मनुष्य के जीवन कुछ न कुछ अप्रत्याशित और अनायास ही घटता रहता है- मनुष्य का अपना प्रारब्ध ही होता है; अचानक एक लड़का साधु और संत में बदल गया

DT 29 JULY 2023#महर्षि ने भारत के साथ-साथ पश्चिम के कई देशों में अपना उजाला फैलाकर देश को गौरवान्वित किया तथा मानव जाति की बहुमूल्य सेवा की। # रमण महर्षि को भगवान क्यों कहा जाता है?गणपति मुनि ने एक गुरु के रूप में अपनी कृतज्ञता व्यक्त करने के लिए अपना नाम बदलकर रमण रख लिया, जिन्होंने उन्हें सच्चाई बताई। उन्होंने उन्हें भगवान रमण महर्षि के रूप में पुनः नामित किया। भगवान एक विशेषण है जो दर्शाता है कि व्यक्ति में भगवान की सभी छह गुना शक्तियां मौजूद हैं। महर्षि का अर्थ है सत्य के द्रष्टाओं में अग्रणी।

1930 के दशक से उनकी शिक्षाएँ पश्चिम में लोकप्रिय हुई हैं। रमण महर्षि ने कई मार्गों और प्रथाओं को मंजूरी दी, लेकिन अज्ञानता को दूर करने और भक्ति (भक्ति) या स्वयं के प्रति समर्पण के साथ-साथ आत्म-जागरूकता में बने रहने के प्रमुख साधन के रूप में आत्म-जांच की सिफारिश की।

रमण महर्षि  , जन्म- 30 दिसम्बर, 1879, तिरुचुली गाँव, तमिलनाडु; मृत्यु- 14 अप्रैल, 1950, रमण आश्रम, तमिलनाडु) बीसवीं सदी के महान् संत थे, जिन्होंने तमिलनाडु स्थित पवित्र अरुनाचला पहाड़ी पर गहन साधना की थी। उन्हें केवल भारत में ही अपितु विदेशो में भी शांत ऋषि के रूप में जाना जाता है। उन्होंने आत्म विचार पर बहुत बल दिया था। रमण महर्षि के संपर्क में आने पर असीम शांति का अनुभव होता था। आज भी लोग शांति कि खोज में तिरुवन्नामलाई स्थित रमण महर्षि के आश्रम अरुनाचला पहाड़ी और अरुनाचलेश्वर मंदिर में जाते हैं। महर्षि ने भारत के साथ-साथ पश्चिम के कई देशो में अपना उजाला फैलाकर देश को गौरवान्वित किया तथा मानव जाति की बहुमूल्य सेवा की। भारत के आध्यात्मिक लाडले सपूतों में रमण महर्षि का नाम अग्रगण्य है।

लोग समझते हैं की आंदोलन से ही सब कुछ हो जायेगा। उनका अपना ही महत्व है। आंदोलन में शक्ति आध्यात्मिक उपायों से ही आती है। वशिष्ठ और विश्वामित्र दोनों ने तप किया था , तब रावण का आसुरी आंतक समाप्त हुआ। कंस को मारने के लिए भगवान विष्णु खुद ही आ गए थे। असुरों को मारने के लिए ऋषियों ने तप किये थे। तप की शक्ति हो तो मामूली से दिखने वाले लोग भी चमत्कार कर सकते हैं “

एक दिन महर्षि रमण के पास दो धर्म प्रचारक आए। उन्होंने महर्षि को प्रणाम करके कहा, ‘आप कहते हैं कि आपको प्रभु के दर्शन हो गए। आप हमें भी ईश्वर के दर्शन कराइए।’ महर्षि तैयार हो गए। वह उन्हें लेकर एक टूटी-फूटी झोपड़ी के पास पहुंचे। वहां रखा पानी का बर्तन खाली था। अंदर जमीन पर कुष्ठ रोग से पीड़ित एक वृद्ध सोए हुए थे। महर्षि ने दोनों धर्म प्रचारकों से दरवाजे पर ही ठहरने को कहा और खुद अंदर चले गए।

By Chandra Shekhar Joshi Chief Editor www.himalayauk.org (Leading Web & Print Media) Publish at Dehradun & Haridwar. Mail; himalayauk@gmail.com Mob. 9412932030 — कलयुग तारक मन्त्र- राधे राधे

उन्होंने वहां सफाई की। फिर घड़े में पानी भरा। उसके बाद वृद्ध व्यक्ति के कान में प्रभु के नाम का उच्चारण कर उन्हें जगाया। वृद्ध के चेहरे पर प्रसन्नता और बदन में फुर्ती नहीं थी। महर्षि ने उनके घाव की मरहम-पट्टी की। फिर उन्हें नित्य कर्म से फारिग कराकर प्रसाद दिया। इसके बाद महर्षि ने वृद्ध से कहा, ‘आइए प्रभु का ध्यान करें।’ कुछ देर तक महर्षि और वृद्ध दोनों ने ध्यान किया। दोनों धर्म प्रचारक दूर से यह सब देख रहे थे। उनकी उत्सुकता बढ़ती जा रही थी। उन्हें लग रहा था, शायद अब महर्षि कुछ ऐसा चमत्कार करेंगे जिससे प्रभु सबके सामने प्रकट हो जाएंगे।

उधर महर्षि और वृद्ध दोनों ध्यान लगाए बैठे थे। ध्यान समाप्त होने पर महर्षि ने वृद्ध से पूछा, ‘क्या आपको प्रभु के दर्शन हुए?’ वृद्ध ने कहा, ‘हां, हुए।’ महर्षि ने पूछा, ‘वह कैसे थे?’ उसने मुस्कुराकर कहा, ‘बिल्कुल आप जैसे।’ अब वृद्ध की बारी थी, उन्होंने पूछा, ‘क्या आपको प्रभु के दर्शन हुए/’ महर्षि ने कहा, ‘हुए।’ वृद्ध ने पूछा, ‘वह कैसे थे?’ महर्षि बोले, ‘बिल्कुल आप जैसे।’

इसके बाद महर्षि धर्म प्रचारकों की ओर मुड़े और उनसे पूछा, ‘क्या आप लोगों को प्रभु के दर्शन हुए?’ अब तक दोनों की आंखें खुल चकी थीं। वे बोले, ‘जी, दर्शन हो गए और यह भी पता चला कि प्रभु के द्वार चढ़ने हो तो सेवा की सीढ़ी से होकर जाना पड़ता है।’

” संसार में चमत्कार जैसा कुछ भी नहीं है। जिन्हे हम चमत्कार समझ बैठते हैं ,हैरान हो जाते हैं वह वास्तव में प्रकृति के नियमों को न समझ पाने के कारण ही होता है। मनुष्य के जीवन कुछ न कुछ अप्रत्याशित और अनायास ही घटता रहता है। वह कहीं और से नहीं आता है ,मनुष्य का अपना प्रारब्ध ही होता है। इस स्थिति में योगीपुरष केवल इतना ही करते हैं कि वह अपने तेज से ,तप से इसको समय से पहले प्रकट करवा लेते हैं “

गुरु कैसे पाया जाता है?

भगवान, जो अन्तर्यामी हैं, अपनी कृपा से प्रेमी भक्त पर दया करते हैं और भक्त के विकास के अनुसार स्वयं प्रकट होते हैं। भक्त सोचता है कि वह एक मनुष्य है और दो भौतिक शरीरों के बीच संबंध की अपेक्षा करता है। लेकिन गुरु, जो भगवान या स्वयं का अवतार है, भीतर से काम करता है, मनुष्य को उसके तरीकों की त्रुटि देखने में मदद करता है और उसे सही रास्ते पर मार्गदर्शन करता है जब तक कि वह अपने भीतर स्वयं को महसूस नहीं कर लेता।

रमण महर्षि का जन्म 30 दिसम्बर, सन 1879 में मदुरई, तमिलनाडु के पास ‘तिरुचुली’ नामक गाँव में हुआ था। इनका जन्म ‘अद्र दर्शन’, भगवान शिव का प्रसिद्ध पर्व, के दिन हुआ था। जन्म के बाद रमण के माता-पिता ने उनका नाम वेंकटरमण अय्यर रखा था। ये अपने पिता सुन्दरम अय्यर की चार संतानों में से दूसरे थे। बाद के समय में वेंकटरामन अय्यर ‘रमण महर्षि’ के नाम से विश्व में प्रसिद्ध हुए।

जीवन के आरम्भिक वर्षों में वेंकटरामन में कुछ भी उल्लेखनीय नहीं था। वे एक सामान्य बालक के रूप में ही विकसित हुए थे। उन्हें तिरुचुली के एक प्राइमरी स्कूल में तथा बाद में दिण्डुक्कल के एक स्कूल में शिक्षा के लिए भेजा गया। जब वे बारह वर्ष के थे, तभी इनके  पिता का देहावसान हो गया। ऐसी स्थिति में उन्हें परिवार के साथ अपने चाचा सुब्ब अय्यर के साथ मदुरै में रहने की आवश्यकता पड़ी। मदुरै में उन्हें पहले ‘स्काट मीडिल स्कूल’ तथा बाद में ‘अमेरिकन मिशन हाईस्कूल’ में भेजा गया। यद्यपि वह तीव्र बुद्धि एवं तीव्र स्मरण शक्ति से सम्पन्न थे, किन्तु फिर भी अपनी पढ़ाई के प्रति गंभीर नहीं थे।

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *