बंगाल के एससी सबसे महत्वपूर्ण फैक्टर -पश्चिम बंगाल चुनाव –

पश्चिम बंगाल चुनाव में तृणमूल कांग्रेस और बीजेपी में से किसका पलड़ा भारी है?  तृणमूल कांग्रेस के लिए काम कर रहे चुनावी रणनीतिकार प्रशांत किशोर क्या मानते हैं? पश्चिम बंगाल चुनाव में तृणमूल कांग्रेस और बीजेपी में से किसका पलड़ा भारी है?  तृणमूल कांग्रेस के लिए काम कर रहे चुनावी रणनीतिकार प्रशांत किशोर क्या मानते हैं? 

प्रशांत किशोर का आकलन क्या है? इसका भी जवाब वह देते हैं। उन्होंने एक साक्षात्कार में कहा, ‘पिछले साल नवंबर-दिसंबर में बीजेपी के पक्ष में प्रचार किया जा रहा था कि वे राज्य में चुनाव को स्वीप करने जा रहे हैं, 200 सीटें जीतने जा रहे हैं आदि। इसलिए, हमारे लिए सार्वजनिक रूप से यह कहना ज़रूरी था कि यह सच नहीं है… ऐसा नहीं है कि दिसंबर में बीजेपी 200 सीटें जीतने की स्थिति में थी। और हमारे आकलन में वे ट्रिपल अंकों में प्रवेश करने के लिए वे संघर्ष करेंगे, और मैं अभी भी उस टिप्पणी पर अडिग हूँ। यदि वे ट्रिपल अंकों में करते हैं तो मैं किसी के लिए एक राजनीतिक सहयोगी के रूप में मौजूद नहीं रहूँगा। मुझे यह स्थान छोड़ना चाहिए, और इस स्थान को छोड़ने का मतलब ट्विटर नहीं है; फिर मैं काम कभी नहीं करूँगा।’

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने चुनाव आचार संहिता का उल्लंघन किया

तृणमूल कांग्रेस ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की शिकायत चुनाव आयोग से करते हुए कहा है कि बांग्लादेश के ओराकांदी मातुआ मंदिर जाकर उन्होंने पश्चिम बंगाल में उसी दिन हो रहे प्रथम चरण के मतदान को प्रभावित करने की कोशिश की है। टीएमसी ने तर्क दिया है कि प्रधानमंत्री अपने साथ मातुआ नेता शांतनु ठाकुर को भी ले गए थे जो किसी सरकारी पद पर नहीं है और उनके प्रधानमंत्री के प्रतिनिधिमंडल में शामिल होने का सीधा मतलब यह है कि वे मातुआ मतदाताओं को प्रभावित करने की कोशिश कर रहे थे। तृणमूल कांग्रेस ने मंगलवार को चुनाव आयोग को लिखित चिट्ठी में कहा है कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने चुनाव आचार संहिता का उल्लंघन किया है। इसके साथ ही पार्टी ने उनके ख़िलाफ़ कार्रवाई करने की माँग की है। टीएमसी ने यह भी कहा है कि नरेंद्र मोदी ने मतुआ समुदाय के लोगों को संबोधित करते हुए कहा था कि किस ने सोचा था कि कोई भारतीय प्रधानमंत्री यहां आएगा और पूजा करेगा। 

 भारतीय प्रधानमंत्री बांग्लादेश की स्वतंत्रता के स्वर्ण जयंती समारोह और उसके संस्थापक माने जाने वाले शेख मुज़ीबुर रहमान के जन्म शतवार्षिकी समारोह में भाग लेने के लिए बांग्लादेश गए थे। लेकिन वह ओराकांदी स्थित मातुआ मंदिर भी गए, जिसकी स्थापना मातुआ संप्रदाय के संस्थापक हरिचाँद ठाकुर ने की थी। यह मातुआ समुदाय का सबसे बड़ा तीर्थ स्थल माना जाता है।नरेंद्र मोदी ने उस मंदिर में मातुआ समुदाय के लोगों को संबोधित भी किया था। उन्होंने कहा था कि वे जब पश्चिम बंगाल स्थित मातुआ मंदिर गए थे तो मातुआ प्रमुख ‘बड़ो माँ’ यानी वीणापाणि देवी से मिल कर आशीर्वाद लिया थ। उन्हें ‘बड़ो माँ’ ने बहुत ही स्नेह दिया था। प्रधानमंत्री ने यह भी कहा कि मातुआ समुदाय के लोगों ने उन्हें बहुत ही इज्ज़त दी थी। 

27 मार्च को पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव का पहला चरण था। राज्य में मातुआ समुदाय की आबादी लगभग दो करोड़ है और वे लगभग 60-70 विधानसभा सीटों को प्रभावित करने की स्थिति में है। ऐसे में टीएमसी को आपत्ति इस बात पर है कि प्रधानमंत्री ने मातुआ समुदाय को प्रभावित करने की कोशिश की थी। यह चुनाव आयोग की संहिता का उल्लंघन है। शिवसेना ने भी प्रधानमंत्री को निशाने पर लिया है। उसने अपने मुखपत्र ‘सामना’ में मंगलवार को लिखा कि नरेंद्र मोदी को बांग्लादेश मुक्ति आंदोलन में भाग लेने के लिए ‘ताम्र पत्र’ (ताम्रपत्र) दिया जाना चाहिए। नरेंद्र मोदी ने बांग्लादेश में भाषण देते हुए कहा था कि बांग्लादेश की मुक्ति के लिए उन्होंने सत्याग्रह किया था और जेल भी गए थे। शिवसेना ने इसी पर तंज किया है। 

पाँच स्तरों पर बीजेपी कितनी सफल रही है? इस पर प्रशांत किशोर कहते हैं कि अब वे सभी पाँच मामलों में अलग-अलग स्तर पर सफल रहे हैं। 

प्रशांत किशोर बीजेपी की रणनीति को पाँच बिंदुओं में बाँटकर देखते हैं। ‘द इंडियन एक्सप्रेस’ को दिए साक्षात्कार में उन्होंने कहा कि बंगाल में बीजेपी की रणनीति के पाँच स्तंभ हैं। उन्होंने कहा, ‘एक है ध्रुवीकरण। दूसरा, वे ममता बनर्जी को बदनाम करना चाहते थे और उनके ख़िलाफ़ व्यापक ग़ुस्सा पैदा करना चाहते थे। तीसरा, उन्होंने यह सुनिश्चित करने के लिए सभी साधनों का इस्तेमाल किया कि एक राजनीतिक इकाई के रूप में टीएमसी का पतन हो। चौथी रणनीति अनुसूचित जातियों का समर्थन हासिल करने की रही है। पाँचवाँ, वे मोदी की लोकप्रियता भुनाना चाहते हैं।’

वह कहते हैं, ‘वे ध्रुवीकरण करने में सक्षम रहे हैं, लेकिन सवाल यह है कि क्या उन्होंने

60% (बहुमत के वोटों) की सीमा को पार करने के लिए मतदाताओं को पर्याप्त रूप से ध्रुवीकृत किया है। ऐतिहासिक रूप से जब चुनाव ध्रुवीकृत माहौल में हुए हैं तो यह सीमा लगभग 50 से 55% हो गई है। मेरे कहने का मतलब यह है कि जब एक चुनाव ध्रुवीकृत माहौल में होता है – गुजरात में 2002 के बाद या उत्तर प्रदेश में बाबरी मस्जिद के बाद – आमतौर पर हम बीजेपी के लिए बहुसंख्यक समुदाय का 50 से 55% वोट देखते हैं। बंगाल में उन्हें उस दहलीज को तोड़ना होगा। वे बंगाल को तब तक नहीं जीत सकते जब तक कि उन्हें बहुमत का कम से कम 60% मत नहीं मिले… मुझे नहीं लगता कि बंगाल उतना ही ध्रुवीकृत है जितना हमने भारत के अन्य हिस्सों में देखा है।’

वह कहते हैं, ‘…निश्चित रूप से टीएमसी के ख़िलाफ़ एंटी इंकंबेंसी है। कुछ हद तक थोड़ा ग़ुस्सा भी हो सकता था। लेकिन, यदि आप पूरे बंगाल की यात्रा करते हैं तो आप पाएँगे कि ग़ुस्सा ज़्यादातर स्थानीय टीएमसी नेताओं के ख़िलाफ़ है और तब भी बड़े स्तर पर लोग दीदी पर भरोसा करने के लिए तैयार हैं। और क्योंकि यह दीदी का चुनाव है, तृणमूल अपनी जमीन बनाए रखेगी।’

 ‘द इंडियन एक्सप्रेस’ से बातचीत में वह कहते हैं कि ‘तीसरा हिस्सा टीएमसी का पतन है। फिर यह राष्ट्रीय मीडिया द्वारा ऊबाऊ तरीक़े से बार-बार यह बताने की कोशिश की गई है कि तृणमूल से पलायन हो रहा है… वे (भाजपा) सभी साधनों का उपयोग लोगों को ग़लत तरीक़े से अपने पक्ष में करने के लिए करते हैं, और वे 30 विधायक और सांसदों के साथ ऐसा करने में सफल रहे हैं।’

प्रशांत किशोर कहते हैं कि तृणमूल जितनी बड़ी है उसके लिए 20-25 विधायकों को खोना बड़ी बात है, लेकिन यह पार्टी का पतन नहीं है। प्रशांत किशोर ऐसे लोगों के पार्टी छोड़ने के कारणों में से एक यह भी बताते हैं कई लोग ख़ुद को प्रमुख पदों पर नहीं पाते थे और इसलिए उन्होंने पार्टी छोड़ दी।

तृणमूल के चुनाव रणनीतिकार के अनुसार चौथा, नामसुद्र व मतुआ समुदाय का मुद्दा है और बड़ा एससी समुदाय भी। वह कहते हैं, ‘नागरिकता संशोधन क़ानून को लोकसभा चुनावों में अपना वोट पाने के लिए घोषित किया गया था। एससी के भीतर एक बहुत बड़ा समुदाय नामसुद्र ने बीजेपी के लिए वोट दिया था। लेकिन बंगाल में बाद के उपचुनावों में, यहाँ तक ​​कि नामसुद्र-बहुल क्षेत्रों में भी वे हार गए। तब से वे सीएए को कमतर तौर पर पेश करने की कोशिश कर रहे हैं। क्रोनोलॉजी के बारे में कोई चर्चा तक नहीं है जो हमने पहले सुना गया था।’ 

उनका यह आकलन इसलिए अहम है कि चुनावी रणनीतिकार प्रशांत किशोर फ़िलहाल पश्चिम बंगाल में मुख्यमंत्री ममता बनर्जी और तमिलनाडु में डीएमके प्रमुख एम के स्टालिन के लिए चुनाव अभियान में जुटे हैं। उन्होंने अब तक कई दलों के लिए चुनावी रणनीतिकार के तौर पर काम किया है। उन्होंने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के 2014 के अभियान के लिए काम किया। उस चुनाव में जीत के बाद से बीजेपी सत्ता में है। उन्होंने अमरिंदर सिंह, नीतीश कुमार, अरविंद केजरीवाल और जगन मोहन रेड्डी जैसे मुख्यमंत्रियों की चुनावी रणनीतियों को सफलतापूर्वक पूरा किया।

प्रशांत किशोर कहते हैं, ‘हाँ, यह एक फैक्टर है और इसीलिए यह प्रयास है कि इसे कम से कम किया जाए। लगभग 60% ब्लॉक अध्यक्ष अब नए हैं। 80 से अधिक विधायकों को हटा दिया गया है। मुझे आशा है कि उन सभी चीजों ने इसे कम करने में योगदान दिया है… मैं यह नहीं कह रहा हूँ कि हर कोई आपकी सरकार का प्रशंसक बन जाएगा, लेकिन यह निश्चित रूप से यदि कोई ग़ुस्सा था तो उसको कुछ कम करने में मदद करेगा।’

बंगाल में जाति फैक्टर के सवाल पर वह कहते हैं, ‘पहचान की राजनीति हमेशा से थी। यह सवाल है कि आप इसे कितना खेलते हैं। मैं भारत के किसी ऐसे राज्य में नहीं गया हूँ जहाँ जाति/पहचान कोई फैक्टर नहीं है। इन चुनावों में बंगाल के एससी सबसे महत्वपूर्ण फैक्टर हैं। इसका कहने का मतलब यह नहीं है कि राजबंशी और नामसुद्र मौजूद नहीं हैं। वे हमेशा मौजूद रहे, पार्टियों ने उन पर भी ध्यान दिया। लेकिन अब इसे कुछ ज़्यादा आगे लाया जा रहा है… ठीक वैसे ही जैसे हमने यूपी और बिहार में देखा है।’

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