महामाई पीतांबरा श्री बगलामुखी के संस्थापक साधक गणनाथ निकट अल्मोड़ा की प्राचीन गुफा में साधना में जून अंतिम सप्ताह में करेंगे, गणनाथ, आध्यात्मिक शांति और प्रकृति प्रेमियों के लिए एक छिपा हुआ खजाना है。 गणनाथ मंदिर उत्तराखंड के अल्मोड़ा जिले में स्थित एक बेहद खूबसूरत और प्राचीन गुफा मंदिर है。यह स्थान भगवान शिव को समर्पित है और अपनी प्राकृतिक सुंदरता, ऐतिहासिक महत्व और चमत्कारी जलधारा के लिए जाना जाता है, घने जंगलों के बीच एक प्राचीन गुफा में भगवान शिव का शिवलिंग स्थापित है。。इस कुंड के जल को पीने से छोटे बच्चों की रुकी हुई आवाज खुल जाती है

गुफा की छत पर स्थित एक वटवृक्ष की जड़ों से बूंद-बूंद करके पानी टपकता है जो शिवलिंग पर गिरता है。इसे बहुत पवित्र माना जाता है। स्थानीय मान्यता है कि इस कुंड के जल को पीने से छोटे बच्चों की रुकी हुई आवाज खुल जाती है
यहाँ भगवान विष्णु की एक भव्य प्रतिमा भी मौजूद है, जिसके बारे में कहा जाता है कि इसे पहले बैजनाथ मंदिर से यहाँ लाया गया था, यह मंदिर अल्मोड़ा ज़िला मुख्यालय से लगभग 45 से 47 किलोमीटर की दूरी पर स्थित है
उत्तराखंड में हिमालय की श्रेणीयों में देवी देवताओ का निवास है। और उन सभी देवी देवताओ की अपनी अपनी परमपरागत बहुत सी कथाऐं भी है। .यहा के बहुत से देवी देवताओ ने यही जन्नम लिया और अपनी शक्ति ओर कार्य कौशल्य से देवता के रूप मे पूजे जाने लगे।
गंगनाथ बाबा उत्तराखंड के कुमाऊँ क्षेत्र के मुख्य देवताओं में से एक है, जो कि गोल्ज्यू देवता की ही भांति न्याय के देवता कहलाते है। गंगनाथ बाबा के भी कुमाऊँ में बहुत से मंदिर है। गंगनाथ बाबा अकेले से ऐसे देवता हैं जिन्हें बुलाने के लिए केवल हुड़का बजाया जाता है।
गंगनाथ बाबा के बारे में कुछ इस तरह कहा जाता हैं कि गंगनाथ बाबा काली नदी के पार डोटिगढ़ (नेपाल) के रहने वाले थे और कांकुर उनकी राजधानी थी। राजा भवेचन्द के वह पुत्र थे। उनकी माता का नाम प्योंला रानी था । वह बचपन से ही सरल स्वभाव के थे तथा उनका राजपाठ , यश , धन और वैभव में कोई रूचि नहीं थी। एक बार गंगनाथ अपने सेवको और राज कर्मचारियों के साथ उत्तरायणी मेला देखने बागेश्वर “बागनाथ” जाते हैं । मेले में उसकी मुलाकात दन्या के किशनानंद जोशी की पुत्री “भाना” से हो जाती हैं
गंगनाथ देवता उनके न्यायप्रिय व्यक्तित्व के कारण आज भी लोग उन्हें दुःख-कष्ट हराने और मनोकामना पूरी करने वाले देवता के रूप में पूजते हैं. मंदिरों में घंटियां चढ़ाने और जागरों में उनकी कथाएं गाने की परंपरा आज भी जीवित है. गंगनाथ देवता का नाम न्याय, सत्य और मनोकामना पूर्ति के प्रतीक के रूप में बड़े श्रद्धा भाव से लिया जाता है. जिस तरह गोलू देवता को न्याय का देवता माना जाता है, उसी तरह गंगनाथ देवता भी पीढ़ियों से लोगों के विश्वास का केंद्र रहे हैं. कुमाऊं के गांव-गांव में उनके मंदिर मिल जाते हैं, जहां श्रद्धालु अपनी फरियाद लेकर पहुंचते हैं और घंटियां चढ़ाकर न्याय की गुहार लगाते हैं.
गणनाथ निकट अल्मोड़ा की प्राचीन गुफा में श्री बगलामुखी के संस्थापक साधक 25 जून साधना में अंतिम सप्ताह में करेंगे

By Chandra Shekhar Joshi Chief Editor & Bagla Mukhi Peeth Dehradun Mob. 9412932030
गंगनाथ मंदिर की स्थापना 1815 में अर्थात अंग्रेजों के नैनीताल आने से पहले ही हो गई थी। मन्नत पूरी होती है तो श्रृंगार चढ़ाया जाता है & अल्मोड़ा मुख्य शहर से करीब 10 किलोमीटर दूर है. प्राचीन काल का गंगनाथ मंदिर चट्टानों पर बना हुआ है. इस मंदिर में बाबा गंगनाथ, माता भानु और उनके पुत्र की प्राचीन प्रतिमाएं प्राण प्रतिष्ठित हैं. चारों ओर हरियाली से घिरे इस मंदिर में श्रद्धालुओं को अलग ही तरह की शांति की अनुभूति होती है. मंदिर की मान्यता है कि मनोकामना जरूर पूरी होती है.

गंगनाथ मंदिर में उत्तराखंड ही नहीं बल्कि अन्य राज्यों और विदेशों से भी भक्त आते हैं. मंदिर के पुजारी दीपक लोहनी ने बताया कि बाबा गंगनाथ के आशीर्वाद से नौकरी, शादी, परिवार में आपसी तनाव आदि समस्याओं को यहां लेकर आने वाले भक्त भी बाबा की दर से कभी खाली हाथ नहीं जाते हैं. इस मंदिर में सच्चे मन से मांगी गई हर मुराद पूरी होती है.
मंदिर आने वाले श्रद्धालुओं की जब मन्नत पूरी हो जाती है, तो वे यहां बाबा गंगनाथ को धोती-कुर्ता, पगड़ी, बांसुरी, छत्र और भानु माता को वस्त्र और श्रृंगार की सामग्री चढ़ाते हैं. भानु माता के पुत्र को भक्त खिलौने चढ़ाते हैं. गंगनाथ मंदिर में जागर और भंडारा भी कराया जाता है.

गंगनाथ कुमाऊं (उत्तराखंड) क्षेत्र के एक प्रसिद्ध और सम्मानित लोक देवता हैं。 किंवदंतियों के अनुसार, वे नेपाल के डोटी क्षेत्र के राजकुमार थे, जिन्हें एक स्थानीय ब्राह्मण महिला ‘भाना’ से प्रेम हो गया था। अपने पिता (राजा वैभव चंद) से हुए विवाद के बाद उन्होंने घर छोड़ दिया था。 उनकी दुखद मृत्यु के बाद, स्थानीय लोगों ने उन्हें न्याय के प्रतीक और देवता के रूप में पूजना शुरू कर दिया。
मृत्यु के बाद गंगनाथ प्रेत योनि में चले गए और गांव में तरह-तरह के कष्ट फैलने लगे. भयभीत ग्रामीणों ने अंततः गंगनाथ का मंदिर स्थापित किया और उन्हें देवता का दर्जा दिया. तभी से उन्हें न्याय करने वाले देवता के रूप में पूजा जाने लगा. आज भी उनकी यह गाथा जागरों में गाई जाती है, जो कुमाऊं की लोकसंस्कृति की एक महत्वपूर्ण धरोहर है.
लोककथा के मुताबिक एक मंदिर में भाना गंगनाथ को पहचान लेती है। दोनों दन्या में कुटिया बनाकर रहने लगते हैं। ये खबर सारे गांव में फैल जाती है, जिससे दीवान किशन जोशी कुपित होते हैं। वो गंगनाथ को मारने की योजना बनाते हैं। होली के दिन वो गंगनाथ की हत्या कर देते हैं। कहते हैं उस समय भाना गर्भवती होती है। गंगनाथ की ये हालत देखकर भाना कुपित हो जाती है, वो गांव वालों को विनाश का श्राप देती है। तीन दिन बाद गांव में पशु मरने लगते हैं, खेती नष्ट हो जाती है। तब जोशीखोला के लोग जागर के माध्यम से बाबा गंगनाथ को बुलाते हैं और उनसे माफी मांगते हैं। बाबा गंगनाथ सबको माफ कर देते हैं। गंगनाथ देवता अल्मोड़ा अंचल के लोक देवता हैं। अल्मोड़ा से 4-5 किमी दूर ताकुला में उनका मंदिर हैं। जहां बाबा गंगनाथ देवता, भाना बामणी और उनके पुत्र की पूजा की जाती है।

उत्तराखंड व नेपाल के लोगों में प्राचीन काल से ही मान्यता है, जो भी योद्धा देश के लिए युद्ध क्षेत्र में प्राण त्याग देता है, उन्हें देवत्व प्राप्त होता है। यह प्रथा इसलिए प्रारम्भ की गई थी। उत्तराखंड व नेपाल के निवासी इसी कारण जब भी कोई सैनिक युद्ध क्षेत्र में मारा जाता है तो उनकी पत्नी या माता को राजधानी में बुलाकर राजा उनको सम्मानित करने के साथ चरणवंदना करता था। उसके बाद पूरे शहर में उन्हें घुमाया जाता था, जनता फूल बरसाती थी। इसके अतिरिक्त उनके खर्च के लिए जागीर दी जाती थी, जिसे रौत कहा जाता है। चिड़ियाघर स्थित गंगनाथ मंदिर के पुजारी संतोष पांडेय के अनुसार मंदिर में सर्वधर्म के लोग आते हैं। श्रद्धालुओं के सहयोग से ही मंदिर को भव्य बनाया गया है। मंदिर में लगी घंटियां यह बताने को काफी है कि गंगनाथ दुःख कष्ट दूर करने वाले आराध्य देव हैं।

गंगनाथ नेपाल के डोटीगढ़ राज्य के तेजस्वी राजकुमार थे। जो कि अल्मोड़ा जोशीखोला की रूपमती कन्या भाना के आमंत्रण पर नेपाल डोटी से अल्मोड़ा जोशीखोला दन्या आ गए थे। नेपाल के राजा वैभव चंद के घर जन्मे गंगनाथ का बचपन का नाम गंगाचंद था। ज्योतिषियों ने उन्हें लेकर भविष्यवाणी की थी कि वो एक बलशाली संन्यासी बनेंगे।गंगाचंद संसार के दुखों से हमेशा परेशान रहते हैं। इस बीच उनके साथ एक अनोखी घटना होती है। उन्हें सपनों में अल्मोड़ा जोशीखोला की कन्या भाना बुलाती है। एक रात गंगाचंद सबकुछ छोड़कर चले जाते हैं। काली नदी के पास एक मसाण से युद्ध के दौरान उनकी मदद के लिए भगवान गोरिया (गोलू देवता ) आते हैं। मसाण को हराने के बाद वो हरिद्वार में गुरु गोरक्षनाथ की शरण में पहुंचते हैं। वहां से दीक्षा हासिल करने के बाद वो भिक्षाटन के लिए अल्मोड़ा पहुंचते हैं। यहां वो अपनी शक्तियों से लोगों के दुख हरने लगते हैं

इतिहासकार प्रो. अजय रावत के अनुसार गंगनाथ की मृत्यु प्रेम प्रसंग या हत्या से नहीं, बल्कि युद्ध में हुई थी. उनके मुताबिक 17वीं शताब्दी में डोटी के राजा उदय चंद ने कुमाऊं के चंद वंशीय शासकों पर आक्रमण किया था. उस समय चंपावत से राजधानी अल्मोड़ा स्थानांतरित की जा चुकी थी. इसी युद्ध के दौरान गंगनाथ वीरगति को प्राप्त हुए और अपने राज्य के लिए अदम्य साहस का परिचय देते हुए प्राण न्यौछावर कर दिए.
अल्मोड़ा के गंगनाथ मंदिर तक पहुंचने के लिए आपको दो रास्ते मिलते हैं. पहला रास्ता धारानौला से होते हुए आपको यहां तक लाता है. दूसरा रास्ता एनटीडी से होते हुए भी आप इस मंदिर तक पहुंच सकते हैं.
चैतन्य महाप्रभु ने श्रीमद्-भागवतम् के ग्यारहवें स्कंध (11.14.20-21) से उद्धृत किया, जिसमें कृष्ण अपने मित्र उद्धव को भक्ति सेवा की सर्वोच्चता के बारे में बताते हैं:
हे उद्धव, न तो अष्टांग योग (इंद्रियों को वश में करने की रहस्यमयी योग पद्धति) से, न ही निराकार अद्वैतवाद से, न ही परम सत्य के विश्लेषणात्मक अध्ययन से, न ही वेदों के अध्ययन से, न ही तपस्या, दान या संन्यास ग्रहण से , उतना मुझे प्रसन्न किया जा सकता है जितना कि मेरे प्रति शुद्ध भक्ति भाव विकसित करने से। भक्तों और साधुओं को अत्यंत प्रिय होने के कारण, मैं अटूट भक्ति भाव से ही प्राप्त होता हूँ। यह भक्ति-योग पद्धति, जो धीरे-धीरे मेरे प्रति आसक्ति बढ़ाती है, कुत्ते-भक्षी के बीच जन्म लेने वाले मनुष्य को भी शुद्ध कर देती है। अर्थात्, भक्ति-योग की प्रक्रिया से प्रत्येक व्यक्ति आध्यात्मिक स्तर तक पहुँच सकता है।