (सन् १८८० ई.) के जीर्ण पृष्ठों पर मुखर है।

हिन्दी पत्रकारिता में अंग्रेजी पत्रकारिता के दबदबे को खत्म कर दिया है। पहले देश-विदेश में अंग्रेजी पत्रकारिता का दबदबा था लेकिन आज हिन्दी भाषा का परचम चंहुदिश फैल रहा है।
हिंदी पत्रकार राष्ट्रीय आंदोलनों की अग्र पंक्ति में थे और उन्होंने विदेशी सत्ता से डटकर मोर्चा लिया। विदेशी सरकार ने अनेक बार नए-नए कानून बनाकर समाचारपत्रों की स्वतंत्रता पर कुठाराघात किया परंतु जेल, जुर्माना और अनेकानेक मानसिक और आर्थिक कठिनाइयाँ झेलते हुए भी हमारे पत्रकारों ने स्वतंत्र विचार की दीपशिखा जलाए रखी।

स्वतंत्रता से पूर्व अंग्रेजी समाचार पत्रों को भारतीय समाचार पत्रों की अपेक्षा ढेर सारी सुविधाये उपलब्ध थीं, वही भारतीय समाचार पत्रों पर प्रतिबन्ध लगा था। १८६७ ई. के पंजीकरण अधिनियम का उद्देश्य था, छापाखानों को नियमित करना। अब हर मुद्रित पुस्तक एवं समाचार पत्र के लिए यह आवश्यक कर दिया कि वे उस पर मुद्रक, प्रकाशक एवं मुद्रण स्थान का नाम लिखें। पुस्तक के छपने के बाद एक प्रति निःशुल्क स्थानीय सरकार को देनी होती थी। जो आज तक चली आ रही है।
स्वतंत्रता काल में इलाहाबाद से निकलने वाले समाचार पत्र में संपादकीय लिखने वाले संपादक को १० वर्ष की काला पानी की सजा होती थी। आठ संपादक हुए जिनकों कुल मिलाकर १२५ साल की काला पानी सजा हुई। इसमें देहरादून के नन्दगोपाल चोपडा का नाम भी शामिल है जिनकों अपनी पत्रकारीय कार्य के लिए ३० वर्ष की काला पानी की सजा हुई थी। आजादी के उस पवित्र यज्ञ में देहरादून की आहुति भी शामिल है जो पूरे उत्तराखंड के गर्व का विषय है। उत्तराखण्ड में पत्रकारिता की जडें आजादी के आंदोलन के समय ही जम चुकी थीं।
स्वाधीनता आंदोलन में यहां के पत्रकारों और समाचार पत्रों की अहम भूमिका रही। देश की आजादी के बाद भी यहां से निकलने वाले तमाम साप्ताहिक एवं पाक्षिक अखबारों का जनजागरूकता में अहम योगदान रहा। ये साप्ताहिक व पाक्षिक अखबार गांव-गांव की समस्याओं को प्रमुखता से उठाते थे और सरकार की योजनाओं के बारे में जनता को अवगत कराते थे। ८० के दशक में दैनिक समाचार पत्रों ने भी देहरादून से क्षेत्रीय संस्करण निकालने की शुरुआत की। उत्तराखण्ड राज्य आंदोलन में लघु व मध्यम समाचार पत्रों ने महत्वपूर्ण भूमिका निभायी।
भारतीय लघु और मध्यम समाचार पत्रों का महासंघ- इंडियन फेडरेशन ऑफ स्माल एण्ड मीडियम न्यूज पेपर्स, नई दिल्ली राष्ट्रीय स्तर पर गठित है जो १९८५ से अस्तित्व में हैं जिसके कार्यक्रमों में समय-समय पर तत्कालीन प्रधानमंत्री, मुख्यमंत्रियों, पी०सी०आई० चैयरमैनों, लोकसभा अध्यक्षों ने हिस्सा लिया है। फैडरेशन का राष्ट्रीय स्तर पर शानदार इतिहास रहा है। उत्तराखण्ड में फैडरेशन नीतिगत पत्रकारिता के प्रति कटिबद्व होकर सूबे में लघु व मध्यम समाचार पत्रों के संगठन के रूप में कार्यरत है तथा लघु व मध्यम समाचार पत्रों के हितों के लिए कार्यरत सक्रिय संगठन है, परन्तु अभी लडाई लम्बी है, और हमें एकजुट होना है, तभी लघु व मध्यम समाचार पत्रों की लडाई हम लड पायेगें परन्तु वर्षो पूर्व पत्रकारिता की चुनौती का अहसास प्रख्यात शायर अकबर इलाहाबादी को था, तभी वे लिखते हैंः

खींचो न कमानों को, न तलवार निकालो जब तोप मुकाबिल हो तो अखबार निकालो
जय हिन्द जय उत्तराखण्ड
चन्द्रशेखर जोशीः सम्पादक प्रदेश अध्यक्ष उत्तराखण्ड — आई०एफ०एस०एम०एन० भारत के लघु व मध्यम समाचार पत्रों का महासंघ — मोबा० 9412932030 mail;% csjoshi_editor@yahoo.in (www.himalayauk.org) Newsportal & Print Media) Publish at Dehradun & Haridwar