6 अप्रैल, सोमवार,26, वैशाख कृष्ण पक्ष की चतुर्थी तिथि, माता अनुसुइया की जयंती & संकष्टी चतुर्थी और सोमवार का संयोग, शिव परिवार की पूजा, गणेश जी को दूर्वा और शिव जी को बेलपत्र & BAGLA MUKHI PEETH DUN हनुमान जी के पैरों से कंपन

6 अप्रैल 2026, सोमवार का दिन विशेष ज्योतिषीय संयोग लेकर आया है। आज चतुर्थी तिथि, अनुराधा नक्षत्र और सर्वार्थ सिद्धि योग का शुभ संयोग बन रहा है, जो कई कार्यों के लिए अत्यंत लाभकारी &  वैशाख मास के कृष्ण पक्ष की चतुर्थी तिथि है। सोमवार का दिन भगवान शिव की आराधना के लिए सर्वोत्तम माना जाता है। चतुर्थी – सुबह 04:35 एएम तक (7 अप्रैल), उसके बाद पंचमी। संकष्टी चतुर्थी और सोमवार का संयोग होने के कारण आज शिव परिवार (शिव-पार्वती और गणेश जी) की संयुक्त पूजा करें। गणेश जी को दूर्वा और शिव जी को बेलपत्र अर्पित BY CHANDRA SHEKHAR JOSHI Mob. 9412932030

शिव परिवार पूजा (शिव, पार्वती, गणेश, कार्तिकेय और नंदी) घर में सुख, शांति, एकता और समृद्धि लाने के लिए की जाती है

6 अप्रैल 2026, सोमवार को वैशाख कृष्ण पक्ष की चतुर्थी तिथि (दोपहर 02:11 तक, फिर पंचमी) है। इस दिन अनुराधा नक्षत्र, सिद्धि योग और माता अनुसुइया जयंती मनाई जाएगी। यह दिन मानसिक शांति और पूजा-पाठ के लिए विशेष है।  6 अप्रैल को वैशाख कृष्ण पक्ष की चतुर्थी तिथि और सोमवार का दिन है। चतुर्थी तिथि सोमवार दोपहर 2 बजकर 11 मिनट तक सूर्योदय-सुबह 6:03 AM सूर्यास्त- शाम 6:41 PM

 ज्योतिष शास्त्र अनुसार सभी ग्रह कुछ-कुछ समय में सिर्फ राशि ही नहीं बदलते बल्कि अपना नक्षत्र भी बदलते हैं। इसी कड़ी में 6 अप्रैल को दो बड़े ग्रहों का नक्षत्र परिवर्तन होने जा रहा है। 6 अप्रैल को 01:04 AM पर शुक्र भरणी नक्षत्र में प्रवेश करेंगे तो वहीं इसी रात 10:04 PM पर मंगल उत्तर भाद्रपद नक्षत्र में चले जाएंगे। ये गोचर 4 राशि वालों के सुखों में बढ़ोतरी करने वाला है।

हनुमान जी के पैरों से कंपन

BAGLA MUKHI PEETH ; DEHRADUN; हनुमान जी के चरणों (पैरों) से वाइब्रेशन (कंपन) या दिव्य ऊर्जा का अनुभव होना उनके अत्यंत सक्रिय, जागृत और रक्षक रूप का प्रतीक माना जाता है। सनातन धर्म में हनुमान जी को ‘अष्ट सिद्धि और नवनिधि के दाता’ के रूप में पूजा जाता है, और उनके चरणों में अटूट श्रद्धा रखने से विशेष फल मिलते हैं।
हनुमान जी के पैरों से कंपन या ऊर्जा के महात्म्य के प्रमुख कारण और संकेत निम्नलिखित हैं:
असीम ऊर्जा और जागृत शक्ति: हनुमान जी रुद्रावतार (शिवजी का रूप) हैं। उनके चरण ऊर्जा का केंद्र हैं। मान्यता है कि जहां हनुमान जी की प्राण-प्रतिष्ठित मूर्ति या सच्चे मन से पूजा होती है, वहां उनके चरणों में सूक्ष्म रूप से दिव्य ऊर्जा या वाइब्रेशन महसूस हो सकते हैं, जो उनकी जीवित उपस्थिति को दर्शाते हैं।
संकट मोचन और सुरक्षा: हनुमान जी के पैर “सुरक्षा कवच” के समान हैं। उनके चरणों का ध्यान करने या चरणों से निकलने वाली ऊर्जा का अनुभव करने से भय, बुरी आत्माओं और नकारात्मक ऊर्जा का नाश होता है। यह कंपन साधक को यह आश्वासन देता है कि हनुमान जी उनके संकट को दूर कर रहे हैं।
आत्मविश्वास और मनोबल में वृद्धि: यदि पूजा के दौरान हनुमान जी के चरणों में कंपन या शक्ति का अनुभव हो, तो यह उस व्यक्ति के आत्मविश्वास में वृद्धि, मानसिक मजबूती और निडरता का संकेत है। यह ऊर्जा शत्रुओं पर विजय प्राप्त करने और जीवन की कठिनाइयों से लड़ने की शक्ति देती है।
भक्ति और समर्पण (सिंदूर का महत्व): हनुमान जी के बाएं पैर (उल्टे पैर) के सिंदूर को अत्यंत चमत्कारिक माना जाता है। यदि भक्त हनुमान जी के चरणों में सिंदूर लगाकर (उल्टे पैर का) उन्हें अर्पण करता है, तो उसे नकारात्मक ऊर्जा से मुक्ति मिलती है और उसका अटका हुआ काम जल्दी बन जाता है।
कष्टों का निवारण: हनुमान जी के चरणों में ध्यान लगाने से शारीरिक रोग और मानसिक कष्ट दूर होते हैं। चरणों से आने वाली तरंगे मन को शांत करती हैं और सकारात्मक ऊर्जा का संचार करती हैं।

6 अप्रैल को वैशाख कृष्ण पक्ष की चतुर्थी तिथि और सोमवार का दिन है। चतुर्थी तिथि सोमवार दोपहर 2 बजकर 11 मिनट तक रहेगी। 6 अप्रैल को दोपहर बाद 3 बजकर 25 मिनट तक सिद्धि योग रहेगा। साथ ही  सोमवार देर रात 2 बजकर 57 मिनट तक अनुराधा नक्षत्र रहेगा। इसके अलावा 6 अप्रैल को माता अनुसुइया की जयंती

माता अनुसुइया, ऋषि अत्रि की पत्नी, कर्दम ऋषि व देवहूति की पुत्री और त्रिदेव यानि ब्रम्हा ,विष्णु ,महेश की माता थी जो अपनी भक्ति, सतीत्व, पतिव्रता और पवित्रता के लिए जानी जाती हैं। उन्होंने अपने सतीत्व व तपस्या के बल और तेज से ब्रह्मा, विष्णु और महेश को शिशु रूप में परिवर्तित कर दिया था। माता अनुसुइया का विशेष मेला और जयंती कार्यक्रम उत्तराखंड के चमोली में सती अनुसुइया आश्रम में मनाया जाता है, जो अत्रि ऋषि की तपस्थली भी है।

माता अनुसुइया का जन्मदिवस पूरे हर्षो उल्लास के साथ खास तौर पर सती अनुसुइया आश्रम और चित्रकूट आदि के मंदिरों में मनाया जाता है। इस दिन महिलाएं सती अनुसुइया और महर्षि अत्रि की पूजा करती हैं। वे अपने पति की दीर्घायु और परिवार में सुख-शांति के लिए व्रत रखती हैं। ऐसा माना जाता है कि इस दिन व्रत करने से घर में समृद्धि आती है और पति का स्वास्थ्य उत्तम बना रहता है, साथ ही आश्रमों में विशेष भजन, कीर्तन और मेलों का आयोजन होता है।

  • वैशाख कृष्ण पक्ष की चतुर्थी तिथि – 6 अप्रैल 2026 को दोपहर 2 बजकर 11 मिनट तक
  • सिद्धि योग- 6 अप्रैल को दोपहर 2 बजकर 11 मिनट तक
  • अनुराधा नक्षत्र- 6 अप्रैल को देर रात 2 बजकर 57 मिनट तक
  • 6 अप्रैल 2026 व्रत-त्यौहार- माता अनुसुइया जयंती

वैशाख माह का आरंभ 3 अप्रैल से हो चुका है, जिसका समापन 1 मई को होगा। इस महीने में स्नान, दान-पुण्य और पूजा-पाठ करने से पुण्यकारी फलों की प्राप्ति होती है। वहीं वैशाख मास में कई ग्रहों का भी राशि परिवर्तन होने वाला है। इसके अलावा कई ग्रह शक्तिशाली राजयोग का निर्माण भी करेंगे। इन ग्रहों के राशि परिवर्तन से कई राशियों को धन का लाभ मिलेगा। 11 अप्रैल को बुध मीन राशि में गोचर करेंगे, जहां मंगल पहले से ही विराजमान हैं। सूर्य और शनि के प्रभाव के साथ मिलकर यह चतुर्ग्रही योग बनेगा। इसके अलावा सूर्य और बुध की युति से बुधादित्य राजयोग का निर्माण होगा। 14 अप्रैल को सूर्य मेष राशि में प्रवेश करेंगे। 19 अप्रैल को शुक्र वृष राशि में प्रवेश करेंगे, जिससे मालव्य राजयोग का निर्माण होगा। इसके बाद 30 अप्रैल को बुध मेष राशि में गोचर करेंगे। 

हर दिन सूर्योदय और सूर्यास्त के बीच, कुछ निश्चित समय अवधि होती है जब किसी भी शुभ कार्य को नहीं करना चाहिए या कोई नया काम शुरू नहीं करना चाहिए। इस समय को शुभ या बुरा मुहूर्त कहा जाता है। ज्योतिषियों के अनुसार, इस अवधि में, तारों और ग्रहों की स्थिति प्रतिकूल और अप्रभावी होती हैं। यह मूलभूत कार्यों को नकारात्मक रूप से प्रभावित करता है और बुरे प्रभाव या विफलता का कारण बनता है। कभी-कभी, इस अवधि में नए उद्यम शुरू करने से अपेक्षित परिणाम नहीं मिलते हैं या अप्रत्याशित समय के लिए रुक जाते हैं। हिंदू पंचांग में, राहु कालम् या व्रज्याम काल में किसी भी अच्छे काम को करने के लिए सबसे अनुचित समय माना जाता है।

ज्योतिषीय रूप से, सूर्यास्त और सूर्योदय के बीच आठ खंड या मुहूर्त होते हैं जो एक दिन के शुभ और अशुभ समय का संकेत देते हैं। राहु काल इन आठ खंडों में से एक है जो हर दिन 90 मिनट तक रहता है। इस अवधि में, राहु, हानिकारक ग्रह, प्रमुख है। राहु काल में जो कुछ भी किया जाता है या शुरू किया जाता है उसका नकारात्मक परिणाम होता है। इस प्रकार, राहु काल के दौरान किसी भी शुभ कार्य को नहीं करने का सुझाव दिया गया है।

निक पंचांग की बेहतर समझ के लिए इससे अच्छी तरह से वाकिफ होना चाहिए। यह विभिन्न ज्योतिषीय घटनाओं के बारे में सटीक जानकारी प्रदान करता है और किसी भी तरह से आपको कुछ भी नया शुरू करने के लिए सबसे उपयुक्त समय खोजने में मदद करता है।

सूर्योदय और सूर्यास्त – हिंदू कैलेंडर में सूर्योदय से अगले सूर्यादय तक की अवधि को एक दिन माना जाता है। अतः, सूर्योदय और सूर्यास्त का समय ज्योतिष में बहुत महत्व रखता है। सभी प्रमुख निर्णय सूर्य और चंद्रमा की स्थिति पर विचार करने के बाद ही लिए जाते हैं।

चंद्रोदय और चन्द्रास्त – अनुकूल समय का निर्धारण करने के लिए चंद्रोदय और चन्द्रास्त का समय हिंदू कैलेंडर में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं।

शक संवत – शक संवत भारतीय आधिकारिक नागरिक कैलेंडर है, जिसे 78 ईस्वी में स्थापित किया गया था।

अमांत माह – हिंदू कैलेंडर, में जो चंद्र महीना अमावस्या के दिन समाप्त होता है, उसे अमांत माह के रूप में जाना जाता है। आंध्र प्रदेश, गुजरात, महाराष्ट्र, कर्नाटक, तमिलनाडु, केरल, पश्चिम बंगाल और त्रिपुरा कुछ ऐसे राज्य हैं जो इस हिंदू कैलेंडर का पालन करते हैं।

पूर्णिमांत माह – हिंदू कैलेंडर में चंद्र महीना पूर्णिमा के दिन समाप्त होता है उसे पूर्णिमांत माह के रूप में जाना जाता है। हरियाणा, हिमाचल प्रदेश, जम्मू और कश्मीर, झारखंड, मध्य प्रदेश, उड़ीसा, पंजाब, राजस्थान, उत्तराखंड और उत्तर प्रदेश ऐसे राज्य हैं जो इस हिंदू कैलेंडर का पालन करते हैं।

सूर्य राशि और चंद्र राशि – सूर्य चिह्न, राशि के आधार पर किसी व्यक्ति के व्यक्तित्व को दर्शाता है और यह उसके जन्म के समय एक मूल राशि के राशि चक्र में सूर्य की स्थिति से निर्धारित होता है। चंद्र चिन्ह से किसी व्यक्ति के व्यक्तित्व के भावनात्मक पहलू का पता चलता है, और यह उसके जन्म के समय मूल राशि के चार्ट में राशि चक्र की स्थिति से निर्धारित होता है।

पक्ष – तिथि को दो हिस्सों में बांटा गया है। प्रत्येक ‘आधे’ भाग को एक पक्ष के रूप में जाना जाता है। इसके दो पक्ष हैं, जैसेः शुक्ल पक्ष और कृष्ण पक्ष।

शुभ समय / अच्छा समय

अभिजीत नक्षत्र – जब भगवान ब्रह्मा मकर राशि में स्थित होते हैं, तो इसे अभिजीत नक्षत्र के रूप में जाना जाता है। नए कार्यों को करने और नई खरीदारी करने के लिए यह सबसे शुभ अवधियों में से एक माना जाता है।

अमृत ​​कालम् – यह अन्नप्राशन संस्कार और अन्य हिंदू अनुष्ठानों को करने का समय है। यह बहुत ही शुभ समय माना जाता है।

अशुभ समय

गुलिकई कालम् – गुलिका मंडा के बेटे उर्फ ​​शनि थे। इस समय को गुलिकई कालम् के नाम से जाना जाता है। इस अवधि के दौरान किसी भी कार्य की शुरुआत करना शुभ नहीं माना जाता है अतः इससे बचना चाहिए।

यमगंडा – यह एक अशुभ अवधि है, और किसी भी सफल और समृद्ध उद्यम के कार्य के लिए यह समयावधि वर्जित है।

दुर मुहूर्तम – यह दिन में एक बार सूर्यास्त से पहले एक बार आता है। किसी भी शुभ कार्य को करने से पहले इस समय से बचना चाहिए

व्रज्याम कालम् – व्रज्याम या विशघटिका वह समय है जो वर्तमान दिन से शुरू होता है और आने वाले दिन से पहले समाप्त होता है। इसे सौम्य काल नहीं माना जाता है।

राहु कालम् – राहु की अवधि किसी भी कार्य के लिए अच्छी नहीं मानी जाती है। किसी भी नई पहल के लिए राहु के प्रभाव से पूरी तरह बचा जाना चाहिए।

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ज्ञान चाहिए : काशी जाओ
मोक्ष चाहिए : केदार जाओ
भोग और शांति के लिए : सोमनाथ
पद चाहिए : नागेश्वर नाथ
पुत्र : घृष्णेश्वर
पूर्व जन्मों के कर्म के अच्छे फल प्राप्त करने के लिए : त्रयंबक
दुनिया से हार गए तो : भीमशंकर
सुघड़ दीर्घायु पत्नी : मल्लिकाजून
शत्रु विजय : रामेश्वरम
आयु, स्वास्थ्य, निरोग, भय से मुक्ति: महाकाल
और कुछ नहीं चाहिए , महादेव को पाने के लिए: ओंकारेश्वर
और
बगला मुखी पीठ, बंजारा वाला देहरादून में ज्योति स्वरूप में विराजमान दिव्य अलौकिक चमत्कारिक शिवलिंग के समक्ष 45 मिनट आंख बंद करके बैठने पर इन समस्त ज्योतिर्लिंग का पुण्य प्राप्त होगा: 46वे मिनट पर आप इस अद्भुत शिवलिंग से लिंक हो जायेगे और दिव्य ऊर्जा आपसे संपर्क साध लेगी : चन्द्रशेखर जोशी संस्थापक साधक बगलामुखी पीठ बंजारा वाला देहरादून

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