शुक्र अशुभ हैं तो काम वासना पर नियंत्रण नही, न भय न लज्‍जा

STARइस लम्‍बे चौडे ज्‍योतिष आलेख में गौरतलब ज्‍योतिषाचार्य ने बहुत ही सुन्‍दर लाइन लिख दी- उसका उल्‍लेख मैं सबसे पहले कर रहा हूं- हिमालयायूकेे न्‍यूज पोर्टल के लिए पण्डित “विशाल” दयानन्द शास्त्री जी का आलेख- 
शुक्र के अशुभ होने पर जातक “”कामवासना” पर नियंत्रण नही कर पाता है.. । इन्हे लोक लाज का भय नही होता है.. “कामातुराणां न भयं न लज्जा”” कामातुर व्यक्ति को न तो किसी का भय होता है.. ओर ना ही लज्जा । किसी व्यक्ति का चरित्र कितना उत्तम है ओर कितना खराब । इस बात को केवल मात्र शुक्र कि स्थिति देखकर जाना जा सकता है। शुक्र पीडित होने पर भोगी बनाते है.. तथा शुभ होने पर अनेक प्रकार कि विद्याओ का ज्ञाता तथा विद्वान बनाते है ।
#इसके अलावा अनेक बिन्‍दुओं पर ज्‍योतिषाचार्य जी ने प्रकाश डाला है# जब किस्मत साथ न दे तो करें यह उपाय-
#इस मंत्र से करें भगवान विष्णु को प्रसन्न इन चार महीनों में कोई भी शुभ कार्य नहीं
#बचना हो मधुमेह/ डायबिटीज/ शुगर या शक्कर की बीमारी से तो वास्तु शास्त्र के इन नियमों का रखें विशेष ध्यान-
#चातुर्मास का प्रारंभ 15 जुलाई 2016 से हो रहा है। इसी दिन से 16 नवंबर 2016 तक यानी चार महीने तक विवाह व मांगलिक कार्यों पर रोक #किसी भी कुंडली या जन्मांगचक्र में 12प्रकोष्ठ ज्योतिषियों द्वारा बनाये जाते है #रात में किस दिशा में सिर रखकर सोना चाहिए?? घर-परिवार के झगड़े खत्म करने के 8 आसान वास्तु उपाय-# जहाँ बृहस्पति देवताओ के गुरु थे.. वही शुक्राचार्य दैत्यो के गुरू – शुक्राचार्य तंत्र-मंत्र,धर्म शास्त्र, वेद , ज्योतिष तथा अनेक मायावी शक्तियो के स्वामी #यदि बचना हो मधुमेह/ डायबिटीज/ शुगर या शक्कर की बीमारी से तो वास्तु शास्त्र के इन नियमों का रखें विशेष ध्यान#-ज्योतिष शास्त्र के अनुसार गौमाता को संतुष्ट करने पर वे सेवक को सेवा के प्रतिफल में आशीर्वाद स्वरूप सभी मनोकामनाओं को पूर्ण करती हैं।# Execlusive; www.himalayauk.org (UK Leading Digital Newsportal) CS JOSHI EDITOR – Mob. 9412932030 mail; csjoshi_editor@yahoo.in

01.—-दक्षिण-पश्चिम कोने में कुआँ,जल बोरिंग या भूमिगत पानी का भण्डारण न हो, ऐसा स्थान मधुमेह बढाता है।
02.—–दक्षिण-पश्चिम कोण में हरियाली बगीचा या छोटे छोटे पोधे भी शुगर का कारण बनता है।
03.—–यदि घर/भवन का दक्षिण-पश्चिम कोना बढा हुआ है तब भी शुगर आक्रमण करेगी।
04.—–यदि दक्षिण-पश्चिम का कोना किसी घर में सबसे छोटा या सिकुडा हुआ है तो भी समझ लीजिये मधुमेह का द्वार खुल गया।
05.——दक्षिण-पश्चिम भाग घर या वन की ऊँचाई से सबसे नीचा है तो वहां के निवासियों में/ की मधुमेह बढेगी. इसलिए यह भाग सबसे ऊँचा रखे।
06.——-दक्षिण-पश्चिम भाग में सीवर का गड्ढा होना भी शुगर को निमंत्रण देना है।
07.——ब्रह्म स्थान अर्थात घर का मध्य भाग भारी हो तथा घर के मध्य में अधिक लोहे का या कबाड़ा का प्रयोग हो अथवा वहां लोहा/ कबाड़ा एकता हो या ब्रह्म भाग से जीना सीढीयां ऊपर कि और जा रही हो तो समझ ले कि मधुमेह का घर में आगमन होने जा रहा हें अर्थात दक्षिण-पश्चिम भाग दूषित/ खराब हो गया हैं।।
वास्तुविद पण्डित दयानन्द शास्त्री के अनुसार यदि आपने इनको सुधार लिया या ध्यान रखा तो काफी हद तक आप असाध्य रोगों से मुक्त हो जायेगे।
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आइये आज इस एक अनोखा ज्योतिष सम्बन्ध पर विचार मन्थन करें—-
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किसी भी जातक की कुंडली में क्या होती हैं पति के जीवन में पत्नी की भूमिका या पत्नी के जीवन में पति की भूमिका—-
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जन्मपत्रिका बरति कै देखहुँ मनहिं बिचारि |
दारुन बैरी मीचु के बीच बिराजित नारि ||
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किसी भी कुंडली या जन्मांगचक्र में 12प्रकोष्ठ ज्योतिषियों द्वारा बनाये जाते है प्रत्येक प्रकोष्ठ जातक के विशेष भाव दशा का सूचक होता है ||
किसी भी कुंडली या जन्मांग में लग्न अर्थात प्रथम स्थान जातक की दैहिक स्थिति का परिचायक है ||
इससे 6ठे स्थान में ग्रहस्थिति एवं ग्रहदृष्टि से जातक के शत्रु तथा 8वे स्थान में ग्रहस्थिति एवं गृहदृष्टि से जातक की मृत्यु की गणना की जाती है ||
इन दोनों भावों के मध्य 7वां स्थान पुरुष की कुण्डली में पत्नी का तथा नारी की कुण्डली में पति का होता है ||
भयानक वैरी और मृत्यु के बीच
पति या पत्नी का स्थान होता है ||
यानि पत्नी शत्रु और मृत्यु के मध्य बैठ मध्यस्थता करती है ||
इसका अर्थ यह हुआ की यदि पत्नी सुलक्षणा पतिव्रता है तो पति के शत्रु होते ही नही और अगर हुए भी तो वे अधिक कष्टदायक सिद्ध नही होते और साथ ही पति दीर्घायु होता है ||
उसकी मृत्यु कालमृत्यु ही होती है ||
इसी प्रकार यदि पत्नी दुष्टा कुलक्षणी और पतिवंचक हुई तो उसके पति के बड़े बड़े भयकारी कष्टदायक शत्रु हो जाते है तथा उसकी आयु छोटी हो जाती है और वह अल्पायु में अकाल मृत्यु को प्राप्त हो जाता है ||
आपकी क्या टिपण्णी/ विचार/ राय/ सच हैं, अवश्य अवगत करवाएं।।
प्रतीक्षा रहेगी।।।
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****रात में किस दिशा में सिर रखकर सोना चाहिए????
नींद से हमारा गहरा रिश्ता है। जब हम सोते हैं तब हमारा अपने आप से रिश्ता कायम होता है। लेकिन क्या आप जानते हैं कि किस दिशा विशेष में सिर रखकर सोने से अपार धन और आरोग्य की वृद्धि होती है।
दिशाओं में देवी-देवताओं और स्वामी ग्रहों के आधिपत्य से संबंधित बहुत चर्चाएं की गई हैं। दिशाओं के देव व स्वामी होने से पृथ्वी पर किसी भूखंड पर निर्माण कार्य प्रारंभ करते समय यह विचार अवश्य कर लेना होगा कि भूखंड के किस भाग में किस उद्देश्य से गृह निर्माण कराया जा रहा है। यदि उस दिशा के स्वामी या अधिकारी देवता के अनुकूल प्रयोजनार्थ निर्माण नहीं हुआ तो उस निर्माणकर्ता को उस दिशा से संबंधित देवता का कोपभाजन होना पड़ता है। इसलिए आठों दिशाओं व स्वामियों के अनुसार ही निर्माण कराना चाहिए।
****पूर्व दिशा:—-
सूर्योदय की दिशा ही पूर्व दिशा है। इसका स्वामी ग्रह सूर्य है। इस दिशा के अधिष्ठाता देव इन्द्र हैं। इस दिशा का एक नाम प्राची भी है। पूर्व दिशा से प्राणिमात्र का बहुत गहरा संबंध है। किन्तु सचेतन प्राणी मनुष्य का इस दिशा से कुछ अधिक ही लगाव है। व्यक्ति के शरीर में इस दिशा का स्थान मस्तिष्क के विकास से है। इस दिशा से पूर्ण तेजस्विता का प्रकाश नि:सृत हो रहा है। प्रात:कालीन सूर्य का प्रकाश संपूर्ण जगत को नवजीवन से आच्छादित कर रहा है। इस प्रकार आत्मिक साहस और शक्ति दिखलाने वाला प्रथम सोपान पूर्व दिशा ही है। जो हर एक को उदय मार्ग की सूचना दे रही है। इस दिशा में गृह निर्माणकर्ता को निर्माण करने अभ्यु दय और संवर्धन की शक्ति अनवरत मिलती रहती है।
****दक्षिण दिशा:—
दक्षिण दक्षता की दिशा है।इसका स्वामी ग्रह मंगल और अधिष्ठाता देव यम हैं। इस दिशा से मुख्यत: शत्रु निवारण, संरक्षण, शौर्य एवं उन्नति का विचार किया जाता है। इस दिशा के सुप्रभाव से संरक्षक प्रवृत्ति का उदय, उत्तम संतानोत्पत्ति की क्षमता तथा मार्यादित रहने की शिक्षा मिलती है। इस दिशा से प्राणी में जननशक्ति एवं संरक्षण शक्ति का समन्वय होता है। इसीलिए वैदिक साहित्य में इस दिशा का स्वामी पितर व कामदेव को भी कहा गया है।
यही कारण है कि वास्तुशास्त्र में प्रमुख कर्ता हेतु शयनकक्ष दक्षिण दिशा में होना अत्यंत श्रेष्ठ माना गया है। वास्तुशास्त्र के अनुरूप गृह निर्माण यदि दक्षिणवर्ती अशुभों से दूर रहकर किया जाए तो गृहस्वामी का व्यक्तित्व, कृतित्व एवं दाक्षिण्यजन्य व्यवहार सदा फलीभूत रहता है।
****पश्चिम दिशा:—
पश्चिम शांति की दिशा है। इस दिशा का स्वामी ग्रह शनि और अधिष्ठाता देव वरुण हैं। इसका दूसरा नाम प्रतीची है। सूर्य दिन भर प्रवृत्तिजन्य कार्य करने के पश्चात पश्चिम दिशा का ही आश्रय ग्रहण करता है। इस प्रकार योग्य पुरुषार्थ करने के पश्चात थोड़ा विश्राम भी आवश्यक है। अतएव प्रत्येक मनुष्य को इस दिशाजन्य प्रवृत्ति के अनुरूप ही वास्तु निर्माण मं निर्देशित कक्ष या स्थान की समुचित व्यवस्था करनी चाहिए। वास्तु के नियमानुसार मनुष्य को प्रवास की स्थिति में सिर पश्चिम करके सोना चाहिए।
****उत्तर दिशा:—-
यह उच्चता की दिशा है। इस दिशा का स्वामी ग्रह बुध और अधिष्ठाता देव कुबेर हैं। किन्तु ग्रंथान्तर में सोम (चंद्र) को भी देवता माना गया है। इस दिशा का एक नाम उदीची भी है। इस दिशा से सदा विजय की कामना पूर्ति होती है।मनुष्य को सदा उच्चतर विचार, आकांक्षा एवं सुवैज्ञानिक कार्य का संकल्प लेना चाहिए। यह संकल्प राष्ट्रीय भावना के परिप्रेक्ष्य में हो किंवा परिवार समाज को प्रेमरूप एकता सूत्र में बांधने का, ये सभी सफल होते हैं। ऐसी अद्भुत संकल्प शक्ति उत्तर दिशा की प्रभावजन्य शक्ति से ही संभव हो सकती है। अभ्यु दय का मार्ग सुगम और सरल हो सकता है।
स्वच्छता, सामर्थ्य एवं जय-विजय की प्रतीक यह दिशा देवताओं के वास करने की दिशा भी है, इसीलिए इसे सुमेरु कहा गया है। अतएव मनुष्य मात्र के लिए उत्तरमुखी भवन द्वार आदि का निर्माण कर निवास करने से सामरिक शक्ति, स्वच्छ विचार व व्यवहार का उदय और आत्म संतोषजन्य प्रभाव अनवरत मिलता रहता है।
शयन के समय उत्तर दिशा में सिर करके नहीं सोना चाहिए। वैज्ञानिक मतानुसार उत्तरी धु्रव चुम्बकीय क्षेत्र का सबसे शक्तिशाली धु्रव है। उत्तरी धु्रव के तीव्र चुम्बकत्व के कारण मस्तिष्क की शक्ति (बौद्धिक शक्ति) क्षीण हो जाती है। आइए जानते हैं कि रात में किस दिशा में सिर रखकर सोना चाहिए—
****सदैव पूर्व या दक्षिण की ओर सिर करके सोना चाहिए।
****पूर्व की ओर सिर करके सोने से विद्या की प्राप्ति होती है।
****दक्षिण की ओर सिर करके सोने से धन तथा आयु की वृद्धि होती है।
****पश्चिम की ओर सिर करके सोने से प्रबल चिंता होती है।
****उत्तर की ओर सिर करके सोने से हानि तथा मृत्यु होती है अर्थात आयु क्षीण होती है।
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वास्तु टिप्स :—
जानिए घर-परिवार के झगड़े खत्म करने के 8 आसान वास्तु उपाय—-
घर में कई अलग-अलग स्वभाव वाले लोग रहते हैं। ऐसे में कई बार एक-दूसरे से आदतें और विचार मेल नहीं खाते हैं। जिससे अक्सर घर के लोगों में मन-मुटाव और झगड़े होने लगते हैं।
इन झगड़ों की वजह से घर में हमेशा ही अशांति और क्लेश का माहौल बना रहता है। वास्तु के कुछ छोटे-छोटे उपायों को अपना कर इन झगड़ों से छुटकारा पाया जा सकता है—-
1. यदि घर में अक्सर तनाव की स्थिति बनी रहती है तो सफेद चंदन की बनी कोई भी मूर्ति ऐसे स्थान पर रखें, जहां से सभी सदस्यों की नजर उस पर पड़े। इससे पारिवारिक तनाव खत्म होगा और सदस्यों में आपसी विश्वास बढ़ेगा।
2. यदि घर के पुरुष सदस्यों के बीच तनाव और विवाद की स्थिति रहती हो तो ऐसे घर में कदम्ब के पेड़ की डाली रखनी चाहिए। इससे शांति का वातावरण बनता है|
3. घर के अन्य स्थानों की बजाए रसोई घर में बैठकर खाना खाने से घर में राहु का प्रभाव कम होता है और सुख-शांति बनी रहती है।
4. यदि परिवार की महिलाओं में अक्सर अशांति, तनाव और मनमुटाव रहता है तो ऐसे परिवार में सभी महिलाओं को एक साथ लाल रंग के कपड़े नहीं पहनने चाहिए।
5. यदि किसी महिला की वजह से घर में अशांति रहती हो तो शुक्ल पक्ष के सोमवार को चन्द्रमणि की चांदी की अंगूठी बनवाकर उस महिला को दाहिने हाथ की अनामिका उंगली (छोटी उंगली के पास वाली उंगली) में पहनानी चाहिए।
6. जिस घर में बिना कारण के तनाव और अशांति का वातावरण बनता हो, उस घर के लोगों को गुरुवार को बाल और दाढ़ी-मूंछ नहीं कटवाना चाहिए।
7. हर महीने में घर के सदस्यों की संख्या और घर में आए सभी अतिथियों की संख्या के बराबर मीठी रोटियां बनाकर जानवरों को खिलाना चाहिए। इससे घर में बीमारी, झगड़े और फिजूल खर्च से छुटकारा मिलेगा।
8. पूर्णिमा को पूरे घर में गंगाजल छिड़कने से शांति और प्रेम बना रहता है।
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ज्योतिष के क्षेत्र से जुडे या ज्योतिष सीखने वाले व्यक्तियो से शुक्र के कारकत्व के विषय मे यदि प्रश्न किया जाये तो उनमे से अधिकांश का जवाब केवल यही होगा– भोग,सुन्दरता,वाहन,धन,भवन,नृत्य,अभिनय,गायन,प्रेम,कामवासना आदि ।
आधुनिक ज्योतिष मत में शुक्र को केवल एक भोग प्रधान ग्रह माना जाने लगा है..
यह सत्य भी है.. कि समस्त भोग विलास के प्रसाधनो का कारक शुक्र ही है..।
किन्तु शायद आधुनिक ज्योतिषी या ज्योतिष ज्ञान के पिपासु यह भूल रहे है.. कि जहाँ बृहस्पति देवताओ के गुरु थे.. वही शुक्राचार्य दैत्यो के गुरू थे ।
शुक्राचार्य को “”सर्व शास्त्र प्रवक्तारं”” कहा गया है ।
शुक्राचार्य तंत्र-मंत्र,धर्म शास्त्र, वेद , ज्योतिष तथा अनेक मायावी शक्तियो के स्वामी थे ।
शुक्राचार्य विद्या ओर ज्ञान में देवगुरू बृहस्पति से भी बढकर थे..
शुक्राचार्य “”मृत संजीवनी विद्या”” के ज्ञाता थे । वे इस विद्या से मरे हुये दैत्यो को जीवित कर देते थे ।
इसी मृत संजीवनी विद्या को सीखने के लिये देवगुरू बृहस्पति ने अपने पुत्र कच्छ को शुक्राचार्य के पास भेजा था ।
शुक्राचार्य बहुत बुद्धिमान थे.. राजा बलि को जब भगवान विष्णु वामन का वेष बनाकर छलने गये थे.. तब शुक्राचार्य वामन वेष मे आये भगवान को पहचान लिया था.. तथा राजा बलि को आगाह कर दिया था. कि ये साधारण बालक नही है.. यह साक्षात “”विष्णु” है ।
अतः शुक्र प्रधान व्यक्ति कभी किसी से धोखा नही खाता है ।
शुक्र ज्योतिष तंत्र-मंत्र,साधना, परा शक्ति आदि के क्षेत्र में भी अपार सफलता देते है ।
बली ओर शुभ होने पर शुक्र व्यक्ति को विद्वत्ता देते है ।
“शुक्र” शरीर में “वीर्य” धातु के कारक है.. शुक्र ही “काम” के कारक है ।
शुक्र में जन्म देने कि शक्ति है । शुक्र से ही यह संसार चल रहा है ।
जिस व्यक्ति के जन्मांग में शुक्र बलवान होता है वह व्यक्ति सुंदर आकर्षक “चेहरे”का स्वामी होता है.. एसे व्यक्ति मे आकर्षण शक्ति बहुत अधिक होती है.. लोग इन्हे देखते ही आकर्षित हो जाते है..।
अभिनय, कला जगत में बलवान शुक्र के बिना सफलता कि कल्पना कि ही नही जा सकती ।
जन्मांग मे शुक्र के अशुभ होने पर जातक या जातिका का चरित्र बहुत कम आयु मे ही भ्रष्ट हो जाता है..। अगर इन पर कठोर नियंत्रण ना हो तो ये गलत मार्ग पर चल पडते है । शुक्र के अशुभ होने पर जातक “”कामवासना” पर नियंत्रण नही कर पाता है.. । इन्हे लोक लाज का भय नही होता है..
कहा भी गया है..
“”कामातुराणां न भयं न लज्जा””
कामातुर व्यक्ति को न तो किसी का भय होता है.. ओर ना ही लज्जा ।
किसी व्यक्ति का चरित्र कितना उत्तम है ओर कितना खराब । इस बात को केवल मात्र शुक्र कि स्थिति देखकर जाना जा सकता है।
शुक्र पीडित होने पर भोगी बनाते है.. तथा शुभ होने पर अनेक प्रकार कि विद्याओ का ज्ञाता तथा विद्वान बनाते है ।
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इस छोटे से उपाय द्वारा बदकिस्मत लोगों की भी किस्मत साथ देने लगेगी —-
भरसक कोशिशों के बाद भी आप किसी काम में बार-बार असफल हो रहे हैं या मेहनत के अनुसार सफलता नहीं मिल पा रही है। ऐसे में किस्मत या भाग्य का साथ न होने की बात कही जाती है। ज्यादा धन या पैसा कमाने के लिए किस्मत का साथ होना बहुत जरूरी है अन्यथा इस मनोकामना की पूर्ति होना असंभव सा ही है। पंडित दयानन्द शास्त्री के अनुसार ज्योतिष में कई ऐसे उपाय बताए गए हैं जिन्हें अपनाने से दुर्भाग्य पीछा छोड़ देता है और भाग्य साथ देने लगता है।
यदि आपको भी पूरी मेहनत के बाद उचित सफलता प्राप्त नहीं हो रही है तो प्रतिदिन सूखे आटे में थोड़ी सी हल्दी मिलाकर गाय को खिलाएं। ऐसा नियमित रूप से प्रतिदिन करें।
गाय को सभी शास्त्रों के अनुसार पूजनीय एवं पवित्र माना गया है। गाय में ही सभी देवी-देवताओं का वास है और इसकी पूजा करने से भक्त को भाग्य का साथ मिलता है।
ज्योतिष शास्त्र के अनुसार गौमाता को संतुष्ट करने पर वे सेवक को सेवा के प्रतिफल में आशीर्वाद स्वरूप सभी मनोकामनाओं को पूर्ण करती हैं। गाय को सूखे आटे में हल्दी मिलाकर खिलाने से वे अतिप्रसन्न होती हैं।।
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जब किस्मत साथ न दे तो करें यह उपाय—-
कई बार इंसान चाह कर भी कुछ नहीं कर पाता और कई बार उसे बैठे बैठे मिल जाता है ये किस्मत का खेल है, कई बार जब किस्मत साथ न दे तो लोग गम में डूब जाते है किसी को ईश्वर तो किसी को ज्योतिषी याद आते है, कभी कभी जब किसी कि किस्मत साथ दे रही होती है तो हम अक्सर उसे अपनी योग्यता मान लेते हैं कई लोग समय का लाभ उठा लेते है तो कई ऊपर से नीचे आ जाते है।
मेरा कहने का अर्थ है इंसान का कभी न कभी वक्त के साथ किस्मत भी साथ देती है जब उसके पुण्य कर्म अच्छे होते है इसलिए हमेशा अच्छे कर्म करो, अपने धर्म का पालन करो
किस्मत के बारे मे तो मे हर मनुष्य थोड़ी बहुत जानकारी रखता है, कहते हैं जब हम कड़े परिश्रम करने के बाद सफलता प्राप्त करते है तो वह हमारे कर्म है लेकिन जब हम बिना मेहनत के बावजूद सफलता प्राप्त करते हैं उसे किस्मत कहते है।
****करे नई उर्जा का संचार—-
यदि आप अपने जीवन में कुछ परिवर्तन करना चाहते है तो ऐसा नियमित रूप से करेगे तो इससे आपके सितारे चमक उठेगे। ब्रह्म बेला में उठ कर इश्वर का नाम, ध्यान, योग और पूजा करने से अकस्मात् लाभ होता है।
1. सूर्योदय से पूर्व ब्रह्मा बेला में उठे, और अपने दोनों हांथो की हंथेली को रगरे और हंथेली को देख कर अपने मुंह पर फेरे, क्योंकि :- शास्त्रों में कहा गया है की
कराग्रे वसते लक्ष्मी, करमध्ये सरस्वती । करमूले स्थिता गौरी, मंगलं करदर्शनम् ॥
हमारे हाथ के अग्र भाग में लक्ष्मी, तथा हाथ के मूल मे सरस्वती का वास है अर्थात भगवान ने हमारे हाथों में इतनी ताकत दे रखी है, ज़िसके बल पर हम धन अर्थात लक्ष्मी अर्जित करतें हैं। जिसके बल पर हम विद्या सरस्वती प्राप्त करतें हैं।इतना ही नहीं सरस्वती तथा लक्ष्मी जो हम अर्जित करते हैं, उनका समन्वय स्थापित करने के लिए प्रभू स्वयं हाथ के मध्य में बैठे हैं। ऐसे में क्यों न सुबह अपनें हाथ के दर्शन कर प्रभू की दी हुई ताकत का लाभ उठायें।।
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इन उपायों/ प्रयोगों द्वारा चमकेगी आपकी भी किस्मत—–

तंत्र शास्त्र व ज्योतिष के अंतर्गत ऐसे कई छोटे-छोटे उपाय हैं, जिन्हें करने से थोड़े ही समय में व्यक्ति की किस्मत बदल सकती है। मगर बहुत कम लोग इन छोटे-छोटे उपायों के बारे में जानते हैं। जो लोग जानते हैं वे ये उपाय करते नहीं और अपनी किस्मत को ही दोष देते रहते हैं। जानिए कुछ अचूक उपाय या प्रयोग जिन्हें सच्चे मन से करने से आपकी किस्मत चमक सकती है।

ये उपाय इस प्रकार हैं—
1- रोज सुबह जब आप उठें तो सबसे पहले दोनों हाथों की हथेलियों को कुछ क्षण देखकर चेहरे पर तीन चार बार फेरें। धर्म ग्रंथों के अनुसार हथेली के अग्र भाग में मां लक्ष्मी, मध्य भाग में मां सरस्वती व मूल भाग (मणि बंध) में भगवान विष्णु का स्थान होता है। इसलिए रोज सुबह उठते ही अपनी हथेली देखने से भाग्य चमक उठता है।
2- भोजन के लिए बनाई जा रही रोटी में से पहली रोटी गाय को दें। धर्म ग्रंथों के अनुसार गाय में सभी देवताओं का निवास माना गया है। अगर प्रतिदिन गाय को रोटी दी जाए तो सभी देवता प्रसन्न होते हैं और सभी मनोकामना पूरी करते हैं।
3- अगर आप चाहते हैं कि आपकी किस्मत चमक जाए तो प्रतिदिन चीटियों को शक्कर मिला हुआ आटा खिलाएं। ऐसा करने से आपके पाप कर्मों का क्षय होगा और पुण्य कर्म उदय होंगे। यही पुण्य कर्म आपकी मनोकामना पूर्ति में सहायक होंगे।
4- घर में स्थापित देवी-देवताओं को रोज फूलों से श्रृंगारित करना चाहिए। इस बात का ध्यान रखें कि फूल ताजे ही हो। सच्चे मन से देवी-देवताओं को फूल आदि अर्पित करने से वे प्रसन्न होते हैं व साधक का भाग्य चमका देते हैं।
5- घर को साफ-स्वच्छ रखें। प्रतिदिन सुबह झाड़ू-पोछा करें। शाम के समय घर में झाड़ू-पोछा न करें। ऐसा करने से मां लक्ष्मी रूठ जाती हैं और साधक को आर्थिक हानि का सामना करना पड़ सकता है।
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देव शयनी एकादशी 2016

15 जुलाई 2016 (शुक्रवार) को मनाई जाएगी देवशयनी एकादशी—

आषाढ़ मास के शुक्ल पक्ष की एकादशी को ही ‘देवशयनी’ एकादशी कहा जाता है। इस वर्ष यह 15 जुलाई 2016 (शुक्रवार) को पड़ रही है। इस दिन से भगवान विष्णु चार मास के लिए बलि के द्वार पर पाताल लोक में निवास करते हैं और कार्तिक शुक्ल एकादशी को लौटते हैं। इसी दिन से चौमासे का आरम्भ माना जाता है।देवशयनी एकादशी के दिन से भगवान विष्णु का शयनकाल प्रारम्भ हो जाता है इसीलिए इसे देवशयनी एकादशी कहते हैं। देवशयनी एकादशी के चार माह के बाद भगवान् विष्णु प्रबोधिनी एकादशी के दिन जागतें हैं। इस वर्ष 15 जुलाई को देवशयनी एकादशी के बाद विवाह व मांगलिक कार्यों में विराम लग जायेगा..

ज्योतिषाचार्य पंडित दयानन्द शास्त्री के अनुसार देवशयनी एकादशी प्रसिद्ध जगन्नाथ रथयात्रा के तुरन्त बाद आती है और अंग्रेजी कैलेण्डर के अनुसार देवशयनी एकादशी का व्रत जून अथवा जुलाई के महीने में आता है। चतुर्मास जो कि हिन्दू कैलेण्डर के अनुसार चार महीने का आत्मसंयम काल है, देवशयनी एकादशी से प्रारम्भ हो जाता है।15 जुलाई 2016 (शुक्रवार) को मनाई जाने वाली देवशयनी एकादशी को पद्मा एकादशी, आषाढ़ी एकादशी और हरिशयनी एकादशी के नाम से भी जाना जाता है।

एकादशी के व्रत को समाप्त करने को पारण कहते हैं। एकादशी व्रत के अगले दिन सूर्योदय के बाद पारण किया जाता है। एकादशी व्रत का पारण द्वादशी तिथि समाप्त होने से पहले करना अति आवश्यक है। यदि द्वादशी तिथि सूर्योदय से पहले समाप्त हो गयी हो तो एकादशी व्रत का पारण सूर्योदय के बाद ही होता है। द्वादशी तिथि के भीतर पारण न करना पाप करने के समान होता है।

एकादशी व्रत का पारण हरि वासर के दौरान भी नहीं करना चाहिए। जो श्रद्धालु व्रत कर रहे हैं उन्हें व्रत तोड़ने से पहले हरि वासर समाप्त होने की प्रतिक्षा करनी चाहिए। हरि वासर द्वादशी तिथि की पहली एक चौथाई अवधि है। व्रत तोड़ने के लिए सबसे उपयुक्त समय प्रातःकाल होता है। व्रत करने वाले श्रद्धालुओं को मध्यान के दौरान व्रत तोड़ने से बचना चाहिए। कुछ कारणों की वजह से अगर कोई प्रातःकाल पारण करने में सक्षम नहीं है तो उसे मध्यान के बाद पारण करना चाहिए।

ज्योतिषाचार्य पंडित दयानन्द शास्त्री के अनुसार कभी कभी एकादशी व्रत लगातार दो दिनों के लिए हो जाता है। जब एकादशी व्रत दो दिन होता है तब स्मार्त-परिवारजनों को पहले दिन एकादशी व्रत करना चाहिए। दुसरे दिन वाली एकादशी को दूजी एकादशी कहते हैं। सन्यासियों, विधवाओं और मोक्ष प्राप्ति के इच्छुक श्रद्धालुओं को दूजी एकादशी के दिन व्रत करना चाहिए। जब-जब एकादशी व्रत दो दिन होता है तब-तब दूजी एकादशी और वैष्णव एकादशी एक ही दिन होती हैं।. भगवान विष्णु का प्यार और स्नेह के इच्छुक परम भक्तों को दोनों दिन एकादशी व्रत करने की सलाह दी जाती है।

इस दिन से भगवान विष्णु चार मास के लिए क्षीरसागर में शयन करते हैं। इसी कारण इस एकादशी को ‘हरिशयनी एकादशी’ तथा कार्तिक शुक्ल एकादशी को ‘प्रबोधिनी एकादशी’ कहते हैं। इसे पद्मनाभा एकादशी भी कहा जाता है। इन चार महीनों में भगवान विष्णु के क्षीरसागर में शयन करने के कारण विवाह आदि कोई शुभ कार्य नहीं किया जाता।

ज्योतिषाचार्य पंडित दयानन्द शास्त्री के अनुसार देवशयनी एकादशी से चार माह के लिए विवाह संस्कार बंद हो जाएंगे। आज से देव सो जाएंगे। आगामी देवोत्थान एकादशी के दिन विवाह संस्कार पुन: प्रारंभ हो जाएंगे। देवशयनी एकादशी के बाद विवाह, नव निर्माण, मुंडन, जनेऊ संस्कार जैसे शुभ मांगलिक कार्य नहीं होंगे।

ये कार्य हैं वर्जित —-

उक्त 4 माह में विवाह संस्कार, जात कर्म संस्कार, गृह प्रवेश आदि सभी मंगल कार्य निषेध माने गए हैं। इस व्रत में दूध, शकर, दही, तेल, बैंगन, पत्तेदार सब्जियां, नमकीन या मसालेदार भोजन, मिठाई, सुपारी, मांस और मदिरा का सेवन नहीं किया जाता। श्रावण में पत्तेदार सब्जियां यथा पालक, साग इत्यादि भाद्रपद में दही, आश्विन में दूध, कार्तिक में प्याज, लहसुन और उड़द की दाल आदि का त्याग कर दिया जाता है।
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इस मंत्र से करें भगवान विष्णु को प्रसन्न:—-

‘सुप्ते त्वयि जगन्नाथ जगत सुप्तं भवेदिदम।
विबुद्धे त्वयि बुध्येत जगत सर्वं चराचरम।’

भावार्थ: हे जगन्नाथ! आपके शयन करने पर यह जगत सुप्त हो जाता है और आपके जाग जाने पर सम्पूर्ण चराचर जगत प्रबुद्ध हो जाता है। पीताम्बर, शंख, चक्र और गदा धारी भगवान् विष्णु के शयन करने और जाग्रत होने का प्रभाव प्रदर्शित करने वाला यह मंत्र शुभ फलदायक है जिसे भगवान विष्णु की उपासना के समय उच्चारित किया जाता है।

धार्मिक दृष्टि से यह चार मास भगवान विष्णु का निद्रा काल माना जाता है। इन दिनों में तपस्वी भ्रमण नहीं करते, वे एक ही स्थान पर रहकर तपस्या (चातुर्मास) करते हैं। इन दिनों केवल बृज की यात्रा की जा सकती है, क्योंकि इन चार महीनों में भू-मण्डल के समस्त तीर्थ ब्रज में आकर निवास करते हैं। ब्रह्म वैवर्त पुराण में इस एकादशी का विशेष माहात्म्य लिखा है। इस व्रत को करने से प्राणी की समस्त मनोकामनाएं पूर्ण होती हैं, सभी पाप नष्ट होते हैं तथा भगवान हृषीकेश प्रसन्न होते हैं।इस व्रत को करने से समस्त रखते वाले व्यक्ति को अपने चित, इंद्रियों, आहार और व्यवहार पर संयम रखना होता है. एकादशी व्रत का उपवास व्यक्ति को अर्थ-काम से ऊपर उठकर मोक्ष और धर्म के मार्ग पर चलने की प्रेरणा देता है.
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देव शयनी एकादशी व्रत की विधि:—

ज्योतिषाचार्य पंडित दयानन्द शास्त्री के अनुसार इस व्रत की तैयारी दशमी तिथि से ही करनी चाहिए। दशमी को रात्रि में हल्का व सुपाच्य भोजन करना चाहिए। यह व्रत दशमी से लेकर द्वादशी तक चलता है। इस व्रत में व्यक्ति को भूमि पर शयन करना चाहिए और बिना नमक का भोजन करना चाहिए। गेंहूं, जौं व मूंग का दान करने से बचना चाहिए।
देवशयनी एकादशी को प्रात:काल उठें। इसके बाद घर की साफ-सफाई तथा नित्य कर्म से निवृत्त हो जाएँ। स्नान कर पवित्र जल का घर में छिडक़ाव करें। घर के पूजन स्थल अथवा किसी भी पवित्र स्थल पर प्रभु श्री हरि विष्णु की सोने, चाँदी, तांबे अथवा पीतल की मूर्ति की स्थापना करें। तत्पश्चात उसका षोड्शोपचार सहित पूजन करें। इसके बाद भगवान विष्णु को पीतांबर आदि से विभूषित करें। तत्पश्चात व्रत कथा सुननी चाहिए। इसके बाद आरती कर प्रसाद वितरण करें। अंत में सफेद चादर से ढँके गद्दे-तकिए वाले पलंग पर श्री विष्णु को शयन कराना चाहिए। व्यक्ति को इन चार महीनों के लिए अपनी रुचि अथवा अभीष्ट के अनुसार नित्य व्यवहार के पदार्थों का त्याग और ग्रहण करें।

क्या ग्रहण करें?
देह शुद्धि या सुंदरता के लिए परिमित प्रमाण के पंचगव्य का। वंश वृद्धि के लिए नियमित दूध का। सर्वपापक्षयपूर्वक सकल पुण्य फल प्राप्त होने के लिए एकमुक्त, नक्तव्रत, अयाचित भोजन या सर्वथा उपवास करने का व्रत ग्रहण करें। भगवान् विष्णु की पूजा में तुलसी, ऋतु फल एवं तिल का प्रयोग करें। व्रत के दिन अन्न वर्जित है. निराहार रहें और शाम में पूजा के बाद चाहें तो फल ग्रहण कर सकते है. यदि आप किसी कारण व्रत नहीं रखते हैं तो भी एकादशी के दिन चावल का प्रयोग भोजन में नहीं करना चाहिए।

एकादशी के दिन रात्रि जागरण का बड़ा महत्व है। संभव हो तो रात में जगकर भगवान का भजन कीर्तन करें। एकादशी के दिन विष्णुसहस्रनाम का पाठ करने से भगवान विष्णु की विशेष कृपा प्राप्त होती है। अगले दिन यानी द्वादशी तिथि को ब्राह्मण भोजन करवाने के बाद स्वयं भोजन करें।

सागार:— इस दिन दाख का सागार लेना चाहिए.

देव शयनी एकादशी का फल:— इस मास की एकादशी का व्रत सब मनुष्यों को करना चाहिए। यह व्रत इस लोक में भोग और परलोक में मुक्ति को देने वाला है।

किसका त्याग करें ?

मधुर स्वर के लिए गुड़ का। दीर्घायु अथवा पुत्र-पौत्रादि की प्राप्ति के लिए तेल का। शत्रुनाशादि के लिए कड़वे तेल का। सौभाग्य के लिए मीठे तेल का। स्वर्ग प्राप्ति के लिए पुष्पादि भोगों का। प्रभु शयन के दिनों में सभी प्रकार के मांगलिक कार्य जहाँ तक हो सके न करें। पलंग पर सोना, भार्या का संग करना, झूठ बोलना, मांस, शहद और दूसरे का दिया दही-भात आदि का भोजन करना, मूली, पटोल एवं बैंगन आदि का भी त्याग कर देना चाहिए।

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देवशयनी एकादशी पारण —

पारण समय: 16 जुलाई 2016 , 13.47 से 16:33

एकादशी तिथि प्रारंभ- 15 जुलाई 2016, 00:15

एकादशी तिथि समाप्त- 16 जुलाई 2016, 02:08
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देव शयनी एकादशी की कथा—

एक बार देवऋषि नारदजी ने ब्रह्माजी से इस एकादशी के विषय में जानने की उत्सुकता प्रकट की, तब ब्रह्माजी ने उन्हें बताया- सतयुग में मांधाता नामक एक चक्रवर्ती सम्राट राज्य करते थे। उनके राज्य में प्रजा बहुत सुखी थी। किंतु भविष्य में क्या हो जाए, यह कोई नहीं जानता। अतः वे भी इस बात से अनभिज्ञ थे कि उनके राज्य में शीघ्र ही भयंकर अकाल पड़ने वाला है।

उनके राज्य में पूरे तीन वर्ष तक वर्षा न होने के कारण भयंकर अकाल पड़ा। इस दुर्भिक्ष (अकाल) से चारों ओर त्राहि-त्राहि मच गई। धर्म पक्ष के यज्ञ, हवन, पिंडदान, कथा-व्रत आदि में कमी हो गई। जब मुसीबत पड़ी हो तो धार्मिक कार्यों में प्राणी की रुचि कहाँ रह जाती है। प्रजा ने राजा के पास जाकर अपनी वेदना की दुहाई दी।

राजा तो इस स्थिति को लेकर पहले से ही दुःखी थे। वे सोचने लगे कि आखिर मैंने ऐसा कौन- सा पाप-कर्म किया है, जिसका दंड मुझे इस रूप में मिल रहा है? फिर इस कष्ट से मुक्ति पाने का कोई साधन करने के उद्देश्य से राजा सेना को लेकर जंगल की ओर चल दिए। वहाँ विचरण करते-करते एक दिन वे ब्रह्माजी के पुत्र अंगिरा ऋषि के आश्रम में पहुँचे और उन्हें साष्टांग प्रणाम किया। ऋषिवर ने आशीर्वचनोपरांत कुशल क्षेम पूछा। फिर जंगल में विचरने व अपने आश्रम में आने का प्रयोजन जानना चाहा।

तब राजा ने हाथ जोड़कर कहा- ‘महात्मन्‌! सभी प्रकार से धर्म का पालन करता हुआ भी मैं अपने राज्य में दुर्भिक्ष का दृश्य देख रहा हूँ। आखिर किस कारण से ऐसा हो रहा है, कृपया इसका समाधान करें।’ यह सुनकर महर्षि अंगिरा ने कहा- ‘हे राजन! सब युगों से उत्तम यह सतयुग है। इसमें छोटे से पाप का भी बड़ा भयंकर दंड मिलता है।

इसमें धर्म अपने चारों चरणों में व्याप्त रहता है। ब्राह्मण के अतिरिक्त किसी अन्य जाति को तप करने का अधिकार नहीं है जबकि आपके राज्य में एक शूद्र तपस्या कर रहा है। यही कारण है कि आपके राज्य में वर्षा नहीं हो रही है। जब तक वह काल को प्राप्त नहीं होगा, तब तक यह दुर्भिक्ष शांत नहीं होगा। दुर्भिक्ष की शांति उसे मारने से ही संभव है।’

किंतु राजा का हृदय एक नरपराधशूद्र तपस्वी का शमन करने को तैयार नहीं हुआ। उन्होंने कहा- ‘हे देव मैं उस निरपराध को मार दूँ, यह बात मेरा मन स्वीकार नहीं कर रहा है। कृपा करके आप कोई और उपाय बताएँ।’ महर्षि अंगिरा ने बताया- ‘आषाढ़ माह के शुक्लपक्ष की एकादशी का व्रत करें। इस व्रत के प्रभाव से अवश्य ही वर्षा होगी।’

राजा अपने राज्य की राजधानी लौट आए और चारों वर्णों सहित पद्मा एकादशी का विधिपूर्वक व्रत किया। व्रत के प्रभाव से उनके राज्य में मूसलधार वर्षा हुई और पूरा राज्य धन-धान्य से परिपूर्ण हो गया।
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जानिए देवशयनी एकादशी का महत्व—-

ज्योतिषाचार्य पंडित दयानन्द शास्त्री के अनुसार पुराणों में कथा है कि शंखचूर नामक असुर से भगवान विष्णु का लंबे समय तक युद्ध चला। आषाढ़ शुक्ल एकादशी के दिन भगवान ने शंखचूर का वध कर दिया और क्षीर सागर में सोने चले गये। शंखचूर से मुक्ति दिलाने के कारण देवताओं ने भगवान विष्णु की विशेष पूजा अर्चना की। एक अन्य कथा के अनुसार वामन बनकर भगवान विष्णु ने राजा बलि से तीन पग में तीनों लोकों पर अधिकार कर लिया। राजा बलि को पाताल वापस जाना पड़ा। लेकिन बलि की भक्ति और उदारता से भगवान वामन मुग्ध थे। भगवान ने बलि से जब वरदान मांगने के लिए कहा तो बलि ने भगवान से कहा कि आप सदैव पाताल में निवास करें। भक्त की इच्छा पूरी करने के लिए भगवान पाताल में रहने लगे। इससे लक्ष्मी मां दुःखी हो गयी। भगवान विष्णु को वापस बैकुंठ लाने के लिए लक्ष्मी मां गरीब स्त्री का वेष बनाकर पाताल लोक पहुंची। लक्ष्मी मां के दीन हीन अवस्था को देखकर बलि ने उन्हें अपनी बहन बना लिया। लक्ष्मी मां ने बलि से कहा कि अगर तुम अपनी बहन को खुश देखना चाहते हो तो मेरे पति भगवान विष्णु को मेरे साथ बैकुंठ विदा कर दो। बलि ने भगवान विष्णु को बैकुंठ विदा कर दिया लेकिन वचन दिया कि आषाढ़ शुक्ल एकादशी से कार्तिक शुक्ल एकादशी के दिन तक वह हर साल पाताल में निवास करेंगे। इसलिए इन चार महीनों में कोई भी शुभ कार्य नहीं किया जाता है।
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प्रिय पाठकों/मित्रों,
ज्योतिषाचार्य पंडित दयानन्द शास्त्री के अनुसार इस बार चातुर्मास का प्रारंभ 15 जुलाई 2016 से हो रहा है। इसी दिन से 16 नवंबर 2016 तक यानी चार महीने तक विवाह व मांगलिक कार्यों पर रोक लग जाएगी। 4 महीने तक मांगलिक कार्य नहीं होंगे। चातुर्मास आषाढ़ शुक्ल एकादशी से प्रारंभ होकर कार्तिक शुक्ल एकादशी तक चलता है। चातुर्मास में मांगलिक कार्य नहीं किए जाते।

ज्योतिषाचार्य पंडित दयानन्द शास्त्री के अनुसार हिंदू धर्म में चातुर्मास देवशयनी एकादशी से देवउठनी एकादशी तक के समय का विशेष महत्व है। चातुर्मास में मांगलिक कार्य नहीं किए जाते और धार्मिक कार्यों पर अधिक ध्यान दिया जाता है। चातुर्मास के अंतर्गत सावन, भादौ, अश्विन व कार्तिक मास आता है।

इस बार चातुर्मास का प्रारंभ 15 जुलाई 2016 से हो रहा है। ऐसा माना जाता है कि इस दौरान भगवान विष्णु विश्राम करते हैं। हमारे धर्म ग्रंथों में चातुर्मास के दौरान कई नियमों का पालन करना जरूरी बताया गया है और उन नियमों का पालन करने से मिलने वाले फलों का भी वर्णन किया गया है।

चतुर्मास एक ऐसा विशिष्ट अवसर है, जिसमें हम स्वाद ज्ञानेन्द्रि व कामेन्द्रि पर नियंत्रण रखकर अध्यात्मिक उर्जा का भरपूर लाभ लेकर तन-मन से स्वस्थ्य रह सकते है। यह काल देवशयनी एकादशी आषाढ़ शुक्ल एकादशी से शुरू होकर देवोत्थानी एकादशी कार्तिक शुक्ल एकादशी पर समाप्त होता है।
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चातुर्मास के चार नियम—

1- आयुर्वेद में चातुर्मास के चार महीनों के दौरान पत्तेदार शाक-भाजी खाना वर्जित बताया गया है। चूंकि इन महीनों में पाचन तंत्र कमजोर हो जाता है तो ऐसे में एक समय का व्रत रखकर शरीर को निरोगी रखने का प्रयास किया जाना चाहिए।

2- इन चार महीनों में अपनी रुचि और पसंद की चीजों को छोड़ने का संकल्प लेना चाहिए। यह संकल्प इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि व्यक्ति अपनी इच्छाओं को नियंत्रण में रखना सीखता है।

3- इस अवधि में व्रती नरम और आरामदायक बिस्तर का भी त्याग कर देते हैं क्योंकि शरीर को सहजता के जितना करीब रखा जाए व्यक्ति उतना ही मोह-माया से दूर रहता है।

4- ज्योतिषाचार्य पंडित दयानन्द शास्त्री के अनुसार इन चार महीनों के दौरान जलाशय में स्नान से पुण्य की प्राप्ति होती है। चूंकि भगवान विष्णु चार महीनों के लिए पाताल निवास करते हैं इसलिए उनकी कृपा प्राप्ति के लिए नदी या सरोवर में स्नान की महत्ता है।

–पण्डित “विशाल” दयानन्द शास्त्री।।
मोब–09669290067….
एवम् वाट्सअप—09039390067…।।

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