8 जुलाई 2026 (बुधवार) को आषाढ़ मास के कृष्ण पक्ष की अष्टमी तिथि है। इस दिन रेवती नक्षत्र दोपहर 03:29 तक रहेगा, जिसके बाद अश्विनी नक्षत्र और पंचक प्रारंभ हो जाएंगे। राहुकाल दोपहर 12:22 से 14:05 तक रहेगा, धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, बुधवार का दिन भगवान गणेश जी को समर्पित & 8 जुलाई को आषाढ़ माह के कृष्ण पक्ष की अष्टमी तिथि & इस तिथि पर रेवती नक्षत्र और अतिगंदा योग का विशेष संयोग पंचक आज दोपहर 12:07 पर समाप्त BY CHANDRA SHEKHAR JOSHI
8 जुलाई दिन है बुधवार और कल दिन के स्वामी ग्रह बुध रहेंगे जो अपनी ही राशि मिथुन में संचार करेंगे। ऐेसे में कल बुध और सूर्य की युति मिथुन राशि में रहने से बुधादित्य योग का संयोग बनेगा। साथ ही कल के दिन चंद्रमा का गोचर रेवती उपरांत अश्विनी नक्षत्र से मीन उपरांत मेष राशि पर होगा। चंद्रमा के इस गोचर की वजह से कल शाम में सुनफा योग भी बनेगा और साथ ही चंद्रमा और गुरु की विशेष स्थिति से गजकेसरी योग भी कल बनेगा।

दिन/वार: बुधवार मास: आषाढ़ पक्ष: कृष्ण पक्ष & तिथि: अष्टमी तिथि दोपहर 12:06 तक, इसके बाद नवमी तिथि प्रारंभ हो जाएगी। नक्षत्र: रेवती नक्षत्र दोपहर 03:29 तक, उसके बाद अश्विनी नक्षत्र (गंडमूल नक्षत्र प्रारंभ)। योग: अतिगण्ड योग सुबह 09:37 तक, इसके बाद सुकर्मा योग। सूर्योदय: सुबह 05:30 सूर्यास्त: शाम 07:22
शीतला अष्टमी (बसौड़ा): आज के दिन माता शीतला की पूजा की जाती है और उन्हें बासी भोजन (एक दिन पहले बना हुआ खाना/बसौड़ा) का भोग लगाया जाता है। यह पर्व ऋतु परिवर्तन के समय स्वास्थ्य और आरोग्यता के लिए मनाया जाता है।
रोज सुबह स्नान के बाद माथे और नाभि पर केसर या हल्दी का तिलक लगाएं। इससे कुंडली में गुरु मजबूत होंगे और मान-सम्मान बढ़ेगा। रोज या हर गुरुवार को विष्णु सहस्रनाम का पाठ करें या सुनें। यह उपाय कर्ज से मुक्ति दिलाता है और धन आगमन के नए रास्ते खोलता है। मंदिर में चने की दाल, केला, पीले वस्त्र या हल्दी का दान करें। इससे घर में सुख-समृद्धि और बरकत बनी रहती है। गुरुवार को केले के पेड़ की जड़ में हल्दी, चना दाल और गुड़ मिला जल चढ़ाएं। घी का दीपक जलाकर “ॐ बृं बृहस्पतये नमः” का जाप करें; करियर और विवाह की बाधाएं दूर होंगी। गुरुवार को अपने हाथों से गाय को गीली चने की दाल और गुड़ खिलाएं। इससे स्वास्थ्य संबंधी परेशानियां दूर होती हैं और सेहत का वरदान मिलता है
8 जुलाई की बात करें तो कल का दिन मेष और कर्क समेत कई राशियों के लिए बहुत ही शुभ और भाग्यशाली रहने वाला है। चंद्रमा का गोचर कल मीन उपरांत मेष राशि में होगा। इस गोचर में कल चंद्रमा रेवती उपरांत अश्विनी नक्षत्र में प्रवेश करेंगे जिससे पंचक भी समाप्त हो जाएगा। साथ ही कल बुधवार के दिन बुध अपनी राशि मिथुन में वक्री गोचर करते हुए सूर्य से युति बनाएंगे जिससे कल बुधादित्य योग का भी संयोग बनेगा।
देवशयनी एकादशी तथा चातुर्मास का आरंभ 25 जुलाई 2026, दिन शनिवार

धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, देवशयनी एकादशी के दिन सृष्टि के पालनकर्ता भगवान विष्णु क्षीर सागर में राजा बलि के यहां चार महीने के लिए योग निद्रा में चले जाते हैं। इसके बाद वे सीधे कार्तिक मास की देवउठनी एकादशी को जागते हैं। चूंकि इन चार महीनों में भगवान विष्णु शयन काल में होते हैं, इसलिए इस अवधि में कोई भी मांगलिक कार्य नहीं किया जाता, क्योंकि माना जाता है कि बिना भगवान के आशीर्वाद के किए गए शुभ कार्य सफल या फलदायी नहीं होते।
25 जुलाई 2026, दिन शनिवार से चातुर्मास शुरू हो रहा है और इसी दिन देवशयनी/हरिशयनी पर्व भी मनाया जाता है
धार्मिक मान्यता के अनुसार आषाढ़ शुक्ल पक्ष की एकादशी के दिन भगवान विष्णु क्षीरसागर में शेषनाग की शय्या पर चार माह के लिए योगनिद्रा में चले जाते हैं। इसी घटना के साथ चातुर्मास का आरंभ माना जाता है। ‘चातुर्मास’ का अर्थ है चार महीनों की अवधि, जो आषाढ़ शुक्ल एकादशी से शुरू होकर कार्तिक शुक्ल एकादशी/ देवउठनी एकादशी तक चलती है। इस बार 25 जुलाई 2026, दिन शनिवार से चातुर्मास शुरू हो रहा है और इसी दिन देवशयनी/हरिशयनी पर्व भी मनाया जाता है।
4 महीने के लिए इन कार्यों पर रहती है रोक
चातुर्मास के दौरान मुख्य रूप से निम्नलिखित मांगलिक कार्यों को वर्जित माना गया है:
1. विवाह संस्कार: इन चार महीनों में शादियां पूरी तरह बंद रहती हैं।
2. मुंडन और उपनयन संस्कार: बच्चों के जनेऊ या मुंडन जैसे मांगलिक कार्य नहीं किए जाते।
3. गृह प्रवेश: नए घर में प्रवेश या नए घर की नींव रखना/ भूमि पूजन करना वर्जित होता है। नए बड़े काम या व्यापार की शुरुआत करने से भी इस दौरान बचा जाता है।
भले ही इस दौरान भौतिक जगत के मांगलिक कार्यों पर रोक लग जाती है, लेकिन आध्यात्मिक दृष्टि से यह समय साल का सबसे पवित्र समय माना जाता है, क्योंकि चातुर्मास का समय बाहरी उत्सवों को रोककर, अंतर्मन की यात्रा और आत्मशुद्धि करने का होता है। भगवान विष्णु के सोने के बाद सृष्टि का संचालन भगवान शिव के हाथों में आ जाता है। इसी चातुर्मास के दौरान सावन का पवित्र महीना भी आता है, जिसमें महादेव की पूजा का विशेष महत्व है।
देवशयनी एकादशी से शुरू होने वाला यह समय भले ही शहनाइयों और शादियों को रोक देता है, लेकिन यह ईश्वर की भक्ति, दान-पुण्य और मानसिक शांति प्राप्त करने का सबसे उत्तम काल होता है।
हिंदू धर्म और पुराणों के अनुसार, देवशयनी एकादशी से चातुर्मास शुरू होने के पीछे एक बेहद रोचक पौराणिक कथा और वैज्ञानिक/प्राकृतिक कारण दोनों हैं। इसे मुख्य रूप से भगवान विष्णु के शयनकाल (सोने के समय) से जोड़कर देखा जाता है:
जब भगवान विष्णु ने वामन रूप धरकर दैत्यराज बली से तीन पग में तीनों लोक नाप लिए थे, तब बली की दानवीरता से प्रसन्न होकर उन्होंने बली को पाताल लोक का राजा बना दिया और खुद भी उसके साथ पाताल चलने का वचन दे दिया।
इससे माता लक्ष्मी और बाकी देवता चिंतित हो गए। तब माता लक्ष्मी ने राजा बली को रक्षासूत्र (राखी) बांधकर उनसे उपहार स्वरूप भगवान विष्णु को मांग लिया। लेकिन भगवान विष्णु अपने भक्त बली को निराश नहीं करना चाहते थे, इसलिए उन्होंने बली को वरदान दिया कि वे हर साल आषाढ़ शुक्ल एकादशी यानी देवशयनी एकादशी से कार्तिक शुक्ल एकादशी अर्थात् देवप्रबोधिनी एकादशी तक पाताल लोक में रहकर राजा बली के महल का पहरा देंगे। इसी समय को भगवान विष्णु का शयनकाल माना जाता है और यहीं से चातुर्मास के चार महीने की अवधि की शुरुआत होती है।
अगर इसे हम व्यावहारिक और प्राकृतिक नजरिए से देखें, तो चातुर्मास की शुरुआत आषाढ़ महीने के अंत में होती है, जब वर्षा ऋतु या मानसून चरम पर होता है।
इन चार महीनों में अत्यधिक बारिश के कारण हवा और पानी में बैक्टीरिया, कीड़े-मकौड़े और संक्रामक बीमारियां तेजी से पनपती हैं। हमारी पाचन शक्ति यानी जठराग्नि भी इस दौरान कमजोर हो जाती है।
पुराने समय में इस मौसम में नदियां उफान पर होती थीं और रास्ते बंद हो जाते थे। इसलिए साधु-संतों और लोगों को एक ही स्थान पर रुककर ईश्वर भक्ति करने की सलाह दी गई, ताकि वे सुरक्षित रह सकें।