23 अगस्त 2026 (रविवार)पुत्रदा एकादशी; संतान के जीवन में आने वाली सभी बाधाएं दूर होती हैं

रविवार 23 अगस्त 26 को भगवान सूर्य नारायण और श्री हरि विष्णु जी की कृपा के साथ-साथ प्रीति योग और सर्वार्थ सिद्धि योग के दुर्लभ संयोग में महामाई बगलामुखी पीठ में प्रातः 5 बजे ब्रह्म मुहूर्त में शिवलिंग अभिषेक, दीप प्रज्ज्वलित,,आरती स्तुति उपरांत 6 बजे नई दिल्ली प्रस्थान कर कांस्टीट्यूशन क्लब ऑफ इंडिया नई दिल्ली में धार्मिक क्षेत्र में उल्लेखनीय कार्यों के लिए पद्म श्री विजय कुमार चोपड़ा चेयरमैन पंजाब केसरी ग्रुप तथा जस्टिस कैलाश गंभीर जी तथा डॉक्टर सुषमा नाथ जी के कर कमलों से अवार्ड प्राप्त कर सम्मानित होगे,,, तथा 24 अगस्त को देश के महान बगला मुखी साधक से आशीर्वाद प्राप्त कर मिर्ची यज्ञ में शामिल होगे,,,और संपर्क में रहने वाले भक्तों के कल्याण की प्रार्थना,, अरदास लगायेगे

23 अगस्त को श्रावण शुक्ल पक्ष की एकादशी तिथि और रविवार का दिन है। एकादशी तिथि रविवार को पूरा दिन पूरी रात पार कर के भोर 4 बजकर 19 मिनट तक रहेगी। 23 अगस्त को शाम 5 बजकर 44 मिनट तक सर्वार्थसिद्धि योग रहेगा। साथ ही रविवार को शाम 5 बजकर 45 मिनट तक मूल नक्षत्र रहेगा। इसके अलावा 23 अगस्त को पुत्रदा एकादशी व्रत रखा जाएगा। 

पुत्रदा एकादशी व्रत की कथा

पौराणिक कथा के अनुसार, एक समय की बात है जब भद्रावती नगर में एक सुकेतु नाम का एक राजा राज्य करता था। उनकी पत्नी का नाम शैव्या था। वह राजा धर्म को बहुत मानने वाले और प्रजापालक थे। लेकिन इतना सब कुछ होने के बाबजूद भी उनकी कोई संतान नहीं थी। राजा को इस बात की चिंता सदैव सताती थी कि आगे उसके वंश का नाम कैसे चलेगा। इस कारण राजा सुकेतु यह सोच कर बहुत दुःखी रहते थे। एक दिन उन्होंने अपने आश्रम में कुछ ऋषि-मुनियों को देखा, जो वहां भजन कीर्तन करते हुए आ पहुंचे थे। राजा क्योंकि धर्मनिष्ठ थे और उनकी संतों में आस्था थी। इस कारण वह उनके पास गए और उन्हें प्रणाम किया। उन तेजस्वी और विद्वान ऋषियों ने राजा को देखते ही उसके दुःखी होने का अंदाजा लगा लिया था। 

राजा जब उनके पास पहुंचे तो उनसे अपनी सारी समस्या बताई। मुनियों ने राजा से कहा कि आप पौष माह के शुक्ल पक्ष की एकादशी को पुत्रदा एकादशी का व्रत रखिएगा। इस दिन व्रत रखने से आपको संतान सुख की प्राप्ति होगी। राजा ने मुनियों की बात मानी और पौष माह के शुक्ल पक्ष की एकादशी को पुत्रदा एकादशी का व्रत रखा। व्रत के बाद राजा सुकेतु ने भगवान विष्णु की पूजा-अर्चना की और उन्होंने पुत्र प्राप्ति का वरदान मांगा। भगवान विष्णु ने राजा की प्रार्थना स्वीकार कर ली और कुछ समय बाद राजा की पत्नी के गर्भ से एक पुत्र हुआ। राजा बहुत खुश हुआ और उसने पुत्रदा एकादशी व्रत के महत्व को लोगों को बताया।

पुत्रदा एकादशी 2026 शुभ मुहूर्त

  • एकादशी तिथि प्रारम्भ – अगस्त 23, 2026 को 02:00 ए एम बजे
  • एकादशी तिथि समाप्त – अगस्त 24, 2026 को 04:18 ए एम बजे
  • ब्रह्म मुहूर्त- 04:51 ए एम से 05:36 ए एम
  • प्रातः सन्ध्या- 05:13 ए एम से 06:21 ए एम
  • अभिजित मुहूर्त- 12:16 पी एम से 01:06 पी एम
  • विजय मुहूर्त- 02:47 पी एम से 03:38 पी एम
  •  हर माह में दो बार एकादशी का व्रत रखा जाता है एक कृष्ण और दूसरा शुक्ल पक्ष में। यह व्रत भगवान विष्णु को समर्पित होता है। 24 एकादशियों में सावन माह में आने वाली श्रावण पुत्रदा एकादशी को अत्यंत पुण्यदायी माना जाता है।  पुत्रदा एकादशी का व्रत करने से संतान सुख की कामना पूरी होती है। धार्मिक मान्यता है कि इस दिन विधिपूर्वक व्रत और पूजा करने से संतान प्राप्ति के योग मजबूत होते हैं और जीवन में सुख-समृद्धि आती है। इसके साथ ही संतान के जीवन में आने वाली सभी बाधाएं दूर होती हैं।

पंचांग के अनुसार, श्रावण माह के शुक्ल पक्ष की एकादशी तिथि का आरंभ 23 अगस्त को 02:00 ए एम पर होगा। एकादशी तिथि का समापन 24 अगस्त को 4:18 ए एम बजे होगा। उदयातिथि के अनुसार, श्रावण पुत्रदा एकादशी का व्रत 23 अगस्त 2026 को किया जाएगा। श्रावण पुत्रदा एकादशी के दिन पूजा के लिए ब्रह्म मुहूर्त सुबह 4 बजकर 51 मिनट से सुबह 5 बजकर 36 मिनट पर होगा। अभिजित मुहूर्त दोपहर 12 बजकर 16 मिनट पर आरंभ और समाप्त दोपहर 1 बजकर 6 मिनट पर होगा। विजय मुहूर्त दोपहर 2 बजकर 47 मिनट से सुबह 3 बजकर 38 मिनट तक रहेगा।  श्रावण पुत्रदा एकादशी व्रत का पारण 24 अगस्त  2026 को किया जाएगा। पारण के लिए शुभ समय दोपहर 1 बजकर 57 मिनट से दोपहर 4 बजकर 28 मिनट तक रहेगा। पारण तिथि के दिन हरि वासर समाप्त होने का समय सुबह 10 बजकर 49 मिनट पर होगा। पौराणिक कथा के अनुसार, प्राचीन काल में एक राजा था जिसकी कोई संतान नहीं थी। संतान के अभाव में वह अत्यंत दुखी रहता था। एक दिन वह वन में गया, जहां ऋषियों ने उसे श्रावण पुत्रदा एकादशी का व्रत करने की सलाह दी। राजा ने विधिपूर्वक व्रत किया और भगवान विष्णु की कृपा से उसे योग्य संतान की प्राप्ति हुई।

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