नैतिक और सामाजिक मूल्यों का क्षरण-*समलैंगिकता

*समलैंगिकता: एक सामाजिक समस्या* डाॅ0 कामिनी वर्मा

HIGH LIGHT; ‘मै चाहूॅ जो करूं मेरी मरजी’ को आदर्श बनाकर उन्मुक्तता को बढ़ावा# नैतिक और सामाजिक मूल्यों का क्षरण #Presented by- हिमालयायूके- हिमालय गौरव उत्‍तराखण्‍ड #Shashidhar Shukla <shukla.shashidhar@gmail.com> Delhi Bureau Chief

दो लड़कियाँ शादी रचा बन गई पति-पत्नी यह खबर 25 जुलाई 2009 को वाराणसी से प्रकाशित ‘अमर उजाला’ में मुख्य पृष्ठ पर सुर्खियों में रही। शामली (मुजफ्फरनगर) में दो लड़कियों ने सामाजिक मर्यादा को भंग करके हरिद्वार के मन्दिर और मुजफ्फरनगर के आर्य समाज मंदिर में समलैंगिक विवाह किया। गंगा को साक्षी मानकर, आस्ट्रेलिया के जेम्स और इटली के लूका के समलैंगिक विवाह करने की घोषणा 8 अगस्त 2018 को वाराणसी के ‘अमर उजाला’ समाचार पत्र में प्रकाशित हुई। समलैंगिक विवाह या समलैंगिक सम्बन्ध आये दिन वैश्विक स्तर पर समाचार पत्रों और टी0वी0 चैनलों पर चर्चा का विषय बने रहते हैं।

एक समान लिंग के लोगों अर्थात् ‘पुरुष का पुरुष’ के साथ तथा ‘स्त्री का स्त्री’ के साथ शारीरिक सम्बन्ध समलैंगिकता की श्रेणी में माता है। सामान्य रुप से पुरुष का आकर्षण स्त्री में तथा स्त्री का आकर्षक पुरुष में होता है। सृष्टि को गतिशील रखने के लिये प्रकृति ने स्त्री तथा पुरुष दोनों में स्वाभाविक काम-प्रवर्तियां उत्पन्न की हैं। परन्तु जब यह काम-प्रवर्तियां विपरीत लिंग के प्रति न होकर समान लिंग में जाग्रत हो जाती हैं तब उस सम्बन्ध को समलैंगिकता की संज्ञा से सम्बोधित किया जाता है। जब कोई पुरुष किसी पुरुष के साथ यौन सम्बन्ध स्थापित करता है तो उसे ‘समलिंगी’ या ‘गे’ तथा जब स्त्री किसी स्त्री के प्रति आकृष्ट होती है तब उसे ‘महिला समलिंगी’ या ‘लेस्बियन’ के नाम से जाना जाता है। यौन सम्बधों के आधार पर एक और ‘उभलिंगी’ वर्ग भी बनता है, जिसमें स्त्री-पुरुष दोनों के प्रति आकर्षित होते हैं। कुछ स्त्री या पुरुष शल्य चिकित्सा के माध्यम से अपना लिंग परिवर्तित करवा लेते हैं। इस प्रकार समलैंगिक-उभय लैंगिक ओर लिंग परिवर्तित लोगों को मिलाकर एल0जी0 बी0टी0 समुदाय बनता है। समलैगिकता न सिर्फ मनुष्यों में बल्कि पशु-पक्षियों में होती है। वैज्ञानिकों का दावा है बहुत से पशुओं जैसे पैग्विन, चिम्पाजी डाल्फिनों कुत्तों एवं साड़ो में समलैंगिकता की प्रवर्ति पायी गई है।

एक समान लिंग के लोगों अर्थात् ‘पुरुष का पुरुष’ के साथ तथा ‘स्त्री का स्त्री’ के साथ शारीरिक सम्बन्ध समलैंगिकता की श्रेणी में माता है। सामान्य रुप से पुरुष का आकर्षण स्त्री में तथा स्त्री का आकर्षक पुरुष में होता है। सृष्टि को गतिशील रखने के लिये प्रकृति ने स्त्री तथा पुरुष दोनों में स्वाभाविक काम-प्रवर्तियां उत्पन्न की हैं। परन्तु जब यह काम-प्रवर्तियां विपरीत लिंग के प्रति न होकर समान लिंग में जाग्रत हो जाती हैं तब उस सम्बन्ध को समलैंगिकता की संज्ञा से सम्बोधित किया जाता है। जब कोई पुरुष किसी पुरुष के साथ यौन सम्बन्ध स्थापित करता है तो उसे ‘समलिंगी’ या ‘गे’ तथा जब स्त्री किसी स्त्री के प्रति आकृष्ट होती है तब उसे ‘महिला समलिंगी’ या ‘लेस्बियन’ के नाम से जाना जाता है। यौन सम्बधों के आधार पर एक और ‘उभलिंगी’ वर्ग भी बनता है, जिसमें स्त्री-पुरुष दोनों के प्रति आकर्षित होते हैं। कुछ स्त्री या पुरुष शल्य चिकित्सा के माध्यम से अपना लिंग परिवर्तित करवा लेते हैं। इस प्रकार समलैंगिक-उभय लैंगिक ओर लिंग परिवर्तित लोगों को मिलाकर एल0जी0 बी0टी0 समुदाय बनता है। समलैगिकता न सिर्फ मनुष्यों में बल्कि पशु-पक्षियों में होती है। वैज्ञानिकों का दावा है बहुत से पशुओं जैसे पैग्विन, चिम्पाजी डाल्फिनों कुत्तों एवं साड़ो में समलैंगिकता की प्रवर्ति पायी गई है।

समलैंगिकता एक समस्या के रूप में’ वैश्विक स्तर पर लगभग हर समाज में, हर काल खण्ड में विद्यमान रही है। समलैंगिक सम्बन्धों के समाचार अक्सर चर्चा में रहते है। बदले हुये परिवेश में लोग न सिर्फ इस प्रवर्ति को सार्वजनिक रूप से स्वीकार कर रहे है बल्कि विवाह भी कर रहे हैं तथा जनमत को अपने पक्ष में करने के लिये आन्दोलन भी कर रहे है। व्यक्तिगत स्वतन्त्रता और मानवाधिकारों के नाम पर विश्व फलक पर विचारों में तीव्रता से परिवर्तन और खुलापन आया है। ‘मै चाहूॅ जो करूं मेरी मरजी’ को आदर्श बनाकर उन्मुक्तता को बढ़ावा दिया जा रहा है। नैतिक और सामाजिक मूल्यों का क्षरण हो रहा है। पश्चिमी देशों में व्यक्तिगत आजादी की जो धारा प्रवाहित हुई उसमें भी समलैगिंकता को प्रश्रय मिला। पहले जो समलैंगिक सम्बन्ध चोरी-छिपे बन्द कमरें में बनते थे वह आज विश्वव्यापी चर्चा का विषय बन गये है, और इस वर्ग के लोगों ने अपना ‘गौरव ध्वज’ भी निर्मित कर लिया है। ये लोग समलैंगिकता का उत्सव ‘गौरव परेड’ का आयोजन करके मना रहे है। यह ‘गौरव परेड’ जून 1969 के न्यूयार्क में भड़के स्टोनवाल दंगो की स्मृति में निकाली जाती है। ये दंगे पुलिस द्वारा लोगों के समलैगिक होने पर उन्हें प्रताड़ित करने के परिणामस्वरूप हुये थे। विश्व स्तर पर इस प्रकार के सम्बन्ध को मान्यता मिलनी आरम्भ हो गई है। विधिक रूप से समलैंगिक विवाह को वैधता प्रदान करने वाला पहला देश नीदरलैण्ड है जिसने 2001 में इसे विधिक मान्यता प्रदान की 1967 में ब्रिटेन ने अपने देश में समलैंगिकता और पुरुषों के बीच आपसी सहमति से होने वाले यौन सम्बन्ध को अपराध की श्रेणी से बाहर किया। ब्रिटेन ही नहीं बेल्जियम, कनाडा, स्पेन, न्यूजीलैण्ड, डेन्मार्क, अर्जेन्टीना, स्वीडन, पुर्तगाल आदि देशों में समलैंगिकता को मान्यता प्राप्त है। इतना ही नहीं अमेरिका ने सेना में समलैंगिक सैनिकों की भर्ती पर लगी रोक को हटाकर इसे प्रोत्साहित किया है।
भारतीय संस्कृति में जहां पश्चिम के अंधानुकरण ने समलैंगिकता को व्यापक रूप प्रदान किया वही प्राचीन समाज में इसके साक्ष्य आदिकाल से ही प्राप्त होते है। इस सम्बन्ध में सर्वाधिक प्रमाण उन चित्रकारियों से प्राप्त होते हैं, जिनमें दो पुरूषों को आपसी अन्तरंग सम्बन्ध को चित्रित किया गया है। खुजराहों तथा कोणार्क के सूर्य मंदिर से उत्कीर्ण शिल्प से भी इसका अनुमान लगाया जा सकता है। वात्स्यामन द्वारा रचित ‘कामसूत्र’ में इस विषय पर खुलकर चर्चा की गई है। वर्तमान में आंकड़ो पर दृष्टि डालें तो भारत में कुल जनसंख्या में समलैंगिको की संख्या 0.2 प्रतिशत है। केन्द्र सरकार द्वारा सुप्रीम कोर्ट को दी गई सूचना के अनुसार भारत में समलैंगिको की संख्या लगभग 25 लाख है।
स्त्री का पुरूष में आकर्षण और पुरूष का स्त्री में आकर्षण मूल प्रवर्ति है और इसी आकर्षण से स्थापित यौन सम्बन्ध से संतान की उत्त्पत्ति होती है जिससें सृष्टि चक्र गतिशील रहता है। परन्तु जब यह आकर्षण समान लिंग में होता है तो यह अप्राकृतिक सम्बन्ध के अन्तर्गत आता है, जिसमें लोग कामतृप्ति हेतु अपना लिंग भी परिवर्तित करवा लेेते हैं। अब प्रश्न उठता है, ऐसा क्यों होता है? क्या यह कोई मानसिक रोग है? या कोई अन्य कारण जिसके तहत लोग समान लिंग के प्रति आकृष्ट हो रहे हैं। इस प्रश्न का उत्तर दो दृष्टिकोण से खोजा जा सकता है।
1- वैज्ञानिक दृष्टिकोणः-
क- जीव विज्ञान की दृष्टि से शिशु जब गर्भ में होता है तभी कुछ विशेष प्रकार के हार्मोनो के स्रावित होने के कारण एवं गुणसूत्रों में विचलन के कारण भी यह प्रवर्ति जागृत होती है।
ख- प्रत्येक जीव में कुछ विशेष प्रकार के हार्मोन स्रावित होते है जिन्हें फिरोमोन के नाम से जाना जाता है जिसमें विशेष प्रकार की गंध होती है इसी गंध के तहत चीटियां लाइन से चलती हुयी देखी जा सकती है तथा कुत्ता किसी अनजान रास्ते पर जाकर वापस अपने मूल स्थान पर आ जाता है। अबोध शिशु अपनी माता को इसी विशेष गन्ध के कारण पहचानता है। इसी हार्मोन या विशेष गन्ध के कारण यौन इच्छा भी जागृत होती है जो स्त्री-पुरूष अथवा स्त्री-स्त्री या पुरूष-पुरूष या दोनो में हो सकती है।
ग- मनोवैज्ञानिक इसे मनोरोग की दृष्टि से भी देखते हैं। और कहते है इसे ‘रिपैरेटिव चिकित्सा’ द्वारा उपचारित किया जा सकता है।
2- समाजशास्त्रीय दृष्टिकोणः-
क- समाजशास्त्रीय दृष्टि से विश्लेषण करने पर हम पाते है जहां पर विपरीत लिंग की अनुपलब्धता है वहां एक आवश्यकता के रूप इस प्रवर्ति का जन्म हो रहा है।
ख- बहुत से लड़के लड़कियां अपने शर्मीले, संकोची स्वभाव के कारण विपरीत लिंग के साथ अपनी भावनायें व्यक्त नहीं कर पाते हैं अतः भावनात्मक संबल प्राप्त करने के उद्देश्य से समान लिंग में ही यौन सम्बन्ध स्थापित कर लेते है।
ग- कुछ लोग शौकिया तौर पर विपरीत लिंग से कामतृप्ति करते हैं।
घ- अच्छे दोस्त है एक दूसरे से अलग नहीं होने की चाहत में भी कुछ लोग समलैंगिक युगल बन जाते है।
ड़- व्यक्तिगत आजादी की धारा जो पश्चिमी देशों अमेरिका, जर्मनी आदि से प्रवाहित हुई उससे भी समलैंगिकता को प्रश्रय मिला।
ञ- जोखिम भरे कार्य करने की प्रबल भावना भी समलैंगिकता को प्रोत्साहित करती है।
समलैंगिकता न सिर्फ भारत की अपितु सम्पूर्ण विश्व की सामाजिक समस्या है। यह एक जटिल विवादित मानवीय रिश्ता है जिसका अस्तित्व आदिकाल से रहा है। भारत में इस प्रकार के सम्बन्ध को अपराध की श्रेणी में रखा गया है। इस दिशा में ब्रिटिश काल में 1860 में सर्वप्रथम कानून बनाकर अप्राकृतिक सम्बन्ध को अपराध माना गया। आई0पी0सी0 (इण्डियन पीनल कोड) 377 के अन्तर्गत किसी व्यस्क द्वारा स्वैच्छा से किसी पुरूष महिला या पशु के साथ अप्राकृतिक यौन सम्बन्ध स्थापित करने पर आजीवन कारावास या 10 वर्ष तक जेल की सजा और जुर्माने का प्रावधान किया गया। जिसका समलैंगिकता का समर्थक वर्ग निरन्तर विरोध कर रहा है और इसे संविधान के अनुच्छेद 14 और 21 का उलंघन करने वाला तथा मौलिक अधिकारों का हनन करने वाला बता रहा है। इस सम्बन्ध में नाज फाउण्डेशन ने दिल्ली हाईकोर्ट में इसे समाप्त करने की मांग की है। वकील श्याम दीवान का कथन है संविधान के अनुच्छेद 15 के अनुसार किसी के भी साथ धर्म, लिंग, जाति के आधार पर भेदभाव नहीं किया जायेगा इसमें लिंग के साथ यौन अभिरूचि को भी शामिल किया जाना चाहिये। क्योंकि समलैंगिको के साथ इसी आधार पर भेदभाव होता है।
इस सन्दर्भ में तमाम तरह की दलीलों के चलते दिल्ली हाईकोर्ट ने 2 जुलाई 2009 को दो व्यस्कों द्वारा आपसी सहमति से स्थापित होने वाले यौन सम्बन्धों के सन्दर्भ में आई0पी0सी0 की धारा 377 को असंवैधानिक घोषित कर दिया। परन्तु भारतीय समाज की जटिलताओं और परिवेश के मद्देनजर समलैंगिकता को उचित मानने वाले दिल्ली हाईकोर्ट के निर्णय को अवैध मानते हुये सुप्रीम कोर्ट ने 11 दिसम्बर 2013 को कहा कि आई0प0सी0 की धारा 377 को हटाने का अधिकार संसद के पास है और जब तक यह लागू है तब तक इसे अवैध नहीं माना जा सकता है।
वर्तमान में धारा 377 को लेकर गम्भीर चर्चा चल रही है प्रगतिशील विचारधारा का पोषक वर्ग इसे समाप्त करने की मांग कर रहा है। वित्त मंत्री अरूण जेटली ने मौलिक अधिकारो का समर्थन करके इस विषय पर बहस जारी कर दी है। उनका कथन है सुप्रीम कोर्ट को आई0पी0सी0 की धारा 377 पर पुनः विचार करना चाहिये क्योंकि सुप्रीम कोर्ट का निर्णय वैविश्वक स्तर पर लिये जा रहे निर्णयों के विपरीत है। इस मुद्दे को काँग्रेस नेता पी0 चिदम्बरम ने भी सहमति प्रदान की है उनका मन्तव्य है दिल्ली हाईकोर्ट का 2 जुलाई 2009 का निर्णय प्रशंसनीय था, इसे जारी रखना चाहिये था। यौन सम्बन्धों के आधार पर किसी को अपराधी घोषित करके जेल भेजना बेहद पुराना विचार है। इस सम्बन्ध में सुप्रीम कोर्ट 13 जुलाई 2018 की टिप्पणी है कि यदि समलैंगिक सम्बन्ध अपराध नहीं रहेेगें तो इससे जुड़ा सामाजिक कलंक और भेदभाव भी खत्म हो जायेगा हालांकि कोर्ट ने कहा है कि वह धारा 377 के सभी पहलुओं पर विचार करेगा।
आई0पी0सी0 की धारा को लेकर भले ही विवाद की स्थिति है और इसे समाप्त करने की मांग की जा रही है परन्तु इस संवेदनशील कानून को समाप्त करने से पहले हमें यह भी विचार करना होगा कि क्या हमारा समाज इस बदलाव के लिये तैयार हैं। धारा 377 का विरोध न किसी खास जाति, वर्ग या धर्म के लोग कर रहे हैं बल्कि हिन्दू मुस्लिम, सिख ईसाई सभी धर्मो ने इसे न सिर्फ समाज के लिये गम्भीर खतरा माना है बल्कि भारत के धार्मिक, सांस्कृतिक, नैतिक और सामाजिक मूल्यों को नष्ट करने वाला बतायाहै। इस सम्बन्ध में प्रधान न्यायाधीश जस्टिस दीपक मिश्रा, आरएफ नरीमन, एम.एम. खान विल्कर, डी.वाई चन्द्रचूड़ और इन्दू मल्होत्रा कीसंविधान पीठ की टिप्पणी उल्लेखनीय है जिसमें उन्होने आई0पी0सी0 की धारा 377 की वैधता को चुनौती देने वाली याचिकओं पर सुनवायी करते हुये कहा है कि वह अगर धारा 377 को समाप्त कर दिया गया तो अराजकता की स्थिति उत्पन्न हो जायेगी।

प्रयाग पीठ के शंकराचार्य ओमकारानन्द सरस्वती समलैंगिकता को मनोरोग से रूप में देखते हैं और इसका मनोचिकित्सक से उपचार कराने की सलाह देते हैं। आम लोगो की स्वास्थ्य सुरक्षा और नैतिक मूल्यों को सुरक्षित रखने के लिये धारा 377 का बना रहना आवश्यक है।

दो समान लिंग के व्यस्कों के बीच आपसी सहमति से बनाया गया यौन सम्बन्ध घृणित है। इसे किसी भी रूप में उचित नहीं माना जा सकता। यह सामाजिक अभिशाप है और विक्षिप्त मानसिकता का परिचायक है। यदि इस प्रकार के सम्बन्ध को स्वीकार कर भी लिया जाता है तो समाज को इसके घातक परिणाम भुगतने पड़ेगे। स्त्री पुरूष की रचना प्रकृति में सृष्टि निर्माण हेतु हुई है। दोनों के स्वस्थ सम्बन्ध के परिणाम स्वरूप नया जीवन अस्तित्व में आता है और सृष्टि में निरन्तरता बनी रहती है। समाज अक्षुण रहता है।

यदि वृहद् स्तर पर लोगो में समलैंगिक युगल बन जायेगे तो सृष्टि की गतिशीलता रूक जायेगी क्योंकि ऐसे जोड़े न तो स्वयं की संतान उत्पन्न कर पायेगे और न ही सरोगेसी के माध्यम से संतान प्राप्त कर सकेंगे। सरोगेसी अधिनियम और गोद/दत्तक अधिनियम में संतान प्राप्त करने का अधिकार न होने से इस प्रकार के जोड़े का विकास रूक जायेगा। जो सामाजिक सातत्यता को प्रभावित करेगा। अप्राकृतिक यौन सम्बन्धों में एच0आई0वी0 तथा यौन रोगो का खतरा बढ़ जाता है। केन्द्र सरकार द्वारा सुप्रीम कोर्ट को दी गई जानकारी के अनुसार भारत में 25 लाख समलैंगिको में लगभग 1.75 लाख एच0आई0वी0 संक्रमित है। अतः समलैंगिकता समाज व स्वास्थ्य हर प्रकार से विनाशकारी है। इसे हर हाल में रोका जाना चाहिये। सुप्रीेम कोर्ट का फैसला भारत को अंध युग में जाने से रोकने वाला तथा भारतीय जीवन मूल्यों को सुदृढ़ करने वाला है। मान्य ग्रन्थ मनुस्मृति में भी समलैंगिकता को दण्डनीय अपराध माना गया है।

डाॅ0 कामिनी वर्मा
एसोसिएट प्रोफेसर
का. न.राज.स्ना.महा. ज्ञानपुर , भदोही (उ. प्र. )

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