भारत-चीन सीमा ;जवान हरभजन सिंह; मौत के बाद भी नौकरी पर

1968 से ही एक दिलचस्प कहानी भी भारत चीन सीमा की सुरक्षा का हिस्सा बनी हुई है. ये कहानी है जवान हरभजन सिंह की जिनकी मौत के बाद भी सेना ने ना सिर्फ उन्हें नौकरी पर रखा बल्कि अब तो बाकायदा दफ्तर और घर के साथ मंदिर भी बन गया है .  बाबा हरभजन सिंह दरअसल एक जवान के तौर पर सेना में 1966 में भर्ती हुए थे. भारत-चीन युद्ध के दौरान घोड़ों के साथ एक ऊंची पोस्ट पर जाते वक्त वो फिसल गए और उनकी मौत हो गई. भारत चीन सीमा पर तैनात ब्लैक कैट डिवीजन ने उन्हीं सपनों के आधार पर हरभजन सिंह को नौकरी दी, प्रमोशन दिया और छुट्टियां भी दिया करते थे. पांच साल पहले हरभजन सिंह की छुट्टियां कैंसिल कर दी गईं और फिर उन्हें रिटायर घोषित कर दिया गया. लेकिन अब भी यहां आने वाले सैलानियों के बीच इस सिपाही का ये मंदिर अब भी लोकप्रिय है. 

www.himalayauk.org (HIMALAYA GAURAV UTTRAKHAND) WEB & PRINT MEDIA

1962 में चीन के हाथों हार का बदला पांच साल बाद लिया था. वो भी दो बार दो अलग अलग मोर्चों पर. पहले नाथुला मोर्चे की विजयगाथा. भारत और चीन के बीच करीब 4 हजार किलोमीटर लंबी लाईन ऑफ एक्चुअल कंट्रोल यानी एलएसी पर 1967 में भारतीय सेना ने चीन को मुंहतोड़ जवाब दिया था. वो जगह थी भारत चीन सीमा पर मौजूद ना-थुला पास. साल 1967 से पहले सीमा का ये हिस्सा ऐसा नहीं था. यहां सीमा की पहचान के लिए सिर्फ एक पत्थर लगा था. ये भारत की सीमा पर आखिरी पोस्ट थी. दूसरी तरफ से चीन की सेना बाकायदा लाउडस्पीकर पर भारत की सेना को पीछे हटने की धमकी दिया करती थी कि पीछे हटो वरना 1962 की तरह कुचल दिया जाएगा. यही नहीं चीनियों ने भारतीय सीमा में घुसकर बंकर बनाने की कोशिश भी की थी. चीन की इन हरकतों को रोकने के लिए 1967 में नाथुला पास पर तैनात मेजर जनरल सगत राय की अगुवाई में कंटीली बाड़ लगाने का फैसला किया. आज भी इस बाड़ के हिस्से ज्यों के त्यों मौजूद हैं. कंटीली बाड़ को लेकर खूनी लड़ाई तब शुरू हुई तब जुबानी झड़प के बाद चीन ने बाड़ लगा रही भारतीय सेना पर हमला कर दिया. बाड़ लगाने में जुटे इंजीनिरिंग यूनिट समेत भारतीय सेना के 67 जवान मारे गए. 1967 के चीनी हमले के बाद भारतीय सेना का खून खौल उठा. जवाबी हमला शुरू हुआ और चीन की मशीनगन यूनिट को पूरी तरह तबाह कर दिया गया.
1967 की उस लड़ाई में शहीद हुए भारतीय सैनिकों के लिए यहां अमर जवान स्मारक बनाया गया है. तब से इस इलाके में चीन ने कभी ना तो घुसपैठ की कोशिश की और ना ही भारतीय सेना से टकराने की हिम्मत की. यहां आज भी 48 साल पुराने हालात की तरह ही चौकियां मौजूद हैं जिनके बीच सिर्फ चंद कदमों का फासला है.
नाथुला में मुंह की खाने के सिर्फ 15 दिन बाद एक और जंग हुई पास के ही चोला इलाके में. भारत चीन सीमा में नाथुला के पास ही है चोला इलाका जहां पिछले साल बनाया गया है चोला विजय का स्मारक. ये स्मारक नाथुला में हुई उस झड़प के महज 15 दिन बाद चोला पास इलाके में चीन पर भारत की विजय का दूसरा प्रतीक है जिसे पिछले साल ही बनाकर तैयार किया गया है.
यहां दर्ज है चोला की विजयगाथा. बोर्ड पर दिखाई देगी आपको लाल रंग से रंगे एक पत्थर की तस्वीर. यही वो पत्थर है जिस पर कब्जे को लेकर भारत और चीन में बारूदी जंग शुरू हुई थी.
इस इलाके में अगर भारत और चीन की पोस्ट को देखें तो दोनों के बीच की दूरी महज 700 फुट है. इस इलाके में जवान ऐसे बंकरों में रहते हैं और 24 घंटे भारतीय सीमा की रखवाली करते हैं. 1967 की चोला पास की लड़ाई में भी ऐसे ही भारतीय सैनिकों ने चीनी सेना के छक्के छुड़ा दिए थे.
इस लड़ाई के बाद से चीन ने चोला इलाके में कभी दखल देना मुनासिब नहीं समझा. इसकी एक और वजह है यहां भारत की चौकियां बेहद ऊंची हैं और लड़ाई की सूरत में इसे फायदेमंद समझा जाता है. करीब साढ़े चौदह हजार फुट की उंचाई पर बसा है चोला पास और इसकी पोस्ट इससे भी ऊपर यानी 15 हजार फुट की ऊंचाई पर हैं.

यही वजह है की भारत चीन सीमा के इस इलाके में ना सिर्फ भारत की जीत की कहानी लिखी गई बल्कि अब यहां उस जीत की कहानी स्मारक की शक्ल में हमेशा के लिए अमर बना दिया गया है.

1968 से ही एक दिलचस्प कहानी भी भारत चीन सीमा की सुरक्षा का हिस्सा बनी हुई है. ये कहानी है जवान हरभजन सिंह की जिनकी मौत के बाद भी सेना ने ना सिर्फ उन्हें नौकरी पर रखा बल्कि अब तो बाकायदा दफ्तर और घर के साथ मंदिर भी बन गया है .

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *