18 मई को ज्येष्ठ माह ( अधिकमास) के शुक्ल पक्ष की द्वितीया तिथि & 18 मई, सोमवार को ज्येष्ठ माह (अधिकमास) के शुक्ल पक्ष की द्वितीया तिथि है। इस तिथि पर रोहिणी नक्षत्र और सुकर्माण योग का संयोग & 18 मई को प्रथम (अधिक) ज्येष्ठ शुक्ल पक्ष की द्वितीया तिथि और सोमवार का दिन है। द्वितीया तिथि सोमवार शाम 5 बजकर 54 मिनट तक रहेगी। 18 मई को रात 9 बजकर 48 मिनट तक सुकर्मा योग रहेगा। साथ ही सोमवार दोपहर पहले 11 बजकर 32 मिनट तक रोहिणी नक्षत्र रहेगा। सूर्योदय- सुबह 5:28 बजे सूर्यास्त- शाम 7: 06 बजे & यह योग शुभ वार और नक्षत्र का संयोग & अमृत सिद्धि योग बन रहा है, जो अत्यंत शुभ और शक्तिशाली योग & 117 सालों से लंदन के म्यूजियम में है वाग्देवी & CHANDRA SHEKHAR JOSHI CHIEF EDITOR & PRESIDENT BAGLA MUKHI PEETH DEHRADUN Mob. 9412932030

लंदन में रखी वाग्देवी माता की वापस लाने का आदेश पारित

18 मई 2026 का पंचांग
- ज्येष्ठ शुक्ल पक्ष की द्वितीया तिथि- 18 मई 2026 को शाम 5 बजकर 54 मिनट तक
- सुकर्मा योग- 18 मई 2026 को रात 9 बजकर 48 मिनट तक
- रोहिणी नक्षत्र- 18 मई 2026 को दोपहर पहले 11 बजकर 32 मिनट तक
18 मई 2026 शुभ मुहूर्त

- ब्रह्म मुहूर्त- 04:36 ए एम से 05:20 ए एम
- अभिजित मुहूर्त- 12:09 पी एम से 01:01 पी एम
- विजय मुहूर्त- 02:46 पी एम से 03:38 पी एम
- गोधूलि मुहूर्त- 07:05 पी एम से 07:27 पी एम
- अमृत काल- 12:26 पी एम से 01:50 पी एम

18 मई 2026 का अशुभ समय
- राहुकाल- 05:29 पी एम से 07:07 पी एम
- नवग्रहों की स्थिति
- ज्येष्ठ शुक्ल पक्ष द्वितीया तिथि पर सर्वार्थ सिद्धि योग और अमृत सिद्धि योग बन रहा है. सर्वार्थ सिद्धि योग कार्य सफलता के लिए बेहद शुभ माना जाता है. यह योग शुभ वार और नक्षत्र का संयोग माना जाता है. इसके साथ ही अमृत सिद्धि योग बन रहा है, जो अत्यंत शुभ और शक्तिशाली योग माना जाता है. कल दिनभर शुभ-अशुभ समय, योग और नक्षत्र क्या रहने वाला है
- ज्येष्ठ माह की शुक्ल पक्ष द्वितीया पर नवग्रहों की स्थिति की बात करें, तो सूर्य ग्रह वृषभ राशि में विराजमान रहेंगे. चंद्रमा वृषभ राशि में विराजमान रहेंगे. मंगल ग्रह मेष राशि में विराजमान रहेंगे. बुध ग्रह वृषभ राशि में विराजमान रहेंगे. देवगुरु बृहस्पति मिथुन राशि में मौजूद रहेंगे. शुक्र ग्रह मिथुन राशि में विराजमान रहेंगे. शनि ग्रह मीन राशि में विराजमान रहने वाले हैं. केतु ग्रह सिंह और राहु ग्रह कुंभ राशि में विराजमान रहेंगे.
- ताराबल युक्त नक्षत्रों में अश्विनी, कृत्तिका, रोहिणी, मृगशिरा, आर्द्रा, पुष्य, मघा, उत्तरा फाल्गुनी, हस्त, चित्रा, स्वाति, अनुराधा, मूल, उत्तराषाढ़ा, श्रवण, धनिष्ठा, शतभिषा, उत्तराभाद्रपद आदि शामिल हैं। चंद्रबल राशियाँ: वृषभ, कर्क, सिंह, वृश्चिक, धनु, मीन आदि।
- लंदन में रखी वाग्देवी माता की वापस लाने का आदेश पारित
भोजशाला मंदिर को लेकर आए कोर्ट के फैसलों से मां वाग्देवी की मूल प्रतिमा को भारत वापस लाने की कवायद शुरू हो रही है, लेकिन क्या आप जानते हैं कि वाग्देवी माता कौन हैं, भोजशाला से उनका क्या संबंध है और उनकी प्राचीन प्रतिमा लंदन कैसे पहुंच गई? बता दें कि इतिहास, धर्म और संस्कृति से जुड़ी यह कहानी करीब एक हजार साल पुरानी मानी जाती है।

ग्देवी माता को देवी सरस्वती का ही दूसरा नाम है। हिंदू धर्म में मां सरस्वती (Mata Saraswati)को ज्ञान, वाणी, बुद्धि, संगीत, कला और शिक्षा की देवी कहा जाता है। ‘वाग्देवी’ शब्द दो शब्दों से मिलकर बना है — ‘वाक्’ और ‘देवी’। यहां ‘वाक्’ का अर्थ वाणी या शब्द से है, जबकि ‘देवी’ का अर्थ दिव्य शक्ति माना जाता है। इस तरह वाग्देवी का अर्थ हुआ ‘वाणी और ज्ञान की देवी’। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार मां वाग्देवी मनुष्य को ज्ञान, अभिव्यक्ति, बुद्धि और रचनात्मक शक्ति प्रदान करती हैं। इस कारण विद्यार्थी, शिक्षक, कलाकार और विद्वान विशेष रूप से उनकी पूजा करते हैं। मां वाग्देवी को सरस्वती, शारदा, भारती और वागीश्वरी नामों से भी जाना जाता है।

इतिहासकारों के अनुसार परमार वंश के प्रसिद्ध शासक राजा भोज ने 11वीं सदी में धार में एक विशाल शिक्षा केंद्र की स्थापना करवाई थी। इसे ‘सरस्वती सदन’ या भोजशाला कहा जाता था। यह स्थान उस समय संस्कृत, वेद, दर्शन, साहित्य और व्याकरण की शिक्षा का बड़ा केंद्र माना जाता था। देशभर से विद्वान यहां अध्ययन करने पहुंचते थे। इसी भोजशाला परिसर में राजा भोज ने मां वाग्देवी की एक बेहद सुंदर प्रतिमा स्थापित करवाई थी। माना जाता है कि यहां नियमित रूप से मां सरस्वती की पूजा और विद्या साधना होती थी।
मां वाग्देवी की यह प्राचीन प्रतिमा सफेद संगमरमर से बनी हुई है। इसकी ऊंचाई करीब 4 फीट और वजन लगभग 250 किलोग्राम बताया जाता है। प्रतिमा पर बेहद बारीक नक्काशी की गई है, जो उस समय की अद्भुत कला शैली को दर्शाती है। इसके अलावा प्रतिमा पर संस्कृत भाषा में शिलालेख भी अंकित हैं। मूर्ति में मां वाग्देवी का स्वरूप शांत और दिव्य दिखाई देता है। उन्हें श्वेत वस्त्र धारण किए हुए कमल पर विराजमान रूप में दर्शाया गया है, जो ज्ञान और पवित्रता का प्रतीक माना जाता है।
भोजशाला पर किसने किया था हमला
इतिहास के अनुसार साल 1305 में अलाउद्दीन खिलजी ने धार पर हमला किया। इस दौरान भोजशाला के बड़े हिस्से को नुकसान पहुंचाया गया। इसके बाद में 15वीं सदी के दौरान वहां मस्जिद का निर्माण कराया गया। माना जाता है कि मंदिर के कई खंभों और पत्थरों का इस्तेमाल उसी निर्माण में किया गया। इसी दौरान मां वाग्देवी की मूल प्रतिमा या तो छिपा दी गई या मलबे के नीचे दब गई।
कैसे लंदन पहुंची मां वाग्देवी की प्रतिमा
ब्रिटिश शासन के दौरान साल 1875 में भोजशाला परिसर में खुदाई की गई। खुदाई के दौरान मलबे से मां वाग्देवी की यह दुर्लभ प्रतिमा बाहर निकली। इसके बाद 1880 में ब्रिटिश अधिकारी मेजर किनकेड इस प्रतिमा को अपने साथ इंग्लैंड ले गए। तभी से यह प्रतिमा लंदन के ब्रिटिश म्यूजियम में रखी हुई है। बताया जाता है कि पिछले 100 से अधिक वर्षों से यह प्रतिमा वहीं संरक्षित है।
कैसे हुई प्रतिमा की पहचान
साल 1961 में प्रसिद्ध भारतीय पुरातत्वविद डॉ. विष्णु श्रीधर वाकणकर लंदन पहुंचे थे। उन्होंने ब्रिटिश म्यूजियम में रखी प्रतिमा का अध्ययन किया और पुष्टि की कि यह धार भोजशाला की मूल वाग्देवी प्रतिमा ही है। फिलहाल धार की भोजशाला में इसी मूर्ति की प्रतिकृति स्थापित है, जहां पूजा-अर्चना की जाती है।
फिर क्यों बढ़ी चर्चा
हाल ही में भोजशाला को कोर्ट ने हिंदू धार्मिक स्थल माना है। इसके साथ ही मां वाग्देवी की प्रतिमा को भारत वापस लाने की बात कही है। कई हिंदू संगठन और सामाजिक संस्थाएं इस ऐतिहासिक प्रतिमा की ‘घर वापसी’ की मांग कर रहे हैं।माना जा रहा है कि आने वाले समय में भारत सरकार इस मामले को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी उठा सकती है।
वसंत पंचमी पर होती है विशेष पूजा
मां वाग्देवी यानी मां सरस्वती की पूजा विशेष रूप से वसंत पंचमी पर की जाती है। इस दिन विद्यार्थी, शिक्षक और कलाकार मां से ज्ञान और बुद्धि का आशीर्वाद मांगते हैं। भोजशाला में भी वसंत पंचमी के अवसर पर विशेष पूजा-अर्चना का महत्व माना जाता रहा है। मां वाग्देवी की उपासना में इस मंत्र का विशेष महत्व माना गया है। ‘ॐ ऐं ह्रीं श्रीं वाग्देव्यै सरस्वत्यै नमः’ मान्यता है कि श्रद्धा भाव से इस मंत्र का जाप करने से ज्ञान, वाणी और बुद्धि की प्राप्ति होती है।
धार की भोजशाला से संबंध: मध्य प्रदेश के धार जिले में स्थित ऐतिहासिक भोजशाला को मां वाग्देवी (माता सरस्वती) का मंदिर माना जाता है।
मूल प्रतिमा का इतिहास: भोजशाला में स्थापित मूल मां वाग्देवी की प्रतिमा वर्तमान में लंदन के ब्रिटिश म्यूजियम में रखी हुई है। यह मूर्ति सदियों पुरानी और बेहद दुर्लभ कलाकृति है।
हाईकोर्ट का फैसला: मध्य प्रदेश हाईकोर्ट ने पुरातात्विक साक्ष्यों और एएसआई (ASI) की रिपोर्ट के आधार पर ऐतिहासिक फैसला सुनाया था। इसके तहत धार की भोजशाला को आधिकारिक रूप से हिंदू मंदिर (मां वाग्देवी का मंदिर) माना गया है और वहां विधिवत रूप से पूजा-अर्चना व हवन की गतिविधियां शुरू हो चुकी हैं।
स्वरूप: मां वाग्देवी को ज्ञान और कला की प्रतीक के रूप में श्वेत वस्त्र धारण किए, हाथों में वीणा, पुस्तक और माला लिए हुए दर्शाया जाता है।
117 सालों से लंदन के म्यूजियम में है वाग्देवी
मध्य प्रदेश की ऐतिहासिक नगरी धार में स्थित भोजशाला को लेकर इंदौर हाई कोर्ट ने शुक्रवार, 15 मई को बड़ा फैसला सुनाया। हाई कोर्ट ने भोजशाला को मां वाग्देवी का मंदिर मान लिया है।
इंदौर हाई कोर्ट ने ये फैसला तो सुना दिया कि भोजशाला एक मंदिर है, लेकिन इस मंदिर में देवी की पूजा के लिए वो मूर्ति ही नहीं है, जिनकी लोग पूजा करना चाहते हैं। अब सवाल ये उठता है कि मां वाग्देवी की मूर्ति कहां हैं, तो बता दें कि मां वाग्देवी की मूर्ति लंदन में है।

कोर्ट ने अपने फैसले में सरकार को ये निर्देश भी दिए हैं वो लंदन से माता की मूर्ति लाने का प्रयास करें। हाई कोर्ट के इस फैसले के बाद मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री मोहन यादव ने भी कहा है कि वे केंद्र सरकार के साथ मिलकर कोर्ट के इस फैसले पर काम करेंगे।