26 अगस्त 2026 का दिन कुछ राशियों के लिए बेहद खास रहने वाला है। ग्रह नक्षत्रों की स्थिति के प्रभाव से इन राशियों को हर कदम पर सकारात्मक परिणाम मिल सकते हैं। राखी बांधने के लिए दिन में तीन शुभ अवसर & भगवान गणेश जी का ध्यान करें और फिर अपनी यात्रा शुरू करें। सावन में भगवान भोलेनाथ की कृपा से आपका जीवन सुख, समृद्धि और अच्छी सेहत से परिपूर्ण हो! कल्याण हो! by Chandra Shekhar Joshi Chief Editor & President Bagla Mukhi Peeth Dehradun Mob. 9412932030

26 अगस्त 2026 को श्रावण माह के शुक्ल पक्ष की त्रयोदशी तिथि और बुधवार & तिथि: त्रयोदशी तिथि (अगले दिन सुबह 06:21 AM तक) श्रवण नक्षत्र (रात 12:48 AM, 27 अगस्त तक) सूर्योदय: सुबह 05:56 AM सूर्यास्त: शाम 06:49 PM ब्रह्म मुहूर्त: सुबह 04:27 AM से 05:12 AM विजय मुहूर्त: दोपहर 02:32 PM से 03:23 PM अमृत काल: दोपहर 01:33 PM से 03:17 PM गोधूलि मुहूर्त: शाम 06:49 PM से 07:12 PM राहुकाल: दोपहर 12:22 PM से 01:59 PM
श्रावण शुक्ल पक्ष की त्रयोदशी तिथि और बुधवार& त्रयोदशी तिथि 26 अगस्त को सुबह 8 बजे तक & उसके बाद चतुर्दशी तिथि & सुबह 8 बजे तक सौभाग्य योग रहेगा, उसके बाद शोभन योग & कल रात 12 बजकर 48 मिनट तक श्रवण नक्षत्र रहेगा। श्रावण शुक्ल पक्ष की त्रयोदशी तिथि- 26 अगस्त को पूरा दिन पूरी रात पार करके अगले दिन सुबह 6 बजकर 21 मिनट तक
सौभाग्य योग, शोभन योग और श्रवण नक्षत्र रहेगा। शुभ कार्यों और यात्रा पर जाने के लिए शोभन योग उत्तम माना गया है, जिसमें शुरू की गई यात्रा मंगलमय रहती है। साथ ही जिस कामना से यात्रा की जाती है वह भी पूरी होती है। वहीं, श्रवण 27 नक्षत्रों में से 22वां नक्षत्र है। श्रवण का अर्थ होता है सुनना। श्रवण नक्षत्र की राशि मकर है। श्रवण नक्षत्र के दौरान राज्याभिषेक, गृह निर्माण, प्रकाशन, ध्वजारोहण और नामकरण करने से अच्छे फल प्राप्त होते हैं। इस नक्षत्र को हर प्रकार की विद्या सीखने और उसे सुरक्षित रखने से भी जोड़कर देखा जाता है। श्रवण नक्षत्र में विद्या से जुड़ा कोई भी काम करने से वह सफल जरूर होगा। श्रवण नक्षत्र के स्वामी चन्द्रमा हैं और अधिष्ठात्री देवी मां सरस्वती को माना जाता है।

सफेद मोतियों की माला पहनें। & सफेद रंग के फूल वाले पौधे की जड़ में पानी डालें। मंदिर में कपूर की डिब्बी दान करें। चांदी की वस्तु मंदिर में स्थापित करके उसकी पूजा करें और पूरा दिन पूजाघर में ही रहने दें। अगले दिन स्नान के बाद उस वस्तु को अपने पास रखें या उसे उपयोग में ला सकते हैं। & चावल और थोड़ी-सी मिश्री एक कपड़े में बांधकर मंदिर में दान करें। अपने सिरहाने के पास एक बर्तन में पानी भरकर रखें। अगली सुबह उस पानी को पेड़-पौधे की जड़ में डाल दें। हल्दी में थोड़ा-सा घी मिलाकर गणेश भगवान के मस्तक पर तिलक लगाएं और उनके सामने घी का दीपक भी जलाएं। मिट्टी के दिये में 2 कपूर जलाकर मां सरस्वती के आगे रखें। साथ ही देवी मां को ताजे पुष्प चढ़ाएं। घी, पिसी हुई शक्कर और सफेद तिल के लड्डू बनाकर भगवान गणेश को भोग लगाएं। सफेद तिल, घी और पिसी हुई शक्कर अलग-अलग लेकर मंदिर में दान कर दें सफेद दक्षिणावर्त्ती शंख की पूजा करके मंदिर में रखें।
राखी बांधते समय बोलें मंत्र & राखी बांधने के लिए दिन में तीन शुभ अवसर मिलेंगे। पहला मुहूर्त सुबह 5 बजकर 45 मिनट से 9 बजकर 45 मिनट तक रहेगा। इसके बाद दोपहर 1 बजकर 40 मिनट से शाम 4 बजकर 15 मिनट तक राखी बांधी जा सकेगी। वहीं, शाम का शुभ समय 6 बजकर 29 मिनट से रात 9 बजकर 12 मिनट तक रहेगा। रक्षाबंधन पर सबसे पहले भगवान का पूजन करें। इसके बाद भाई को पूर्व या उत्तर दिशा की ओर मुख करके बैठाएं। भाई को तिलक लगाकर अक्षत चढ़ाए और आरती करें। फिर शुभ मंत्र का जाप करते हुए उसकी दाहिनी कलाई पर राखी बांधे। इसके बाद मिठाई खिलाकर उसके सुखी जीवन की कामना करें। भाई के लिए कुछ उपहार लाई हो तो वह भी भेंट कर दें।
“येन बद्धो बलिराजा दानवेन्द्रो महाबलः। तेन त्वामनुबध्नामि रक्षे मा चल मा चल॥”
ग्रह बुध 29 अगस्त 2026 (शनिवार) को दोपहर 12:58 बजे सिंह राशि में रहते हुए पूर्वा फाल्गुनी नक्षत्र में प्रवेश कर रहे हैं। इस नक्षत्र के स्वामी सुख, वैभव, सौंदर्य और कला के प्रतीक ‘शुक्र देव’ हैं। बुध और शुक्र के इस गठबंधन से 12 राशियों के जीवन पर बौद्धिक और भौतिक प्रभाव
रावण रचित शिव तांडव स्तोत्र

शिव तांडव स्तोत्र
जटाटवीगलज्जल प्रवाहपावितस्थले गलेऽवलम्ब्य लम्बितां भुजंगतुंगमालिकाम्।
डमड्डमड्डमड्डमनिनादवड्डमर्वयं
चकार चंडतांडवं तनोतु नः शिवः शिवम ॥1॥
जटा कटा हसंभ्रम भ्रमन्निलिंपनिर्झरी ।
विलोलवी चिवल्लरी विराजमानमूर्धनि ।
धगद्धगद्ध गज्ज्वलल्ललाट पट्टपावके
किशोरचंद्रशेखरे रतिः प्रतिक्षणं ममं ॥2॥
धरा धरेंद्र नंदिनी विलास बंधुवंधुर-
स्फुरदृगंत संतति प्रमोद मानमानसे ।
कृपाकटा क्षधारणी निरुद्धदुर्धरापदि
कवचिद्विगम्बरे मनो विनोदमेतु वस्तुनि ॥3॥
जटा भुजं गपिंगल स्फुरत्फणामणिप्रभा-
कदंबकुंकुम द्रवप्रलिप्त दिग्वधूमुखे ।
मदांध सिंधु रस्फुरत्वगुत्तरीयमेदुरे
मनो विनोदद्भुतं बिंभर्तु भूतभर्तरि ॥4॥
सहस्र लोचन प्रभृत्य शेषलेखशेखर-
प्रसून धूलिधोरणी विधूसरांघ्रिपीठभूः ।
भुजंगराज मालया निबद्धजाटजूटकः
श्रिये चिराय जायतां चकोर बंधुशेखरः ॥5॥
ललाट चत्वरज्वलद्धनंजयस्फुरिगभा-
निपीतपंचसायकं निमन्निलिंपनायम् ।
सुधा मयुख लेखया विराजमानशेखरं
महा कपालि संपदे शिरोजयालमस्तू नः ॥6॥
कराल भाल पट्टिकाधगद्धगद्धगज्ज्वल-
द्धनंजया धरीकृतप्रचंडपंचसायके ।
धराधरेंद्र नंदिनी कुचाग्रचित्रपत्रक-
प्रकल्पनैकशिल्पिनि त्रिलोचने मतिर्मम ॥7॥
नवीन मेघ मंडली निरुद्धदुर्धरस्फुर-
त्कुहु निशीथिनीतमः प्रबंधबंधुकंधरः ।
निलिम्पनिर्झरि धरस्तनोतु कृत्ति सिंधुरः
कलानिधानबंधुरः श्रियं जगंद्धुरंधरः ॥8॥
प्रफुल्ल नील पंकज प्रपंचकालिमच्छटा-
विडंबि कंठकंध रारुचि प्रबंधकंधरम्
स्मरच्छिदं पुरच्छिंद भवच्छिदं मखच्छिदं
गजच्छिदांधकच्छिदं तमंतकच्छिदं भजे ॥9॥
अगर्वसर्वमंगला कलाकदम्बमंजरी-
रसप्रवाह माधुरी विजृंभणा मधुव्रतम् ।
स्मरांतकं पुरातकं भावंतकं मखांतकं
गजांतकांधकांतकं तमंतकांतकं भजे ॥10॥
जयत्वदभ्रविभ्रम भ्रमद्भुजंगमस्फुर-
द्धगद्धगद्वि निर्गमत्कराल भाल हव्यवाट्-
धिमिद्धिमिद्धिमि नन्मृदंगतुंगमंगल-
ध्वनिक्रमप्रवर्तित प्रचण्ड ताण्डवः शिवः ॥11॥
दृषद्विचित्रतल्पयोर्भुजंग मौक्तिकमस्रजो-
र्गरिष्ठरत्नलोष्टयोः सुहृद्विपक्षपक्षयोः ।
तृणारविंदचक्षुषोः प्रजामहीमहेन्द्रयोः
समं प्रवर्तयन्मनः कदा सदाशिवं भजे ॥12॥
कदा निलिंपनिर्झरी निकुजकोटरे वसन्
विमुक्तदुर्मतिः सदा शिरःस्थमंजलिं वहन्।
विमुक्तलोललोचनो ललामभाललग्नकः
शिवेति मंत्रमुच्चरन्कदा सुखी भवाम्यहम्॥13॥
निलिम्प नाथनागरी कदम्ब मौलमल्लिका-
निगुम्फनिर्भक्षरन्म धूष्णिकामनोहरः ।
तनोतु नो मनोमुदं विनोदिनींमहनिशं
परिश्रय परं पदं तदंगजत्विषां चयः ॥14॥
प्रचण्ड वाडवानल प्रभाशुभप्रचारणी
महाष्टसिद्धिकामिनी जनावहूत जल्पना ।
विमुक्त वाम लोचनो विवाहकालिकध्वनिः
शिवेति मन्त्रभूषगो जगज्जयाय जायताम् ॥15॥
इमं हि नित्यमेव मुक्तमुक्तमोत्तम स्तवं
पठन्स्मरन् ब्रुवन्नरो विशुद्धमेति संततम्।
हरे गुरौ सुभक्तिमाशु याति नांयथा गतिं
विमोहनं हि देहना तु शंकरस्य चिंतनम ॥16॥
पूजाऽवसानसमये दशवक्रत्रगीतं
यः शम्भूपूजनमिदं पठति प्रदोषे ।
तस्य स्थिरां रथगजेंद्रतुरंगयुक्तां
लक्ष्मी सदैव सुमुखीं प्रददाति शम्भुः ॥17॥
॥ इति शिव तांडव स्तोत्रं संपूर्णम्॥