खेल खत्‍म; मायावती और कांग्रेस नेता राज्यसभा और वि0परिषद भी नही जा सकते

मायावती- कांग्रेस के पास कोई ऑप्शन नहीं बचा  #राज्यसभा और वि0परिषद भी नही जा सकते 

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बसपा अपनी सीटों के बल पर मायावती को राज्यसभा सांसद भी नहीं बना सकेगी। 2018 में राज्यसभा और यूपी विधानपरिषद में अपना सदस्य भेजने के लिए कांग्रेस के पास कोई ऑप्शन नहीं बचा है। कांग्रेस के खाते में 2017 में सिर्फ 7 सीटें आईं। इस बार कांग्रेस के प्रमोद तिवारी का टैन्योर खत्म हो रहा है। लेकिन दोबारा जाने के लिए कांग्रेस के पास जरूरी विधायक ही नहीं हैं। तिवारी पिछली बार भी सपा के सपोर्ट से ही राज्यसभा पहुंचे थे। राज्यसभा में कांग्रेस के 59 सदस्य हैं, जबकि यूपी विधानपरिषद में 2 सदस्य हैं।
2 अप्रैल 2018 को राज्यसभा की 10 सीटें खाली हो रही हैं। इसमें एक सीट मायावती की है। बीएसपी से ही राज्यसभा सांसद मुनकाद अली का भी टैन्योर खत्म हो रहा है। राज्यसभा में मायावती और मुनकाद अली को मिलाकर बीएसपी के 6 सांसद हैं। 2 अप्रैल 2018 के बाद 4 बचेंगे। 2017 में सिर्फ 19 सीट पर सिमटने वाली बीएसपी अब मायावती को राज्यसभा भी नहीं भेज पाएगी। 5 मई 2018 को यूपी विधानपरिषद की भी 13 सीटें खाली हो रही हैं, लेकिन मायावती 2017 के विधायकों के नंबर के आधार पर वहां भी नहीं जा पाएंगी। 5 मई 2018 को बसपा के डॉ. विजय प्रताप, सुनील कुमार और ठाकुर जयवीर सिंह का कार्यकाल भी खत्म हो रहा है। बीजेपी को 300 से अधि‍क सीटें मिली हैं। जबकि सपा-कांग्रेस दूसरे और बीएसपी तीसरे नंबर पर है। मायावती यह चुनाव बुरी तरह से हार गई हैं। मायावती ने दलित-मुस्लिम गठजोड़ पर भरोसा जताया। यूपी में करीब 40 फीसदी दलित वोटर हैं। 2012 के विधानसभा चुनाव में बसपा 25.9 फीसदी वोट पाकर भी सत्ता से दूर रही। राज्य की 85 आरक्षित सीटों में से बसपा केवल 15 सीटें जीत पाई थी। जबकि 2007 में 85 में से 62 सीट जीती थी। लेकिन 2014 से बीजेपी ने बसपा के इस वोट बैंक में सेंधमारी की। 2014 आम चुनावों में जाटव वोट 68 फ़ीसदी बसपा के साथ गए थे, लेकिन अन्य दलित वोटर भाजपा के साथ करीब 45 फ़ीसदी आये थे। बसपा को इनका केवल 30 फ़ीसदी वोट ही मिला था। वहीं, यही दलित कभी कांग्रेस का वोटर माना जाता था। इसी सोच के साथ सपा ने कांग्रेस के जरिए दलित वोट खींचने की कोशिश की। मायावती ने जहाँ 1 फरवरी से अपनी रैलियां शुरू की तो लगातार 15 फरवरी तक रैली की। इसके बाद 16 फरवरी को ब्रेक लिया। इसके बाद उन्होंने 24 फरवरी को भी ब्रेक लिया और 4 मार्च तक लगातार रैली की। इस दौरान उन्होंने 75 जिलों में 74 रैलियां की।
-जबकि मायावती के अलावा पार्टी के राष्ट्रीय महासचिव सतीश चन्द्र मिश्रा और नसीमुद्दीन सिद्दीकी ने छोटो छोटी सभाओं पर जोर दिया। जबकि कई बड़े नेता जिसमे प्रदेश अध्यक्ष राम अचल राजभर भी प्रचार से दूर ही रहे।
-इसके अलावा स्वामी प्रसाद मौर्य, ब्रिजेश पाठक और आर के चौधरी और कई छोटे बड़े नेताओं ने पार्टी छोड़ी। जिससे वोटर के हिसाब से उनकी जाति के नेता उन तक नहीं पहुंच पाए।
5 मई 2018 को एमएलसी अखिलेश यादव सहित 13 सीटें खाली हो रही हैं, जबकि 2 अप्रैल 2018 में ही राज्यसभा की 10 सीट खाली हो जाएंगी। ऐसे में सपा को मिली 47 सीटें देखकर माना जा रहा है कि इस बार राज्यसभा और विधानपरिषद में सपा एक-एक कैंडिडेट ही भेज पाएगी। अभी राज्यसभा में सपा के 18 सदस्य राज्यसभा सांसद हैं, लेकिन 2 अप्रैल 2018 के बाद 6 सदस्यों नरेश अग्रवाल, जया बच्चन, किरनमय नंदा, दर्शन सिंह यादव, चौधरी मुनव्वर सलीम और आलोक तिवारी का टैन्योर खत्म हो जाएगा। ऐसे में 47 सीट पाने वाली सपा अब एक ही सदस्य को राज्यसभा भेज पाएगी। अगर कांग्रेस-7, रालोद-1, निर्बल इंडियन शोषित हमारा आम दल-1 और निर्दलीय-3 (47+7+1+1+3=59 (1 राज्यसभा सदस्य के लिए 34 विधायकों का सपोर्ट चाहिए) सपोर्ट भी करते हैं, तब भी सपा को 2 सदस्य राज्यसभा भेजने के लिए 9 विधायकों की और जरूरत पड़ेगी। यही पेंच एमएलसी चुनावों में भी फंसेगा। 5 मई को खाली हो रही 13 सीट पर अभी सपा के अखिलेश यादव, अम्बिका चौधरी, उमर अली खान, नरेश उत्तम, मधु गुप्ता, राजेंद्र चौधरी, राम सकल गुर्जर और विजय यादव हैं। यूपी विधानपरिषद में अभी सपा के 67 मेंबर्स हैं।

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